विषैला वामपंथ : धंधा फायदे का है

ग्राफीति क्या होती है, जानते ही होंगे। दीवारों पर स्प्रे पेंट से की गई छेड़छाड़। लंदन की दीवारों पर खूब मिलता है।

कई बार ऐसी असंभव जगहों पर कि सोचना पड़ता है कि लिखने वाला वहाँ पहुँचा कैसे होगा। कुछ भी लिखा मिलता है… किसी का नाम, कोई गाली से लेकर पॉलीटिकल नारे। कई बार कई अच्छी कलाकृतियाँ भी दिखाई देती हैं।

यूँ तो ग्राफीति बनाना लगभग हर जगह गैरकानूनी है लेकिन दुनिया का कोई शहर नहीं होगा जहाँ यह मौजूद नहीं हो। कौंसिल भी इन्हें हटाने या पेंट करवाने के फेर में नहीं पड़ती। कुछ ग्राफीति तो इतने कलात्मक होते हैं कि उन्हें अपने आप में महान कलाकृतियों का दर्जा हासिल है।

इन ग्राफीति आर्टिस्ट्स में जो सबसे प्रसिद्ध नाम है, वह है इंग्लिश कलाकार बैंक्सी। हालाँकि यह उसका छद्म नाम था और बहुत समय तक लोग नहीं जानते थे कि यह व्यक्ति है कौन। पर आज उसकी पहचान मालूम है।

वह 40-45 साल का व्यक्ति है, ब्रिस्टल का रहने वाला। उसकी ग्राफीति दुनिया के अनेक शहरों में है, और कई तो करोड़ों में बिकती हैं। वह जिसके घर की दीवार को ग्राफीति बनाने के लिए चुन ले उसके तो वारे-न्यारे। लोगों ने घर की पूरी दीवार तुड़वा कर बेच दी है, और उसकी ग्राफीति कई जगह म्यूजियम में रखी है।

उसकी बनाई ग्राफीति में कई संदेश छुपे बताए जाते हैं। उसकी बेहद प्रसिद्ध ग्राफीति में से एक है जिसमें एक छोटी सी बच्ची एक सैनिक की तलाशी ले रही है, और सैनिक ने हथियार डाल दिये हैं। यह शांति का संदेश माना गया है। एक में एक औरत घर में झाड़ू देकर धूल को कार्पेट के नीचे डालती हुई दिखाई गई है और इसे व्यवस्था पर व्यंग्य माना गया है। गाज़ा पट्टी में एक दीवार पर बनाई हुई एक ग्राफीति में पत्थर फेंकते हुए एक फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारी के हाथ में पत्थर की जगह एक गुलदस्ता दिखाया गया है…

हालाँकि मुझे बैंक्सी के पॉलीटिकल झुकाव के बारे में अलग से कुछ नहीं पता लेकिन समझना कठिन नहीं है। यह स्टैण्डर्ड बाज़ारवाद का विरोध, शांति, समानता टाइप की लिबरल थीम है।

कुछ दिन पहले बैंक्सी की बनाई हुई एक ग्राफीति बहुत प्रसिद्ध हुई। एक छोटी सी बच्ची के हाथ से हार्ट के शेप का एक गुब्बारा उड़ कर जा रहा है जिसे वह पकड़ने का प्रयास कर रही है। उसकी इस ग्राफीति का एक प्रिंट पिछले दिनों साउथबी की एक नीलामी में एक मिलियन डॉलर में बिका।

लेकिन जैसे ही इस पेंटिंग की नीलामी पूरी हुई, एक अजीब घटना हुई जिससे सभी चकित रह गए। पेंटिंग खुद अपने फ्रेम से निकल कर टुकड़े टुकड़े होने लगी।

बैंक्सी ने अपनी पेंटिंग के फ्रेम में ही एक श्रेडर लगा दिया था। रिमोट कंट्रोल से वह पेंटिंग उस श्रेडर से होकर गुजरी और उसके पतले पतले चिथड़े फ्रेम से बाहर निकल कर लहराने लगे।

लेकिन तभी एक और कमाल हुआ। इस श्रेडर की मैकेनिज़्म में कुछ खराबी आ गयी और वह पेंटिंग पूरी तरह नष्ट नहीं हुई। आधी पेंटिंग बच गई और बाकी आधी फ्रेम से लटकती रही। अब यह एक और ही अनूठी स्थिति थी और उस अधूरी फटी हुई पेंटिंग की कीमत पहले से भी ज्यादा हो गई।

पता नहीं, बैंक्सी का यही प्लान था या सचमुच ही श्रेडर में कोई खराबी आई थी। बैंक्सी का दावा था कि उसका यह प्लान कला की नश्वरता के बारे में एक स्टेटमेंट था… पर इस स्टेटमेंट देने के पहले वह एक मिलियन डॉलर लेना नहीं भूला। बल्कि उसके इस स्टंट ने उस कलाकृति की कीमत और बढ़ा दी।

