जल संकट : भारतीय शैली पर कमोड बनाकर बैठा पाश्चात्य प्रभाव

अकाल, बाढ़, भूकम्प और प्रदूषण ये चार ऐसे कारक हैं जो इस शस्य श्यामला धरा को जीवन्तता हीन करते रहते हैं। पहले तीन कारक प्रकृति प्रदत्त हैं जबकि आखिरी कारक मानव निर्मित है।

प्रदूषण चार प्रकार का है – मृदा प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण। जल प्रदूषण और जल संकट और उस पर पश्चिम पर आरोप, हमारे नव बुद्धिजीवियों को थोड़ा सांप्रदायिक, दकियानूसी, गँवारपने से ओतप्रोत और फालतू लगेगा, पर अनुरोध है कि आलोचना के लिए ही सही पर पूरा पढ़ें।

सनातन धर्म सदैव पर्यावरण के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है। प्रायः साष्टांग दण्डवत और नत मस्तक होकर हाथ जोड़ने से ही अधिकांश श्रद्धांजलि ईश्वर तक समर्पित हो जाती है। उपवास कर लेने से भी श्राद्ध कर्म करने का फल मिल जाता है और तीर्थों के नामोच्चार से ही हज और उमरा जैसे कठोर कर्मकांड का पुण्यलाभ संभव हैं।

गाय को चारा, चिड़िये को दाना, चींटी को शक्कर या गुड़ देना भी शास्त्रों में अनिवार्य नहीं है बल्कि अपना भोजन करते समय ईश्वर को अर्पित थोड़ा अंश और भोजन करने के बाद अनिवार्य रूप से छोड़ा गया उच्छिष्ट ही क्रमशः गोग्रास और अन्य जीव के योगक्षेम हेतु पर्याप्त है।

पर पदत्राण पहनकर तथा ‘कृपया जूठन न छोड़ें’ लिखे हुए टेबल कवर से सज्जित डाइनिंग टेबल पर भोजन करते और कार्बोनेटेड शीतल पेय गटकते अधरराग रंजित अधरोष्ठ वाली आधुनिकाओं और टाई वेष्टित ग्रीवायुक्त प्रगतिशीलों के लिए तो गाय को रोटी, चींटी को बूरा, मछलियों को आटे की गोली और परिंदों को बाजरे का दाना चुगाना आदि प्रकृति-प्रेम-प्रदर्शन, एक रिलीजियस फैशन, आधुनिकता की इमारत पर जड़ों से जुड़ने का पैशन फैशन और सेल्फी स्टाइल हेतु परफैक्ट स्टाइल या (गुप्त रूप से) किसी टीवी वाले बाबा का कालसर्प दोष निवारण नुस्खे से ज्यादा कुछ नहीं है।

खैर लौटता हूँ मैं जलसंकट हेतु पाश्चात्य प्रवृत्तियों पर दोषारोपण वाली बात पर।

हमारे भारत में जो साँप और साधुओं का देश रहा है वही पाश्चात्य प्रचार के अनुसार एक और दोष से दग्ध रहा है, वह है खुले में शौच और थोड़े शहरीकरण के बाद भारतीय संडास युक्त इनहाइजेनिक शौचालय का। यह बात भी सच है कि ये संडास उपयोग प्रक्रिया भी खुले में शौच का ही एक परिमार्जित रूप है।

‘खुले मे शौच’ शब्द भारतीय नेताओं को इतना निंदनीय लगा कि कुछ को ‘कैटल क्लास’ की याद आई तो कुछ को ‘जहाँ सोच वहाँ शौचालय’ का नारा देना पड़ा। और पाश्चात्य अनुकरण के कारण वेस्टर्न टॉयलेट सीट मय फ्लश और जेट, आधुनिक शिक्षित परिवार का अभिन्न भाग बन गए।

कुछ शिक्षित और आधुनिक तबका तो होटल के उस कमरे में रहना नाकाबिल ए बर्दाश्त मानता है जिसमें संडास की व्यवस्था हो। यहाँ तक अपनी देसी पिछड़ेपन पर जितना हँसना हो हँस लीजिए पर एक बात अभी भी बाकी है कि जल संकट के कारकों की सूची में संडास वर्सेज वेस्टर्न कमोड कैसे?

