भाड़ में जाओ…

एक घोर नास्तिक, लेकिन प्रखर राष्ट्रवादी मित्र के दफ़्तर में बैठा था। बातचीत के दौरान बीच-बीच में वे कम्प्यूटर पर भी नज़र डालते जा रहे थे।

अचानक जोर से हंसे और फिर बोले – लीजिए, आपके वामपंथी परम मित्र भी दिवाली मना रहे हैं। अपने बीवी बच्चों सहित विशुद्ध भारतीय पोशाकों में सज-धज कर दीवाली (दिवाली) सेलीब्रेशन की फोटो फेसबुक पर डाली है।

सच कहूं, तो मेरे मन में पहला और आखिरी जो नाम आया, वह था मुझे हाल ही ब्लॉक कर भाग गए आंधी जी का। वे ‘महा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ के चलते-फिरते उदाहरण जो ठहरे।

पूछा – आंधी जी?

मित्र और जोर से हंसे, फिर बोले – आपका अनुमान एकदम सही है।

मैंने कहा – ज़रा आगे बढ़िए। मामला इतना आसान नहीं है। रात आठ बजे बाद की बात अलग है, लेकिन आंधी जी इतने सहज व्यक्ति नहीं हैं कि आसानी से आपके चंगुल में फंस जाएं। जरूर उन्होंने आगे कोई ऐसा स्टेटस लिखा होगा, जो बताता होगा कि उन्होंने दीपावली क्यों मनाई।

कुछ देर बाद ही मित्र ‘यूरेका-यूरेका’ स्टाइल में चीखे – मिल गया। आपने सही कहा था। आंधी जी ने लिखा है कि दीपोत्सव मूलतः बौद्ध पर्व है, जिसे हिन्दुओं ने चुरा लिया है।

मैं मुस्कराया। मुझे पता था कि आरक्षण लाभान्वित छद्म वामपंथियों का यह ख़ास शगल है कि सनातन के सभी प्रतीकों को असत्य ठहराओ और अगर ऐसा करने की कोई गुंजाइश नहीं दिखे, तो उसे कहीं से उड़ाया हुआ घोषित कर दो।

मैंने कहा – हो सके तो इस मानसिक दलित, बल्कि कहें कि पद दलित से पूछ लीजिएगा कि सनातन पुराना है या बौद्ध धर्म, क्योंकि यह ऐसा कई बार कर चुका है।

इसके बाद हमारा विचार-विमर्श कई सतरों पर हुआ। अगर मैं उसे बातचीत की शैली में लिखता रहा, तो बहुत लंबा हो जाएगा, अतः संक्षिप्त रूप में कुछ तथ्य रखता हूं।

सच कहूं, तो वामपंथ का नक़ाब ओढ़े ये विदूषक जब भी बौद्ध मत को सनातन से श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करते दिखते हैं, तो मेरे मन में एक नहीं, कई सवाल उमड़ते-घुमड़ते हैं।

कोई इन अति ज्ञानियों से पूछे – बाबा मार्क्स ने क्या कहीं यह लिखा है कि इस सृष्टि में सिर्फ सनातन धर्म अफीम है? इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, बौद्ध आदि वाम का ही दूसरा रूप हैं!

नहीं? तो कूढ़मग़ज़, तुम्हारा कलेजा सनातन के प्रतीकों पर ही क्यों बल्लियों उछलता है और अन्य धर्मों के तलवों को तुम क्यों लगातार चाट रहे हो? इसका अर्थ है कि तुम महा फ़र्ज़ी हो। तुम्हारा एक एजेंडा है। तुम महा कायर हो कि बाबा साहब के आह्वान के बावज़ूद महज़ आरक्षण से सरकारी नौकरी पाने के लिए हिन्दू धर्म नहीं छोड़ सके। सोचो, तुम कितने अधम हो।

कोई इन वैशाखनंदनों से पूछे कि धर्मान्तरित लोगों को आरक्षण की सुविधा देते हुए डॉ अंबेडकर ने संविधान की मूलभावना के खिलाफ देसी और विदेशी का पेंच क्यों फंसाया? क्या वे साम्प्रदायिक थे? क्या वे इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के खिलाफ थे? फिर ‘जय भीम, जय मीम’ कैसे? मुसलमानों और ईसाइयों के दलित तबके के लिए भी आरक्षण की मांग तुम्हें क्यों नहीं करनी चाहिए?

बौद्ध धर्म के जितने भी ग्रंथ हैं, वे सनातनी ग्रंथों से इंस्पायर अथवा उनके उत्तर में लिखे गए लगते हैं। ज़ाहिर है कि वह सनातन अथवा वैदिक धर्म के बाद का मत था, तो अपनी ज़मीन तलाश रहा था। इसीलिए उसे सनातनी आस्थाओं और विश्वासों का खंडन आवश्यक लगता था। लेकिन इसमें उसने अनेकानेक ग़लतियां अथवा कहें कि सीमारेखा का उल्लंघन किया।

मसलन, सनातन का आदि ग्रंथ ‘रामायण’ है, तो जवाब में ‘बौद्ध रामायण’ लिखी गई। और बौद्धों की यह रामायण तमाम बैरिकेड्स लांघते हुए राम और सीता को भाई-बहन निरूपित करती है। ऎसी ही अनेकानेक दुष्चेष्टाएं बौद्ध धर्मग्रंथों में हैं। और मेरा मानना है कि भारत में बौद्ध धर्म का विनाश इसलिए ही हुआ कि उसने झूठ की ज़मीन पर खेती करनी चाही।

