इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार -2

20वीं सदी के पूर्वार्ध के दौरान पंजाब में कम्युनिस्ट पार्टी का बोलबाला था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद पार्टी के गंगाधर अधिकारी ने ‘सिख होमलैंड’ का नारा बुलंद किया. अधिकारी एक रसायन विज्ञानी थे जिन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन और मार्क्स प्लांक जैसे महान वैज्ञानिकों के साथ काम किया था.

चर्चित पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह ने अपनी किताब ‘सिखों का इतिहास’ में लिखा है कि सिखों में ‘अलग राज्य’ की कल्पना हमेशा से ही थी. रोज़ की अरदास के बाद गुरु गोविंद सिंह का ‘राज करेगा खालसा’ नारा लगाया जाता है. इस नारे ने अलग राज्य के ख्व़ाब को हमेशा जिंदा रखा.’ खुशवंत आगे लिखते हैं, ‘सिख नेताओं ने कहना शुरू कर दिया था कि अंग्रेज़ों के बाद पंजाब पर सिखों का हक है.’ लेकिन आजादी के बाद हुए विभाजन ने उनकी ‘अलग राज्य’ की उम्मीदों को धूमिल कर दिया था.

आजादी के बाद जब भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन हुआ तो अकाली दल ने पंजाबी भाषी इलाके को ‘पंजाब सूबा’ घोषित करवाने की मांग रख दी. उधर जनसंघ पार्टी के पंजाबी हिंदू नेताओं ने आंदोलन चलाकर पंजाबी हिंदुओं को गुरमुखी के बजाए हिंदी भाषा अपनाने को कहा. यहीं से हिंदुओं और सिखों के बीच की खाई गहरी होने लग गयी.

यही वह वक्त भी था जब पंजाब में अकाली दल कांग्रेस का विकल्प बनकर उभर चुका था. इंदिरा गांधी ने इसके जवाब के तौर पर सरदार ज्ञानी जैल सिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर खड़ा किया. जैल सिंह का बस एक ही मकसद था-शिरोमणि अकाली दल का सिखों की राजनीति में वर्चस्व कम करना. लगभग सारे गुरुद्वारों, कॉलेजों और स्कूलों में अकालियों का ही प्रबंधन था. अकालियों के प्रभाव की काट के लिए जैल सिंह ने सिख गुरुओं के जन्म और शहीदी दिवसों पर कार्यक्रमों का आयोजन, प्रमुख सड़कों और शहरों का उनके नाम पर नामकरण और सिख गुरुओं की महत्ता का वर्णन जैसे दांव चले. इन सब हालात के बीच एक शख्स का उदय हुआ जिसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले.

माना जाता है कि तेज़ तर्रार भिंडरावाले को आगे बढ़ाने में जैल सिंह और अन्य कांग्रेसियों का हाथ था. अकालियों की काट के लिए जैल सिंह और दरबारा सिंह ने उसे आगे बढ़ाया और बाद में इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने उसकी पीठ पर हाथ रख कर उसे पंजाब का ‘अघोषित मुखिया’ बना दिया.

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब ‘बियोंड द लाइंस एन ऑटोबायोग्राफी’ में भी इसका जिक्र किया है. इसके मुताबिक संजय गांधी को लगता था कि अकाली दल के तत्कालीन मुखिया संत हरचरण सिंह लोंगोवाल की काट के रूप में एक और संत को खड़ा किया जा सकता है. यह संत उन्हें दमदमी टकसाल (सिखों की एक प्रभावशाली संस्था) के संत भिंडरावाले के रूप में मिला. नैयर के मुताबिक कांग्रेस नेता कमलनाथ ने यह माना था कि वे जरनैल सिंह भिंडरावाले को पैसे देते थे. हालांकि, उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि भिंडरावाले आतंकवाद का रास्ता चुन लेगा.

