…और अगर गब्बर जीत गया तो छोड़ेगा नहीं

बहुत पोस्ट्स देख रहा हूँ कथित रूप से उद्वेलित हिंदुओं की, कि सरकार को अब मंदिर पर एक्शन लेना ही चाहिए, वरना हम सरकार बदल देंगे।

कुछ बहुत सरल मुद्दों पर बात करते हैं।

छह दिसम्बर को तो गत छब्बीस सालों से पुलिस तनाव में रहती है, हफ्ता भर पहले से LIU वाले चौकन्ना हो जाते हैं। गिरफ्तारियाँ नहीं होती लेकिन पुलिस को तनाव रहता है। क्या इस तनाव का कारण हिन्दू होता है?

9/11 को अमेरिका और उसके अलग अलग देशों के दूतावास भी विशेष मुस्तैद रहते हैं। क्यों?

अस्तु, कारण आप को पता ही है। जहां भी मुसलमान से संबन्धित बात आती है वह बात न रहकर संवेदनशील मुद्दा हो जाता है। क्यों, यह भी सर्वविदित है।

उस हर मुद्दे को लेकर हमेशा हिंसा की सभी संभावनाओं पर विचार किया जाता है कि कहाँ पर क्या हो सकता है। और यह बात साफ है कि गली मुहल्लों तक कहीं भी पुलिस नहीं पहुँच सकती। कितना भी एडवांस्ड देश हो, यह सत्य है अन्यथा अमेरिका और अन्य तत्सम विकसित देशों में दंगे नहीं होते।

एक सीधी बात समझ लीजिये – जिस दिन हिन्दू स्वयं अपनी गली मोहल्ले के उपद्रवी मुसलमान झुंड से निपटने के काबिल होगा, सब बनेगा। आज केवल ‘सामने देखो, ये हो रहा है, वो हो रहा है’ की कभी सच्चाई, कभी अफवाहों से खुद भी डरता है और बाकियों को भी डराता है।

अपने घर में ढंग का लट्ठ तक मिलेगा नहीं। खून देखकर चक्कर आ जाते हैं, भले ही मुर्गी और बकरे का ही क्यों न हो जिसको वह हिन्दू खाता भी है लेकिन सामने कटते देख नहीं सकता, खुद के हाथों से काटना दूर की कौड़ी है। और सरकार को आखिरी चेतावनी देते हैं कि करना ही होगा, भले रक्त की नदियां बहें।

ज़रा सी तकलीफ हुई नहीं कि सरेंडर कर देता है और तकलीफ होना तुरंत बंद नहीं हुई तो अपनी स्थिति के लिए सरकार को कोसने लगता है।

मुझे 1992 से लेकर आज तक ऐसे नमूने मिले हैं जो कहते हैं कि ‘बाबरी मस्जिद क्यों गिराई, क्या इनको मालूम नहीं कि मुसलमान कैसे हिंसक होते हैं? भाजपा ने तो अपनी राजनीति के लिए हमारी जान को मुश्किल में डाल दिया।’

भाजपा की राजनीति ज़रूर थी लेकिन ऐसे हिंदुओं का यह कहना चिंता का विषय है। क्या गब्बर ने बस धमकी देने का अवकाश है कि ये जय और वीरु को हाथ पैर बांधकर उसके सामने पेश करेंगे? जब कि ये जय और वीरु का साथ दें तो गब्बर से छुटकारा पा सकते हैं।

लेकिन नहीं, साथ दिया तो लड़ना भी होगा, कहीं मर गए तो? और अगर गब्बर जीत गया तो छोड़ेगा नहीं। इसलिए इनके हिसाब से गब्बर की गुलामी ज्यादह बेहतर है, भले रोज़ तिल तिल मरना पड़े, क्योंकि ज़िंदा रहना है।

नहीं, कोई सही मौके का इंतज़ार नहीं, केवल ज़िंदा रहना है। और उसके लिए गब्बर के सामने अपनों की बलि चढ़ाने का मौका भी खोजेंगे ये।

अय्यप्पा के लिए दक्षिण के हिन्दू उतरे, भाजपा ने साथ दिया, अमित शाह दौड़े गए। यहाँ लोग केवल सोशल मीडिया में धमकियाँ दे रहे हैं भाजपा को। नहीं तो ये सरकार बदल देंगे।

लेकिन सरकार अगर इनके मन मुताबिक कदम उठाती है, और फिर दंगे हों, तो सरकार को कोसने वालों में सब से पहले और सब से अधिक यही लोग होंगे।

आज इस्लाम का मकड़जाल इतना फैला है कि अगर आप मंत्री या बड़े सरकारी अफसर नहीं है तो ‘अजानास्त्र’ और शोर जिहाद की चपेट में होंगे ही। ज़रा कुछ छिटपुट दंगा सा हुआ तो घर से आने जाने में आप डरते हैं, आने जाने के रास्ते बदलने की सोचते हैं – यही सच है।

