2019 का लोकसभा चुनाव : भारत और हिन्दुओं के अस्तित्व का निर्णायक युद्ध!

मैंने कुछ दिनों पहले, आज से करीब 160 वर्ष पूर्व, हेनरी नॉक्स द्वारा लिखा हुआ यह पढ़ा था –

“Something is wanting, and something must be done, or we shall be involved in all the horror of failure, and civil war without a prospect of its termination.”
@Henry Knox

इसका हिंदी में अनुवाद कुछ इस तरह है कि –

“सिर्फ आज का ही समय हमारे पास है, अभी भी सम्भल जाओ, नहीं तो भयानक गलती करते हुए, गृहयुद्ध की तरफ चले जाओगे, जिसका रुकना असंभव हो जायेगा।”

19वीं शताब्दी के मध्य में, अमेरिका के गृहयुद्ध के शुरू होने से पहले, हेनरी नॉक्स ने अमेरिका के दक्षिणी राज्यों के दास स्वामियों और उनका समर्थन कर रहे राजनीतिज्ञों, न्यायाधीशों, व्यापारियों, बुद्धिजीवियों और शासन तन्त्र में बैठे लोगों को जो, भविष्य की भयानकता का दर्शन कराने वाले, चेतावनी भरे वाक्य बोले थे, वो आज डेढ़ शताब्दी बाद, भारत के वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक परिदृश्य में सोलह आना ठीक बैठते हैं।

जैसे जैसे भारत, 2019 में एक बार फिर नई सरकार के चुनाव की तरफ बढ़ रहा है वैसे वैसे भारत, उसकी संवैधानिक आत्मा व उसके हिन्दुओं को तोड़ने व उसके मान को कुचले जाने के प्रयासों में तीव्रता आ गयी है।

यह सब जो कुछ हो रहा है वह कोई बाहर से आकर नहीं कर रहा बल्कि यह अंदर ही पाली पोसी गयी शक्तियां हैं, जो भारत व हिंदुओं के अस्तित्व के काल के रूप में पोषित की गई है। यह जो हो रहा है वो अराजक ज़रूर है लेकिन यह सब भारतीय न्यायपालिका द्वारा वैध रूप से संरक्षित है।

आज जिस निर्लज्जता से न्यायालय के धीशों द्वारा, भारत के संविधान प्रदत्त अधिकारों की सीमाओं को नेपथ्य में ढकेलते हुये, भारत व हिन्दुओं की आत्मा पर कुठाराघात किया जाने लगा है, वह न सिर्फ अविश्वसनीय है बल्कि ऐसा कोई दूसरा उदाहरण विश्व भर में नहीं मिलता है।

भारत की जनता के प्रति किसी भी उत्तरदायित्व से स्वयं को मुक्त रख, परिवारवाद के समर्थक माननीयों ने न्याय के तन्त्र को उस स्तर पर पहुंचा दिया जहां से ये विघटनकारी तत्वों के प्रतिबिंब होने का भान देते दिख रहे है।

भारत में जो उथल पुथल हो रही है और जो राष्ट्रवादियों/ हिन्दुओ में न्याय द्वारा उद्दंडता से, उनसे अन्याय किये जाने की बेचारगी क्रंदन कर रही है, वो उस काल के सन्निकट होने की तरफ इशारा कर रही है, जो उन घटनाओं की श्रृंखला को जन्म देगी, जहां लोकतंत्र का अपमान कर, न्याय को दूषित करने वालों के अस्तित्व को जनता से ही चुनौती मिलेगी।

मुझे यह यकीन होता जा रहा है कि केंद्र की वैधानिक रूप से निर्वाचित, संघीय ढांचे की सरकार का, जिस धृष्टता से कांग्रेसियों, वामपंथी सेक्युलरों, माओवादियों, न्यायाधीशों और विदेशी शक्तियों के दासों द्वारा तिरस्कार किया जा रहा है, वो अपने अंतिम चरण में गिद्धों और सियारों को न्योता देने वाला सिद्ध होगा।

भारत और उसके हिन्दुओं के दर्शन व आस्था के विरुद्ध खड़ा भारत का एक वर्ग, एक के बाद एक, ऐसी गलतियां करता जा रहा है जहाँ से मुझे उसकी वापसी की सारी गुंजाइशें खत्म होती दिख रही है।