आज के बौद्धों की हालत देख लें। उनके पेजेज़ की सैर करें। भाईजान, बुद्ध ने तो समन्वय का सन्देश दिया था, आप दुर्गा, महाकाली आदि-इत्यादि को अपशब्द क्यों कहते हो? साफ़ है – या तो बुद्ध के सन्देश सही नहीं हैं या आप वास्तविक बौद्ध नहीं हैं।

काफी पुरानी बात है। एक सिर्फ शरीर से बौद्ध मित्र ने एक बार मेरे सामने परिहास किया। बोले – भाईसाहब, आपके शंकराचार्य ने औरतों को नरक का द्वार कहा है।

मैंने कहा – कथन को कृपया सन्दर्भ से नहीं काटें। यह उन्होंने संन्यासियों के लिए कहा था। आज बाबाओं की जो हालत दिख रही है, क्या उनका यह कथन सत्य सिद्ध नहीं होता?

कुछ भी हो, बात तो कही ही गई थी, वे बोले।

मैंने पूछा – बुद्ध ने एक औरत को संघ में शामिल करने का अनुरोध सात बार ठुकराया। अपने परम शिष्य आनंद के आग्रह पर अनुमति देने को विवश हुए, तो कहा – अब संघ में स्त्री का प्रवेश हो गया है, इसलिए संघ सिर्फ पांच सौ साल तक चल पाएगा।

पहली बात, दोनों के मत में क्या अंतर है? दूसरी बात, आप आज तक चल रहे हैं। पीएम मोदी तक ‘बुद्ध-बुद्ध’ रटते घूम रहे हैं। क्या बुद्ध फ़र्ज़ी थे? क्या उनका महाज्ञान का दावा झूठा था? तीसरी बात, तुमने प्रचारित किया कि बौद्ध धर्म ‘नास्तिक धर्म’ है। तुमने बुद्ध को भगवान बना दिया। उनकी प्रतिमाएं बना डालीं। यहां तक होता, तब भी ठीक था। तुम तो उन्हें पूजने लगे। उनकी आरती गाने-उतारने लगे। सनातन का विरोध करते-करते खुद सनातन में समाहित हो गए।

मित्र जवाब देने के बजाय भाग छूटे।

और तो और, ये महाज्ञानी आंधी जी अपने एक स्टेटस में, संभवतः दीपावली वाला ही हो, महालक्ष्मी को बौद्ध विभूति सिद्ध कर रहे थे। उनका कथन मित्र ने बताया – लक्ष्मी हिन्दुओं की सर्वाधिक नई देवी है। उसका प्राचीन वैदिक ग्रंथों में कोई उल्लेख नहीं है। यह दरअसल बौद्ध धर्म से चुराई गई है।

मित्र ने बताया, तो मुझे घोर आश्चर्य हुआ। नशे का अत्यधिक सेवन कैसे-कैसे विकार उत्पन्न कर देता है, यह विचार मन में आया। मैंने मित्र को कहा – इन महाशय को बताइए कि लक्ष्मी का उल्लेख ऋग्वेद में है।

मित्र हंसे, फिर बताया – यह एक अन्य सज्जन ने वहां लिख रखा है। इस पर आंधी जी का तर्क है कि उसमें लक्ष्मी का जैसा रूप है, वैसा आज की लक्ष्मी का नहीं है।

सच कहता हूं, मेरे पेट में हंसी से बल पड़ गए। संयत होकर कहा – इस गर्दभ से पूछिए – क्या तुम जब पैदा हुए थे, तब भी आज की तरह ही थे और क्या कुछ साल बाद भी आज की तरह ही दिखोगे? कसम से, अज़ब घामड़ है यह। उस लेखक संघ का दुर्भाग्य था कि ये नामुराद उस पर क़ाबिज़ हुए।

मित्र हंसे। फिर बोले – आप सही कह रहे हैं। लेकिन वहां कोई उत्तर नहीं है।

जब मैं आंधी जी की फ्रेंडलिस्ट में था, तब मैंने देखा था कि वे एक स्टेटस में ‘श्रीमदभगवद गीता’ को एक बौद्ध ग्रंथ से चुराया हुआ सिद्ध कर रहे थे। यह दरअसल मूर्खता की पराकाष्ठा है। मेरी किताब अगर पहले छपी है और उसके बाद छपने वाली किसी किताब का लेखक मुझ पर आरोप लगाए कि इसने मेरी किताब के अंश चुरा लिए हैं, तो सुप्रीम कोर्ट भी हंसेगा।

पूछेगा – भाईजान, इस संसार में पहले वे आए थे या आप? बाद में आकर भी क्यों चिल्ला रहे हो?

लेकिन ये इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर के परम शिष्य हैं। इन्हें सत्य से कोई मतलब नहीं। उन्होंने जो लिख दिया, वह अंतिम सत्य है। उसमें न कुछ घटाया जा सकता है, न जोड़ा जा सकता है। आपको सिर्फ इतनी छूट है कि इनके गुज़र जाने के दस-बीस साल बाद आप चाहें, तो इनकी किताब का सातवां अध्याय पहला अध्याय बना दें, क्योंकि उसमें लिखा हुआ है – शुरू करता/करती हूं बाबा मार्क्स के नाम से।

लेकिन छोड़िए! गर्दभ ऐसे ही ताल ठोकते रहेंगे और हम राजीव गांधी जी की शैली में बोलते रहेंगे – हमने देखा, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे, हम देखते रहेंगे। पार्टी गई तेल लेने। तुम भाड़ में जाओ।

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