मप्र में किसान भाजपा से नाराज, दो अत्यधिक धनी किसानों से बात करके मीडिया का दावा!

आज के इंडियन एक्सप्रेस ने एक समाचार छापा है जिसमें जिसके अनुसार मध्य प्रदेश के किसान विधान सभा चुनावो में भाजपा को वोट नहीं देंगे।

हरीश दामोदरन के द्वारा लिखी गई रिपोर्ट में दो किसानों से हुई बातचीत का उल्लेख है। एक किसान, कैलाश पटेल के पास 35 एकड़ जमीन है जबकि दूसरे, राम सिंह चौधरी के पास 52 एकड़ कृषि योग्य भूमि है।

दोनों की नाराज़गी का कारण यह है कि मंडी में अनाज बेचने के बाद उन्हें सिर्फ 10,000 रूपए कैश मिलता है, बाकी बैंक में भेजा जाता है।

उनकी शिकायत है कि व्यापारी उनका पैसा भेजने में 7 से 8 दिन लगा देते हैं और उसके बाद उन्हें बैंक में जाकर कैश निकालना पड़ता है। इसके अलावा यह भी शिकायत है कि अगर 50,000 रूपए से अधिक कैश निकाला जाए तो उसके लिए पैन नंबर देना होता है।

अनाज तिलहन व्यापारी संघ के सचिव जितेंद्र अग्रवाल के अनुसार पहले वह 500 और 1000 रुपए की गड्डियां बैग में भरकर लाते थे और किसानों को प्रतिदिन एक करोड़ पेमेंट में दे देते थे।

वह कहते हैं कि इस नई व्यवस्था, जिसमें उन्हें बैंक में पैसा भेजना पड़ता है उसके कारण व्यापारियों के पास कम पूंजी रह गई है और पेमेंट में भी देरी होती है।

मुझे उत्सुकता हुई कि भारत में किसानों के पास औसत कृषि योग्य भूमि कितनी है। इस वर्ष जारी आंकड़ों के अनुसार केवल 13% किसानों के पास 5 एकड़ से अधिक भूमि है। दो तिहाई किसानों के पास ढाई एकड़ से भी कम कृषि योग्य भूमि है। मध्यप्रदेश में एक किसान के पास औसतन साढ़े चार एकड़ भूमि है।

इसके अलावा पत्रकार महोदय ने यह भी जांच पड़ताल नहीं की कि क्या व्यापारी जानबूझकर पेमेंट देरी से भेज रहे हैं जिससे डिजिटल व्यवस्था को बदनाम किया जा सके क्योंकि नियमानुसार पेमेंट अनाज की खरीदारी के दिन ही भेज देना चाहिए।

उन्होंने बैंकों में भी जाकर जांच पड़ताल नहीं की कि अनाज खरीदने के कितने दिन बाद बैंकों में किसानों का पेमेंट पहुंचता है?

और हां, सरकार को जितेंद्र अग्रवाल के बैंक अकाउंट चेक करने चाहिए कि वह किसानों को भुगतान के लिए एक करोड़ रुपए प्रतिदिन कहां से लाते थे? और उस पैसे से होने वाली आय पर उन्होंने कितना आयकर तथा अन्य टैक्स दिया?

इसे कहते हैं झूठा नैरेटिव सेट करना। दो अत्यधिक धनी किसानों से बात करके इंडियन एक्सप्रेस ने लिख दिया कि मध्यप्रदेश में किसान भाजपा से नाराज हैं।

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