तो आपने कभी सोचा है कि खुले में शौच या अपना भारतीय अंदाज वाला संडास विदेशी कमोड के आगे हास्यास्पद भले ही प्रचारित हो पर उपयोग करने पर सिर्फ डेढ़ या दो लीटर पानी नष्ट होने देता है और नदी नाले के परास में खुले में शौच की स्थिति में पानी का जीरो वेस्टेज करता है।

वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य कमोड जेट और फ्लश के साथ प्रयोग की स्थिति में लगभग दस लीटर पानी बर्बाद करता है। अब फिर आपसे स्मित हास की अपेक्षा है पर शायद वजह बदलेगी ज़रूर।

अब एक चिंतन की बात…

भारतीय संडास तो खुले में शौच का ही थोड़ा ढँका छिपा और परिमार्जित रूप है और प्रयोग का तरीका भी वही है, पशुवत (सभ्य भाषा में) पर पाश्चात्य शैली प्रयोगकर्ताओं के पूर्वज इस हिन्दी में (४) चार के कटाव वाले ढाँचे या ओखली नुमा संरचना के बगैर नित्यक्रिया कैसे करते होंगे और वह भी फ्लश और जेट के बगैर (जो ओवरहेड टैंक और आधुनिकतम आविष्कार बिजली के बगैर संभव ही नहीं) धोने आदि का काम कैसे करते होंगे…

बस फिर सोचिए और मुस्कुराइए। फिर एक बार सोचिए कि ऊर्जा के अपव्यय और पानी का विनाश की बात, और बताइए जल संकट में इस पाश्चात्य अनुकरण का प्रत्यक्ष परिणाम।

‘जहाँ सोच वहाँ शौचालय’ का नारा बुलंद करने वाले राजर्षि यह सोच नहीं पाए कि जहाँ बेघर आबादी के लिए जाड़े में सरकारी व असरकारी संगठनों द्वारा रैन बसेरे बन रहे हैं वे कौन सी सोच पालें और कहाँ शौचालय बनवाएँ। नारे में क्या भीषण बदलाव है, ‘कैसी सोच कैसा शौचालय’!

वैसे एक असरकारी संगठन ‘सुलभ’ नाम रखकर शौचालय की शहरी दुर्लभता को भुनाकर दस रुपये प्रति व्यक्ति प्रयोग से अरबों कमा चुका है, कमा रहा है और कमाएगा और गाँवों में जहाँ निर्धन और साधनहीन आबादी के पास घर बनाने को ज़मीन नहीं उनके लिए शौचालय तो हवामहल जैसी सोच है, मतलब घर में नहीं दाने पर अम्मा चली भुनाने!

अब एक और कारक है जल अपव्यय का, वह है घर के अंदर स्नान यानी बाथरूम कल्चर। ये वो जगह है जहाँ भारत के काले अंग्रेज़ यानी नौकरशाह अक्सर पाए जाते हैं, अगर आपने इन की तलाश में इन के दौलतखाने पर दस्तक दी तो।

खैर बात थी पाश्चात्य तरीके से स्नान की वजह से जल के अपव्यय की तो आपको ये बताना लेखक का दायित्व बनता है कि आर्य संस्कृति में स्नान एक दैवीय और अलौकिक कर्म है, किसी रामसे ब्रदर्स की हॉरर मूवी का अनिवार्य हिस्सा नहीं।

सनातन धर्म के तीन स्तंभ ब्रह्मा, विष्णु और महेश में किसी के भी स्नान करने का दृश्य कभी नहीं लिखा गया है पुराणों में। देवियों में सिर्फ़ माँ लक्ष्मी के दिव्य गजों के द्वारा स्नान या अभिषेक होने को चित्रित किया गया है। और आपको पता है कि माता लक्ष्मी ऐश्वर्य के चरम स्थिति की प्रतीक हैं।

हड़प्पा मोहनजोदाड़ो के उत्खनन में प्राप्त विशाल स्नानागार को क्या आप कॉमन बाथरूम मानने की भूल कर सकते हैं? राजाओं का जीवन में मात्र एक बार राज्याभिषेक, स्नान की विशिष्ट स्थिति को बताने को काफी है।

आप जानते होंगे कि गुरु के यहाँ पूर्ण शिक्षा प्राप्त करने और सत्यापित होने के बाद उसे गुरु की आज्ञा से स्नान करने के बाद स्नातक की उपाधि मिलती थी। आज भी मास्टर्स डिग्री को परास्नातक कहने की परंपरा जारी है। पर क्यों, यह जानने की ज़हमत उठाए कौन?

