कश्मीर में ‘शंकराचार्य पर्वत’ कोहे-सुलेमान और ‘अनंतनाग’ इस्लामाबाद क्योंकर हुए?

हाल ही में इलाहाबाद का नाम बदलकर ‘प्रयागराज’ और फैजाबाद का ‘अयोध्या’ किया गया। संभवतः और नाम-परिवर्तन किए जाएँ। नाम-परिवर्तन के पीछे ‘गुलाम मानसिकता’ से छुटकारा पाने की बात कही जा रही है।

यह सच है कि जब हमारा देश विदेशी आक्रान्ताओं के अधीन था तो उन आक्रान्ता-शासकों की पूरी कोशिश रही कि वे हमारी संस्कृति को अपनी संस्कृति यानी सोच, जीवनशैली आदि में रंग दें।

ऐसा करने से विदेशी शासकों के अधीनस्थ देश पर अपनी पकड़ मजबूत होती है। शिक्षा-व्यवस्था में बदलाव, भाषा में बदलाव, रीति-नीति में बदलाव आदि प्रक्रियाएं इसी का परिणाम है।

हमारे देश पर पिछले लगभग एक हजार वर्षों के दौरान मुख्यतया मुस्लिम और ब्रिटिश शासकों ने राज किया। मुस्लिम शासकों के समय परम्परा से चले आ रहे कई शहरों/जगहों के नाम बदले गये और अपने तरीके से इन शहरों/जगहों को नये नाम दिये गये।

यही काम कमोबेश अँगरेज़ शासकों ने भी किया। चूंकि देश पराधीन था, विदेशी आक्रमणकारियों के दमनचक्र से त्रस्त था, अतः हर स्थिति को मन मारकर झेलता रहा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देशवासियों के स्वाभिमान और अस्मिता ने अंगडाई ली और दासता की बेड़ियाँ टूटकर छिन्न-भिन्न हो गयीं। देशप्रेम की उमंगें परवान चढीं। अब विदेशी शासकों द्वारा हमारी संस्कृति को बदलने वाली हर क्रिया की प्रतिक्रिया होने लगी।

नामों को बदलने की आवाज़ उठी। फलतः मद्रास चेन्नई, पूना पुणे, बैंगलोर बेंगलुरु, बोम्बे मुम्बई, कलकत्ता कोलकाता आदि कहलाने लगे। जब ऐसा हुआ या हो रहा था तो किसी भी व्यक्ति, नेता या सामाजिक संगठन आदि ने नाम-परिवर्त्तन की इस प्रक्रिया के विरोध में आवाज़ बुलंद नहीं की।

शायद इसलिए क्योंकि इस ‘परिवर्तन’ के पीछे सम्बंधित प्रदेश के जनवासियों की भावनाओं और आकांक्षाओं का संबल और समर्थन मौजूद था। इसमें कोई संदेह नहीं कि जनभावनाएँ अर्थात यही संबल और समर्थन ‘इलहाबाद’ और ‘फैजाबाद’ के नामों को बदलने के पीछे काम कर रहे है। कहावत भी है ‘खल्के जुबां, नक्कारे खुदा.’ यानी लोक की राय/जुबां ईश्वर की आवाज़ होती है।

अब अगर विरोध करने वाले यह तर्क दें कि इन नाम-परिवर्ततनों के पीछे धार्मिक-विद्वेष काम कर रहा है तो फिर यह बात भी सामने आ सकती है कि कश्मीर में ‘शंकराचार्य पर्वत’ कोहे-सुलेमान और ‘अनंतनाग’ इस्लामाबाद क्योंकर हुए? क्रिया की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है।

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  1. कुछ लोगों का मानना है कि हम आज भी उसी गुलाम भारत में जी रहे है। हैरानी की बात यह है कि आज भी कुछ लोग मुगलों और अंग्रेजों के राज को सही ठहराते हैं। मेरे विचार में आजाद भारत में हर तरह की आजादी होनी चाहिए, चाहे आर्थिक हो , सामाजिक हो या वैचारिक हो।

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