कहते हैं कि जरनैल सिंह सात साल का था जब उसके पिता ने उसे दमदमी टकसाल को सौंप दिया था. यहीं उसकी आरंभिक शिक्षा हुई थी. धीरे-धीरे उसकी चर्चा बढ़ती गई. जरनैल सिंह भिंडरावाले ने सिखों से गुरु गोविन्द सिंह के बताए हुए मार्ग पर लौटने का आह्वान किया.

उसने सिखों से शराब, धूम्रपान जैसी लतों को छोड़ने की अपील की. उसकी लोकप्रियता तब बहुत तेज़ी से बढ़ी जब उसने हिंदुओं के ख़िलाफ़ बोलना शुरू कर दिया. भिंडरावाले अपने भाषणों में हिंदुओं को ‘टोपीवाले’, धोती वाले’ जैसे नामों से पुकाराता. वह इंदिरा गांधी को ‘पंडितां दी धी’ यानी पंडितों की बेटी कहकर बुलाता. 1977 में उसे दमदमी टकसाल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया.

पंजाब में भिंडरावाले की तूती बोलने लगी बेताज बादशाह बन गया वो पंजाब का सरकार किसी की हो भिंडरावाले का सपोर्ट सबकी मजबूरी बन चुकी थी.

13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में सिखों के ही एक और सेक्ट निरंकारी समुदाय का विशाल समागम था भिंडरावाले ने अकाली नेता फौजा सिंह के नेतृत्व में निरंकारियों का समागम ना होने देने और उनके तत्कालीन गुरु बाबा गुरबचन सिंह का सिर काट कर चौराहे पर लटका देने की खुलेआम घोषणा कर भारी संख्या में अपने समर्थकों सहित निरंकारियों पर खूनी हमला बोल दिया भयंकर मार काट मची सरदार फौजा सिंह निरंकारी सन्त बाबा गुरबचन सिंह के बहुत ही करीब जा पहुंचे थे और वो अपनी खून सनी तलवार से जैसे ही उनका सर काटने को आगे बढ़े निरंकारी बाबा के भारी हथियारों से लैस बॉडी गार्डो ने सरदार फौजा सिंह को गोलियों से भून डाला था, यानी एक और उभरता आक्रमक नेता जो भिंडरावाले को चुनोती दे सकता था मारा गया!!

अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई जिसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए. इसके विरोध में आयोजित रोष दिवस में जरनैल सिंह भिंडरावाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. हिंसा लगातार फैलती गई. सितंबर 1981 में पंजाब केसरी अखबार निकालने वाले हिंद समाचार समूह के मुखिया लाला जगत नारायण सिंह की हत्या हो गई. आरोप भिंडरावाले पर लगे. लेकिन उसकी लोकप्रियता इतनी ज़्यादा थी कि इन हत्याओं में उसकी नामज़दगी के बावजूद पंजाब पुलिस उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पायी. उसने खुद अपने गिरफ्तार होने का दिन और समय निश्चित किया था. उस वक़्त जैल सिंह केंद्र में गृह मंत्री थे. भिंडरावाले को गिरफ्तार करके सर्किट हाउस में रखा गया था. लेकिन सबूतों के अभाव में उसे जल्दी ही रिहा कर दिया गया.

तब तक भिंडरावाले ने हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत का खुला इज़हार करना शुरू कर दिया था. अपनी किताब माइ ब्लीडिंग पंजाब में खुशवंत सिंह लिखते हैं कि गायों के सर काट कर मंदिरों के सामने फेंके जाने लगे. हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों का अपमान किया गया. पर किसी की हिम्मत नहीं थी कि जरनैल सिंह भिंडरावाले को रोक सके. हिंदुओं ने भी प्रतिकार करना शुरू किया. वे गुरु ग्रंथ साहिब को जलाकर और सिगरेटों के जले हुए टुकड़े गुरुद्वारों में फेंकने लगे. जब बात बढ़ने लगी तो कभी भिंडरावाले को बढ़ावा देने वाले जैल सिंह और दरबारा सिंह ने उससे किनारा करना शुरू कर दिया था.

क्रमशः
– इकबाल सिंह पटवारी

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