गिद्ध

गिद्ध एक अद्भुत प्राणी है। अवसर की तलाश में वह अंतहीन प्रतीक्षा कर सकता है लेकिन इसे चूकता कभी नहीं।

1993 में सूडान में खींची गई वह चर्चित तस्वीर तो याद होगी जिसमें भूख से मरते हुए बच्चे के पास एक गिद्ध बैठा प्रतीक्षा कर रहा था कि यह कब मरे और वह लंच-डिनर शुरू करे।

हमारे सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में भी गिद्धों की कमी नहीं। ये परजीवी बस अनुकूल अवसर की तलाश में रहते हैं और उन्हें लग जाए कि अवसर हाथ आ गया है तो वे किसी चीज की परवाह किए बिना किसी भी हद तक जाएंगे।

कम्युनिस्ट भी ऐसे ही गिद्ध हैं। यह नवंबर 2018 है और दुनिया भर में प्रथम विश्व युद्ध और जर्मनी के समर्पण के कारणों को नए सिरे से खंगाला जा रहा है तो गिद्धों की भूमिका भी उजागर हो रही है।

समर्पण की शर्तों पर बातचीत करने के लिए पहली बार जर्मन प्रतिनिधिमंडल सात नवंबर, 1918 को फ्रांस के शहर ला कैपेले पहुंचा। उन्हें एक लग्जरी ट्रेन से जानबूझ कर बहुत लंबे रास्ते से पेरिस लाया गया, ताकि वे युद्ध में हुई तबाही को देख सकें और दबाव में आ जाएं।

सभी जानते हैं कि कितनी तबाही हुई। लेकिन किताबों में जो पढ़ाया जाता है कि जर्मनी की बेहद अपमानजनक हार हुई और उस पर बेहद कड़ी शर्तें थोपी गईं, उनमें कितनी सच्चाई है?

अति प्रतिष्ठित द न्यू यॉर्कर में पांच नवंबर, 2018 को छपे आलेख ‘A Hundred Years After the Armistice’ के अनुसार, “वार्सेली संधि पर दस्तखत के बाद हरजाने की मांग काफी घटा दी गई, जो विजित इलाके जर्मनी के हाथ से निकल गए वहां जर्मनी की आबादी की दस प्रतिशत हिस्सा रहता था लेकिन उनमें से अधितकर गैर जर्मन थे। संधि की जो भी खामियां हों लेकिन हारे हुए दूसरे देशों पर जो शर्तें थोपी गईं, उनके मुकाबले यह काफी नरम थी। समस्या कुछ और थी। 1918 के ग्यारहवें महीने की ग्यारहवीं तारीख को ग्यारह बजे जब युद्ध समाप्त होने की घोषणा की गई तब चंद जर्मन ही यह मानने को तैयार थे कि वे युद्ध हार चुके हैं।

वे मानें भी कैसे? ग्यारह नवंबर से सिर्फ 9 महीने पहले तीन मार्च 1918 को जर्मनी से समझौते के बाद रूस लड़ाई से हट गया था। यह समझौता था या समर्पण? पोलैंड के शहर ब्रेस्ट लिटोव्स्क (अब बेलारूस में) हुए इस समझौते के तहत रूस ने दस लाख वर्ग किलोमीटर जमीन छोड़ी, बाल्कन देशों से हाथ समेट लिया और उन्हें पूरी तरह जर्मनी के भरोसे छोड़ दिया और बाल्टिक सागर से भी पूरी तरह दूर रहने का वादा किया।

इस समझौते के बाद पूर्वी यूरोप और पश्चिमी एशिया के 11 देशों ने खुद को आज़ाद घोषित कर दिया। 1918 के बसंत में ही जर्मन फौज एक बड़े और बेहद सफल अभियान में मित्र देशों के बंकरों और उनकी मोर्चेबंदी को ध्वस्त करते हुए फ्रांस में काफी अंदर तक घुस गई और उनके कई लाख सैनिकों को बंदी बना लिया।

27 मई, 1918 को पश्चिमी मोर्चे पर जर्मन फौजों ने एक दिन में 13 मील इलाके पर कब्जा किया जो इस मोर्चे पर एक दिन में सबसे बड़ी कामयाबी थी। जर्मन खुशी से झूम रहे थे। फिर सिर्फ पांच महीनों में ऐसा क्या हो गया कि जर्मनी को समर्पण करना पड़ा? कोई परमाणु हमला हुआ था?