जबसे केंद्र में भारत की प्रथम राष्ट्रवादी सरकार आयी है तभी से, भारत के संघीय और संवैधानिक ढांचे को चरमरा कर, भारत को घुटने के बल ले आने का प्रयास तेजी से हो रहा है। यह एक अंतराष्ट्रीय एजेंडा है जिसे भारत के विपक्ष को ढाल बनाकर, वैटिकन चर्च, चीन, वहाबी इस्लाम और भारत को सिर्फ बाज़ार बनाये रखने वाली शक्तियां अपनी सहभागिता दे रहे हैं।

इन बाह्य शक्तियों के आंतरिक सहायक, भारतीय वामपंथी, माओवादी, कांग्रेसी और विदेशी पैसों से पलने वाले तथाकथित मानवतावादी और बुद्धिजीवी हैं, जो अपने छद्म बुद्धिजीविता के विकार से उत्पन्न, अहम और दम्भ में, भारत से देश द्रोह को सामाजिक प्रतिष्ठा और मान्यता दिलाने की भूल कर बैठे है।

आज जब यह लोग, अपने पिछले 4 वर्षों के प्रयास में सफलता न मिल पाने से अवसाद ग्रसित हैं, तब न्यायपालिका में घुसे इनके सहयोगियों को निष्पक्षता का चोला उतार कर, उनको संजीवनी व प्रश्रय देना पड़ रहा है।

जब न्याय और लोकतंत्र की व्याख्या करने वाले ये माननीय, चिदंबरम को स्टे पर स्टे देकर, जेल जाने से बचा रहे हैं, तो वे भ्रष्टाचार में सहयोगी नहीं हैं?

जब नेशनल हेरल्ड केस में जमानत लिये घूम रही सोनिया और राहुल गांधी को माननीय, न्यायिक प्रक्रिया को खींच खींच कर, उनको जेल भेजने से शर्मा रहे हैं तो वे 10 जनपथ के पोषित नहीं है?

हिन्दू आस्थाओं और मान्यताओं पर क्रूरतम प्रहार करने वाले माननीय, हिन्दू विरोधी शक्तियों के सहयोगी नहीं है?

आधुनिक आयुधों से सम्पूर्ण जिस लड़ाकू विमान राफ़ेल के भारतीय वायुसेना में शामिल होने से चीन और पाकिस्तान परेशान हैं और उससे सम्बंधित गोपनीय जानकारी को प्राप्त करने के लिये प्रयासरत हैं, उसको माननीयों द्वारा सार्वजनिक पटल पर लाना, उन्हें भारत के शत्रु देशों पाकिस्तान व चीन का हितैषी नहीं बनाता है?

भारत के प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाने वालों को, हत्या जैसे जधन्य अपराध का प्रत्यक्ष दोषी न मान कर, माननीय उन्हें जेल भेजने की जगह घर की सुविधाओं में ही कैद रखने का निर्णय देते हैं, तो प्रधानमंत्री की हत्या के पक्षधर नहीं हैं?

बलात्कारी बिशप को 15 दिन में ज़मानत पर छोड़, मुख्य गवाह को मरने के लिये छोड़ देने वाले माननीय धृतराष्ट्र नहीं हैं?

ये न्याय किस बौद्धिकता का दर्शन करा रहा है?

इसमें कभी भी कोई दो राय नहीं हो सकती है कि कोई भी राष्ट्र, गृहयुद्ध कभी भी नहीं चाहता है और वह हरसंभव प्रयास कर उसको टालना चाहता है, लेकिन जब संवैधानिक दीवारों और बहुसंख्यकों की अस्मिता को तोड़ने, न्याय के आलयों से आते पदचाप सुनाई पड़ते है तब राष्ट्र, चाह कर भी उस गृहयुद्ध से वापस नहीं लौट सकता है।

अब वह समय आ गया है कि जब हम लोगों को यह तय करना है कि गृहयुद्ध से बचा जाये या फिर उसी में भारत को ध्वस्त हो जाने दिया जाये।

इसको हम तभी टाल सकते हैं जब हम 2019 में माननीयों व उनके द्वारा परिवारवाद से ग्रसित बनाये गये न्यायिक तन्त्र के विरुद्ध जनमत देकर, 400 सीटों से ऊपर की नरेंद्र मोदी की सरकार बनाएं और पूरे तन्त्र को ही बदल डालें…

अन्यथा 2019 भारत व हिन्दुओं के लिये 712 साबित होगा जब मोहमद बिन कासिम ने सिंध में राजा दाहिर को हरा कर भारत व उसके हिंदुओं को पहली बार गुलाम बनाया था।

क्या भारत के सर्वोच्च न्यायालय के गर्भ में गृह युद्ध व राष्ट्र का विनाश पल रहा है?

Comments

comments

loading...

1 COMMENT

LEAVE A REPLY