कला की दुनिया ऐसे ही स्टंट से भरी पड़ी है। यहाँ कौन सा कलाकार प्रसिद्ध हो जाता है, कौन महान कहलाता है इसका कोई हिसाब नहीं है। बैंक्सी की कलाकृतियाँ कम से कम देखने में सुंदर हैं, और उनमें टेक्निकल डिटेल्स हैं। लेकिन मॉडर्न आर्ट के नाम पर ऐसी कितनी ही कलाकृतियाँ और कलाकार हैं जिनका कोई सर पूँछ है ही नहीं। पर वे महान गिने जाते हैं और करोड़ों में बिके।

कला, फैशन और मॉडलिंग… ये कम से कम तीन ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें प्रसिद्धि और महानता का रास्ता बेहद अबूझ है। जहाँ हज़ारों गुमनामी और गरीबी में दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाते वहीं किसी एक को वह दर्जा मिल जाता है कि उनका नाम बिकता है… उनके पेशाब से चिराग जल जाते हैं।

बैंक्सी के बारे में मुझे बेटे ने बताया। उसी ने पूछा, कोई कैसे किसी की कोई पेंटिंग करोड़ों में खरीद लेता है?

मैं इसका जवाब सोचने लगा। जब कोई एक मिलियन डॉलर लगा कर एक पेंटिंग खरीद लेता है तो यह एक इन्वेस्टमेंट है। एक मिलियन डॉलर कहीं गया नहीं है। वह पेंटिंग अपनी किसी कलात्मक गुणवत्ता के लिए नहीं भी तो सिर्फ एक मिलियन में बिकने की वजह से प्रसिद्ध हो जाती है। अब उसकी प्रसिद्धि में यह एक मिलियन का इन्वेस्टमेंट सुरक्षित है। कल को यह उससे ज्यादा में ही बिकेगी। और काला धन छुपाने के यह बेहद आसान तरीका भी है। यह एक तरह की करेंसी है… कागज़ का टुकड़ा, जिसका मूल्य उसके सांकेतिक मूल्य से निर्धारित होता है।

पर इसमें उससे भी बड़ा एक इन्वेस्टमेंट सुरक्षित है। पावर का इन्वेस्टमेंट। जिस कला के पारखी आर्ट डीलर ने उस पेंटिंग और पेंटर को प्रसिद्ध बनाया उस के पास एक तरह की पावर आ गयी। वह किसी भी पेंटर को प्रसिद्ध बना सकता है। इसके साथ उस पेंटर में भी एक पावर आ जाती है… अब वह चूँकि प्रसिद्ध है इसलिए उसकी बात सुनी जाएगी और यह अपने आपमें एक बड़ी पावर है।

अब उस पेंटर में प्रसिद्धि की जो पावर है, उसका प्रयोग कहाँ होता है? चूँकि वह पेंटर अपनी प्रसिद्धि के लिए किसी और का ऋणी है इसलिए वह अपनी पावर को अपने पैट्रन के हितों और रुचियों के अनुरूप ही प्रयोग करता है।

इसलिए कौन सा कलाकार प्रसिद्धि और महानता के इस अनुदान के लिए चुना जाता है, इसका चयन कैसे होता है, इसके पीछे की विचार प्रक्रिया को समझना है तो यह देखें कि वह महान कलाकार अपने प्रभाव का प्रयोग किस दिशा में करता है। बिल्कुल यही बात मॉडलिंग, फैशन और सिनेमा, साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में भी लागू होती है।

हम यह जानते हैं कि इन सभी क्षेत्रों में वामपंथी प्रभाव बहुत गहरा है। इन क्षेत्रों के जितने भी मूर्धन्य नाम हैं वे वामपंथी हैं। पर आप इस लॉजिक को पलट कर देख सकते हैं। बल्कि जो वामपंथी हैं, वे ही मूर्धन्य गिने गए हैं। इस चयन प्रक्रिया में यह बायस बिल्ट-इन है, समाहित है।

प्रसिद्धि और प्रभाव का एक स्थापित प्रवाह है जो वाममार्ग में चलता है। अगर आप उस प्रवाह के साथ चलते हैं तो आपको अपने गुणग्राहकों, पैट्रन्स का वरदहस्त मिलेगा। बदले में आपको उनकी वांछित दिशा में चलकर, उनकी बोली बोलकर उनका ऋण चुकाना है।

आपकी प्रसिद्धि आपके प्रभाव को बढ़ाती है और उनके प्रभाव और शक्ति को भी बढ़ाती है जिसने आपको प्रसिद्ध और प्रभावी बनाया। यह एक पॉजिटिव फीडबैक लूप है। जो इस लूप में काम नहीं करते या इससे बाहर निकल जाते हैं वे बाधा खड़ी करते हैं, उपद्रवी समझे जाते हैं और यह व्यवस्था ही उनका नाश कर देती है।

उदाहरण देखना है? जरा किसी ब्यूटी कॉन्टेस्ट को याद करें। लगभग 50-60 लड़कियाँ होती होंगी पहले राउंड में. सभी सुंदर, लंबी, छरहरी… उन्हें देखकर कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह से अंतर कर सकता है क्या? कोई बता सकता है कि उनमें से कौन सी लड़की मिस यूनिवर्स या मिस वर्ल्ड बनेगी?