जर्मनी के समर्पण के पीछे बड़ा हाथ वहां के गिद्धों का था जो युद्ध में जर्मनी को कमज़ोर पड़ते देख सक्रिय हो गए थे। और समझौते की बातचीत के अनुरोध के बाद शुरू हुई वार्ता के पांच हफ्तों में ही जर्मनी में स्थिति काफी हद तक बदल गई। इधर समझौते की बात चल रही थी उधर जर्मनी आंतरिक घटनाक्रमों के कारण भहरा कर गिर रहा था।

गिद्धों ने सत्ता पर कब्जे के लिए मारकाट शुरू कर दी। समाजवादियों, धुर समाजवादियों और धुर कम्युनिस्टों के बीच खुली जंग शुरू हो गई। जर्मनी ने रूस को युद्ध में घुटने टेकने पर मजबूर भले ही कर दिया हो पर कम्युनिस्ट विचारधारा वायरस की तरह जर्मनी में फैल चुकी थी।

जर्मनी में रूस की 1917 की अक्तूबर क्रांति से प्रेरित दस्तों की संख्या कम नहीं थी। उन्हें बस मौके का इंतज़ार था। समर्पण की बात और कैसर के पलायन ने यह मौका उपलब्ध करा दिया। जर्मनी में जगह-जगह सोवियत गठित होने लगे। बवेरिया ने खुद को सोशलिस्ट रिपब्लिक घोषित कर दिया, एक जर्मन सोवियत ने कोलोन पर कब्जा कर लिया।

इसी दौरान जर्मन राजा कैसर विलहेल्म बेल्जियम के शहर स्पा में पश्चिमी मोर्चे के सैन्य मुख्यालय के दौरे पर था। उसने देखा कि वहां भी सैनिकों में भी सोवियत टुकड़ियां गठित हो चुकी थीं जो अपने अफसर को सैल्यूट करने से साफ इनकार कर देते थे।

स्पा में ही कैसर को खबर मिली कि बर्लिन में उसके महल पर कम्युनिस्टों ने लाल झंडा फहरा दिया है। कैसर इसके बाद चुपचाप हालैंड चला गया जो कि युद्ध में तटस्थ देश था। जर्मंनी के अखबारों में बैनर हेडलाइन छपी, “The Kaiser has abdicated!” कैसर के जाने के बाद सत्ता पर कब्जे का खेल शुरू हुआ।

आठ नवंबर को द इकोनॉमिस्ट अपने आलेख ‘Lessons from history 100 years after the Armistice’ में कहता है कि लड़ाई के मोर्चे पर इक्का-दुक्का पराजयों की वजह से नहीं बल्कि बर्लिन में चल रही राजनीतिक उटापटक के कारण जर्मनी को समझौते की मेज पर आना पड़ा।

जर्मनी का हाल उन दिनों क्या था, कैथे कोलोवित्ज की किताब ‘बर्लिन, 1918-19’ के न्यू यॉर्क रिव्यू ऑफ बुक्स में छपे रिव्यू ‘Witness to History’ पढ़कर समझा जा सकता है।

नौ नवंबर, 1918 को बर्लिन के ब्रांडेनबर्ग गेट पर हज़ारों की भीड़ जमा थी। इसके बाद फिलिप साइखडेमान जो बिना किसी मंत्रालय के मंत्री थे, खिड़की पर आए और कहा, जो पुराना और सड़ चुका था, अब खत्म हो चुका है। सैन्यीकरण का दौर बीत चुका है। जर्मनी जिंदाबाद।