कुछ दिन पहले एक वीडियो देखा था जहां एक हिन्दू लड़की मुसलमान के साथ निकल जा रही थी, अपने एरिया में खड़ी थी और उसको इलाके के परिचित हिन्दू कोस रहे थे और वो उनसे झगड़ा कर रही थी कि वो जो चाहे करने को स्वतंत्र है, लोग उसके मामले में टांग न अड़ाएं वरना पुलिस केस कर देगी।

हर कोई उससे दूरी बनाकर ही बोल रहा था। जिसके साथ वो जा रही थी वो मुसलमान लड़का वहीं खड़ा था। पूरी तरह बेफिक्र दिखता था और मोबाइल से बात कर रहा था। लड़का कोई तगड़ा भी नहीं था, लड़की से भी मरियल था। हिन्दू मोहल्ले से प्रेमिका को ले जाने आया था और प्रेमिका ही अपनों से झगड़ा कर रही थी, इसे कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं लग रही थी।

क्या कोई हिन्दू लड़का अपनी मुस्लिम प्रेमिका को उसके मोहल्ले से इस तरह अकेला ले आ सकता है? तगड़ा हो तो भी?

हाँ, ये अगर होने लगेगा तो राम मंदिर बनेगा, और भी स्थान कलंक मुक्त होंगे, कोई दिक्कत नहीं आएगी।

फिलहाल परिस्थिति ये है कि घर में घुसकर कोई अकेला आदमी भी पत्नी का बलात्कार कर रहा हो और पति दौड़कर दो किलोमीटर दूर पुलिस थाने में पुलिस को बुलाने जाये और मदद तुरंत न मिलने पर पुलिस को गालियां दें कि हम तुम्हारी नौकरी खा जाएंगे।

आज यह हो रहा है कि मोदीजी वो कर रहे हैं जो वे कर सकते हैं। उससे जिनको पीड़ा हो रही है वे इन मुद्दों को लेकर सब से अधिक हवा बना रहे हैं कि मोदीजी ने मंदिर को लेकर कुछ नहीं किया। मुद्दा लपकने को उत्सुक लोगों की कमी नहीं।

अब एक और बात बता देता हूँ। भारत में अभी भी कुछ जगहें हैं जहां हिंदुओं को सांप्रदायिक दंगों का डर नहीं है। और वहाँ के मुसलमान सौहार्द्र से रहते हैं। बात परिस्थिति की ज्यादह है, संस्कारों की कम, क्योंकि जो अपरिवर्तनीय है वह तो अपरिवर्तनीय होना ही अपनी ताकत मानता है।

और ये सोशल मीडिया पर जितने भी ज़ोर शोर से दहाड़ते ‘कीबोर्ड शेर’ हैं, कोई भी वैसी जगह से नहीं है। इसी लिए शुरुआत में कहा कि जिस दिन हिन्दू स्वयं अपनी गली मोहल्ले के उपद्रवी मुसलमान झुंड से निपटने के काबिल होगा, सब बनेगा। आज केवल “सामने देखो ये हो रहा है, वो हो रहा है” की कभी सच्चाई, कभी अफवाहों से खुद डरता है और बाकियों को डराता है।

अंत में एक विशेष प्रश्न। इसे कृपया आत्मस्तुति न कहें, लेकिन क्या गत पाँच वर्षों में आत्मरक्षा पर सम्पूर्ण वैध और doable पद्धतियों पर कोई और लिखता है? कई लोग लिखते हैं अपने कलेक्शन पर, शस्त्रों की जानकारी देनेवाले लेख भी लिखते हैं लोग, लेकिन उनमें से कितना कानून से वैध और करने योग्य पाते हैं आप लोग?

फिर भी, कोरी वाहवाही के सिवा मेरे लेखन की ठोस उपलब्धि क्या है आप के बीच? आज तक किसी ने कुछ भी नहीं बताया।

मुझपर गुस्सा होना या मुझे गालियां देने से परिस्थिति बदलती हैं, तो जी भर गालियां दीजिये। अन्यथा परिस्थिति बदलने के लिए क्या करना होगा इसपर सोचिए।

अवैध शस्त्रों की आवश्यकता नहीं है। अवैध शस्त्र खरीदने का मैं समर्थन नहीं करता क्योंकि शस्त्र, अभ्यास का विषय है, बिना अभ्यास के काम नहीं आता और आम हिंदुओं के लिए अवैध शस्त्रों से अभ्यास करना यानी लेने के देने पड़ने की गारंटी है। लेकिन फिर भी हाथ पाँव फुलाने की आवश्यकता नहीं है।

हिंदुओं ने न अपने नेरेटिव को कभी महत्वपूर्ण समझा, न अपने लोगों को सपोर्ट करना

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