नमन उस वीरांगना को जिनके स्मरण मात्र से नस-नस में दौड़ जाती हैं विद्युत तरंगें

एक ओर महारानी लक्ष्मीबाई का जीवन-चरित्र, तो दूसरी ओर आज के कुल ड्यूड बेबियों की छुई-मुई अदा और नाज़ो-नख़रे!

लक्ष्मीबाई के देश की कूल ड्यूड बेबियाँ ”क्या अदा, क्या जलवे तेरे” पर मुग्ध होकर रीझ-रीझ जा रही हैं।

पूरा देश ही पारो और देवदास हुआ जा रहा है। प्रसाधन-उद्योग ने पूरे देश को सौंदर्य-प्रतियोगिताओं का बाज़ार बना दिया है। माँ-बहन-बेटियाँ-बहू जैसे संबोधन बेमानी हो गए हैं; स्त्रियाँ केवल उत्पादों को परोसने वाली उपकरण बनकर रह गई हैं।

महिला सशक्तिकरण के झंडाबरदारों ने बराबरी की होड़ कर स्वयं को भोग्या ही बनाया है। आधुनिकता के नाम पर निर्लज्ज खुलेपन को बढ़ावा दिया जा रहा है| ‘शीला’ जवान हो रही हैं तो ‘मुन्नी’ बदनाम; और ऐसी जवानी व बदनामी पर ”वीर जवानों” का पूरा-का-पूरा ”देश’ ही लट्टू हुआ जा रहा है।

वीरता व धीरता के स्थान पर ऐन्द्रिक कामुकता या भीरुता हमारी पहचान बनती जा रही है। त्याग-तपस्या के स्थान पर महाभोज की तैयारियाँ चल रही हैं। चौकों-छक्कों या ठुमकों-झुमकों पर मुग्ध पीढ़ी, नकली सितारों में नायकत्व ढूँढ़ रही है। नकली भवों, पुते गालों और कजरारे नयनों में लक्ष्मीबाई जैसे उज्ज्वल और धवल चरित्र समा भी नहीं सकते।

ज़रा कल्पना कीजिए, दोनों हाथों में तलवार, पीठ पर बच्चा, मुँह में घोड़े का लगाम; हजारों सैनिकों की सशस्त्र भीड़ को चीरती हुई एक वीरांगना अंग्रेज़ों के चार-चार जनरलों के छक्के छुड़ा देती है; क्या शौर्य और पराक्रम का इससे गौरवशाली चित्र कोई महान चित्रकार भी साकार कर सकता है?

जो सचमुच वीर होते हैं वे अपने लहू से इतिहास का स्वर्णिम चित्र गढ़ते हैं। महारानी लक्ष्मीबाई, पद्मावती, दुर्गावती ऐसी ही दैदीप्यमान चरित्र थीं। पूरे विश्व इतिहास में महारानी लक्ष्मीबाई जैसा चरित्र ढूँढे नहीं मिलता, यदि उन्हें विश्वासघात न मिलता तो विश्व-इतिहास में उनकी गणना किन्हीं और अर्थों में ही होती।

नमन है उस वीरांगना को जिनके स्मरण मात्र से नस-नस में विद्युत तरंगें दौड़ जाती हैं… काश… काश कि इस देश की ललनाएँ लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं से प्रेरित-पोषित हों…!

ऐसी वीरांगना की जयंती पर हृदय की गहराई से शत-शत नमन!

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