ठीक उसी दिन बर्लिन के दूसरे लैंडमार्क शाही प्रासाद की ठीक उसी खिड़की से जहां से कैसर जनता को संबोधित करता था, कार्ल लिबनेख्त ने क्रांतिकारी समाजवादी गणतंत्र की घोषणा की। इस गणतंत्र के नाम में भी जर्मनी नहीं था। यानी अब एक समाजवादी था और दूसरा क्रांतिकारी समाजवादी। एक तीसरा खिलाड़ी भी था- धुर वामपंथी स्पार्टकस।

बर्लिन में लूट और सत्ता हथियाने की कोशिश में जुटे धड़ों की गोलीबारी चालू थी। क्रिसमस आते-आते मार काट जर्मन सेना की कथित सोवियतों तक भी पहुंच गई। सेना में हुई गोलीबारी में कई मरे और घायल हुई।

पीपुल्स नेवी डिवीजन (ध्यान दें इसका मतलब जर्मन सोवियत नेवी) ने बर्लिन प्रासाद में एक बड़े समाजवादी नेता ओटो वेल्स को बंधक बना लिया। दिसंबर 29 को नरमपंथी समाजवादियों और उनके धुर वामपंथी प्रतिद्वंद्वी स्पार्टकस ने ताकत दिखाने के लिए मार्च निकालने का ऐलान किया।

स्पार्टकस और दूसरे चरम वामपंथी समूह किसी भी कीमत पर सत्ता हथियाने और जर्मन सोवियत सरकार बनाने पर आमादा थे। पांच जनवरी, 1919 को स्पार्टकस ने समाजवादियों के सभी प्रकाशनों, उनके अखबारों और दफ्तरों पर कब्जा कर लिया।

अब सिर्फ स्पार्टकस के दो चरम वामपंथी अखबार प्रकाशित हो रहे थे। एक-एक दफ्तरों और प्रतिष्ठानों पर कब्जे के लिए जमकर मशीनगनों और मोर्टार से गोले दागे जा रहे थे।

प्रथम विश्वयुद्ध जर्मनी ने अपनी धरती पर नहीं लड़ा, लेकिन बर्लिन गिद्धों की लड़ाई में ध्वस्त हो रहा था।

आखिर में युद्ध से लौटे प्रति क्रांतिकारियों यानी जर्मन सैनिकों ने मोर्चा संभाला। कुछ ही दिन में स्पार्टकस और अन्य धुर वामपंथी समूह खत्म कर दिए गए। स्पार्टकस विद्रोह में 150 से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन आम जर्मन जनता और फौज इन धुर वामपंथियों के इरादों से पूरी तरह सशंकित हो चुकी थी। वार्सेली संधि की शर्तें सार्वजनिक होने के बाद यह गुस्सा और बढ़ गया।

प्रथम विश्वयुद्ध के बारे में एक कहावत है कि जर्मनी जमीन कब्जा करने के लिए लड़ रहा था, इंग्लैंड समुद्र पर कब्जा बनाए रखने के लिए, अमेरिकी युद्ध के सौवेनेयर इकट्ठा करने के लिए और फ्रांसीसी अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ रहे थे।

इसमें गिद्धों को शामिल नहीं किया गया जो दोनों महायुद्धों के दौरान सिर्फ सत्ता कब्जाने के लिए लड़े।

जर्मनी के गिद्धों ने सत्ता हथियाने के लिए जिस तरह से चंद हफ्तों में अपने ही देश को घुटनों के बल खड़ा कर दिया। 1962 और 1965 में हम भी इन गिद्धों की भूमिका को देख चुके हैं।

हम कमज़ोर पड़े नहीं कि ये हमला बोलेंगे हम पर। क्योंकि गिद्ध सिर्फ अपने लिए व सत्ता के लिए होते हैं। देश, धर्म, भाषा, सभ्यता, संस्कृति से उन्हें कोई प्रेम नहीं, इसका कोई मोल नहीं। भारतीय और जर्मन गिद्धों का ही नहीं, दुनिया के हर देश में इनका रंगबिरंगा इतिहास है। बारी-बारी से चर्चा करेंगे।

तब तक सच पर रहेगी पाबंदी

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