श्रवणवेलगोला में भगवान बाहुबली का महामस्तकाभिषेक, स्नान को दुर्लभ घटना होने का एक और साक्ष्य है तो भारत में चार विभिन्न संगमों में क्रमशः महा कुंभ का आयोजन स्नान को आस्था का चरमोत्कर्ष माना जा सकता है।

भारतीय संस्कृति में नदी या तालाब में स्नान तो स्वीकार्य है जिसमें जल का अपव्यय कदापि नहीं होता है पर विद्युत ऊर्जा के उपयोग से जल को मकानों, कोठियों या महलों के ऊपर जल संचय कर बंद कमरों में स्नान न तो स्वास्थ्यप्रद माना जा सकता है और न इको फ्रैंडली।

गाँवों में कुएँ की जगत के इर्द गिर्द स्नान भी जल का अपव्यय नहीं होने देता। स्नान अगर अनिवार्य होता तो भारतवर्ष मे तीर्थों का फैलाव हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर थार के मरुस्थलों में भी है। और इन तीर्थों में स्नान अनिवार्य हो तो, या तो जल के अभाव में प्यासे ही या ठंड के मारे सारे तीर्थ यात्री भगवान को प्यारे हो जाएँ।

पर यात्राएँ बदस्तूर आज भी जारी है और आपद्धर्म के सिद्धांत के अनुरूप, ऊर्णः वातेन शुद्ध् यति और पश्चिमे चर्मोदकम्। अगर स्नान इतना अनिवार्य होता तो यह मंत्र अस्तित्व में आता क्या?

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाड़्गतोऽपि वा
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षम् स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु।।

जल को ईश्वर तुल्य मानते हुए अपनी रचना ‘गंगा स्तुति’ में कवि विद्यापति लिखते हैं कि –

एक अपराध छेमब मोहि जानी
परसल माए पाए तुअ पानी।।

इस मैथिली रचना का शाब्दिक अर्थ है कि ‘हे माँ गंगा, आप मुझे अपना समझ कर मेरा यह एक अपराध क्षमा करें कि नहाने के क्रम में मैंने पैरों से आपके पवित्र जल का स्पर्श किया है।’ अगर स्नान एक अनिवार्य और सामान्य बात होता तो कवि के मन में अपराधबोध हो ही नहीं सकता था, पर हुआ क्योंकि स्नान एक सामान्य घटना नहीं है।

इसका सामान्य तात्पर्य बस इतना है कि हमारी संस्कृति पंच तत्वों का सम्मान ईश्वरवत् करता है और जल संकट जैसा शब्द भी अपने जीवन में पश्चिमी आक्रांताओं के साथ ही आया।

आमतौर पर बाथरूम में प्रयुक्त जल नालियों से होकर सीवर पाइप के रास्ते अन्य गंदगियों के साथ किसी न किसी नदी में मिलकर उसके जल को प्रदूषित करता है या भूमिगत जल को अशुद्ध।

अगर बाथरूम और टॉयलेट के विशाल जल अपव्यय को छोड़ दिया जाए तो पीने और भोजन बनाने में चार पाँच सदस्यों वाले एक परिवार को 50 लीटर से कम पानी में दिन भर काम चल जाएगा। इसकी पुष्टि शहरों के जनता फ्लैट निवासी या राजस्थान और गुजरात के मरुभूमि निवासी सहज रूप से कर देंगे।

हमारे कर्म कांड, रीति रिवाज, दैनन्दिन आचार आदि इको फ्रैंडली ही हैं।

मार्कण्डेय पुराण तो प्रकृति संरक्षण की स्थिति में युगों युगों तक मनुष्यों के वंशजों की इस शस्य श्यामला धरा पर सुखद और निर्विघ्न अवस्थिति का आश्वासन देता है।

श्लोक कुछ यूँ है…

यावद्भूमण्डलम् धत्ते सशैलवन काननम्
तावत्तिष्ठति मेदिन्याम् संततिः पुत्र पौत्रिकी।।

पर पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से आजकल हम भारतीय बोतलबंद पानी तो खरीद ही रहे हैं या खरीदने को विवश हैं, पर आने वाले दिनों में बोतलबंद प्राणवायु और पैकेटबंद स्पेस या आकाश खरीदने को भी बाध्य हो जाएँगे!

उत्तिष्ठ भारत

बिना पैसे की दवा है गंगाजल, बचा सकते हैं तो बचा लीजिए

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