पर किसी बेहद अबूझ प्रक्रिया से उनमें से तीन फाइनल राउंड के लिए चुनी जाती हैं। अब फाइनल राउंड में उनसे कोई एक प्रश्न पूछा जाता है, और उन्हें उस विषय पर एक उत्तर देना है। उनसे कोई भी प्रश्न पूछा जाए, उनका उत्तर लगभग एक ही होता है। उसमें विश्वशांति, समानता, वुमन एम्पावरमेंट जैसे कुछ बने बनाये फ्रेज़ होते हैं जिन्हें किसी तरह उस प्रश्न के खाँचे में फिट कर देना होता है।

और उसमें से कोई एक लड़की विश्वसुंदरी चुन ली जाती है। जो किसी भी तरह उस प्रतियोगिता की किसी भी और लड़की से कहीं से अलग सी नहीं होती। सब की एक जैसी देह-यष्टि, प्लास्टिक सर्जरी से एक जैसी बनाई हुई नाक और उभरे हुए होठ… और एक जैसी रटी रटाई सोच।

अब उस विश्वसुंदरी का क्या होता है? साबुन-तेल सौंदर्य प्रसाधन बेचने और सिनेमा के पर्दे पर कपड़े उतारने के अलावा वह सुंदरी अगले एक वर्ष तक दुनिया में कुछ विशेष मुद्दों पर विशेष प्रचार करने के लिए अनुबंधित होती है… चाइल्ड लेबर, विमेन्स एम्पावरमेंट, टॉलरेंस, सेक्युलरिज़्म एंड डेमोक्रेसी जैसे शब्द इन्हें रटा दिए जाते हैं। यानी ये साबुन, तेल, लिपस्टिक, हेयर डाई के साथ साथ एक और चीज के ब्रांड एम्बेसडर होते हैं… पॉलीटिकल करेक्टनेस के।

और कभी कभी इन्हें सुसाइड बॉम्बिंग कर के अपने मालिकों का कर्ज भी चुकाना होता है। मेरे शहर जमशेदपुर की दो बालाएँ याद आती हैं… प्रियंका चोपड़ा और तनुश्री दत्ता। अगर ये विश्व सुंदरियाँ घोषित नहीं होती तो शायद कमानी सेन्टर पर घूमते हुए उन्हें देखकर अधिक से अधिक एक बार सर घुमा कर देखता।

पर ये विश्वसुंदरियाँ हैं… और इनमें से एक अपने वेब सीरीज़ में हिन्दू आतंकवाद की कहानी गढ़ती है… दूसरी ने अभी अभी जीसस क्राइस्ट की शरण ली है और विवेक अग्निहोत्री पर अनर्गल और आधारहीन आरोप लगा कर वामियों की आंख की इस किरकिरी को निकालने का असफल प्रयास किया है।

कला, मॉडलिंग, फैशन और सिनेमा…विषैले वामपंथ के पॉल्ट्री फार्म हैं। ये वामपंथ की पाली हुई मुर्गियाँ हैं… ये अंडे देती हैं और वहाँ बैठे कुछ लोगों का काम होता है कि इन अंडों को सोने के अंडे घोषित करके उन्हें सोने के भाव बेचे… धंधा फायदे का है।

तब तक सच पर रहेगी पाबंदी

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1 COMMENT

  1. डिस्कवरी या फिर नॅशनल जियोग्राफ़ी चॅनल पर एक बार दिखाया गया था के ये जो दीवारों और पुलोपे पेंटिंग होती है वो असलमे वहाँके गैंगस्टर माफ़ियाओकी सिग्नेचर होती है मने उनका इलाका जैसे कुत्ते खम्बोपे टांग उठाके अपना सिग्नेचर करते है , या फिर हर जंगली जानवर का अपना अलग तरीक़ा होता है बतानेके की ये अपनका इलाका है अपनहि वसूली करेगा बीचमे नय आनेका नयतो लफड़ा होगा …….
    वामपंथियों के भी अपने अपने इलाके होंगे , साथ सब देनेका पर कमायेगा खाली अपुनच !
    किसीके हिस्सेमें नारीवाद आया, कोई गरीबी हटाओ ले गया , खान भाईओने मुन्नीबाई का कोठा (बॉलीवुड) ले लिया , …………. हा और धर्मनिरपेक्षता का तड़का हर कोई लगा सकता है तभी स्वाद आयगा वामपंथ का

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