केदारनाथ : कहाँ है नफरत का बीज बोने वाले ऐसे लोगों का समाधान?

आपको पता है कि केदारनाथ की प्रलयकारी बाढ़ क्यों आई थी? क्योंकि एक हिन्दू पिता ने अपनी बेटी को मुस्लिम युवक से शादी करने से रोका था। जी, बॉलीवुड की आने वाली फिल्म ‘केदारनाथ’ एक ऐसी ही कहानी को दर्शाने वाली है। कम से कम उसके ट्रेलर से तो यही पता चलता है।

एक धार्मिक हिन्दू परिवार की लड़की, जिसे हमेशा कि तरह ‘प्रोग्रेसिव’ दिखाया गया है, शायद धर्म में न मानने वाली, आस्था को मनोरंजन समझने वाली! क्योंकि माँ के साथ आरती करते हुए वो टीवी पर क्रिकेट देखते हुए चिल्लाती है, ‘तेरी माँ की…’ को एक मुस्लिम से प्यार हो जाता है, और उसका धर्म उसके प्यार में बाधा बनता है, जिससे कहर फूटता है।

आज ही ‘हिन्दू’ में एक फ़िल्म निर्देशक का सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष को लिखा ‘खुला-खत’ छपा है। वो अपने फ़िल्म को ‘एडल्ट’ सर्टिफिकेशन दिए जाने से नाराज हैं। उन्होंने कहा है कि सरकार जिनकी आवाज बंद करना चाहती है उनसे ऐसे ही निबटती है।

सर्टिफिकेशन के मामलों में अक्सर बोर्ड ही फैसला करती है। ऐसे मसले कोर्ट तक कम ही जाते हैं। फ़िल्मकार ये भी जानते हैं कि हम जिस दौर में हैं, वहाँ अब सर्टिफिकेट पर ‘यू’ और ‘ए’ से शायद ही बहुत फर्क पड़ता है। लेकिन फिर भी इस तरह के मामले बीते सालों में बढ़े हैं।

दरअसल हम ऐसे मामलों में सरकार को बड़े आसानी से कटघरे में खड़ा कर लेते हैं। जनभावना वैसे ही व्यवस्था से त्रस्त होती है, ऐसे में उनके सेंटीमेंट को भुनाना आसान होता है। इस बात को बाजार में बैठे लोग अच्छे से समझते हैं। इसके अलावा फिल्मों का मामला बाजार भर का नहीं है। फ़िल्म हमेशा से हमारे विचारों को प्रभावित कर उन्हें गढ़ते आए हैं। आप उन्हें देखेंगे तो वक़्त के हिसाब से उनमें एक तय धारा दिख जाती है।

पिछले चार सालों में सरकार पर विभाजनकारी और सामाजिक विद्वेष बढ़ाने वाले नीतियों के आरोप लगातार लगे हैं। सरकार में बैठे लोग एक हद तक इसके जिम्मेवार भी हैं। लेकिन वो एजेंडा सेट नहीं करते, दूसरों के बिछाए जाल में फंसते हैं।

वर्तमान में सत्ता में बैठे लोगों की इस कमी को देश का एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग बखूबी समझता है और इसका दोहन भी करता है। एक ही बात को सैकड़ो बार अगर जोर-जोर से बताया जाए तो लोग उससे जुड़ जाते हैं। ये बात हमारे शिक्षक प्राइमरी में ही नैतिक शिक्षा देते हुए हमें बता देते हैं। बीते वर्षों देश के सामाजिक सांचे को जिस तरह ढाला गया है, वो इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

हर बार किसी फिल्म, किसी किताब से बात चलती है। अक्सर अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के नाम पर ये होता है और बड़े ही महीन तरीके से मुहिम खड़ी कर दी जाती है। सरकार हर बार घिरती है, वो थोड़े अनुभवहीन जो हैं! उनके नीतियों में भी इसका असर दिखता है।

इसके बावजूद भी वो जो नहीं करते उसके भी दोषी हो जाते हैं! संवेदनशील मसलों को छूने से वो बचते हैं। यहाँ तक कि राम मंदिर, जो उनके मैनिफेस्टो का हिस्सा है, उसपर भी वो नीति के स्तर पर कुछ करने से परहेज करते हैं। एससी-एसटी एक्ट पर उनके संशोधन ने तस्वीर को और साफ कर दिया ही।

मगर हमारे बुद्धिजीवियों के एक वर्ग का उससे सरोकार नहीं है। हो सकता है उनका दोष न भी हो, मगर हर बार वो समाज के एकता पर वार करते हैं और बहस को नकारात्मकता की ओर ले जाते हैं। फ़िल्म इसका सबसे आसान जरिया है। दक्षिण में ये प्रत्यक्ष होता है, जबकि बॉलीवुड थोड़ा शातिराना तरीका अपनाता है। यहाँ वो पैसे भी बनाते हैं और बहस की धारा भी बदलते हैं।

खैर, ‘केदारनाथ’ पर लौटते हैं। इस नाम की फ़िल्म बन रही है और उसमें स्टोरीलाइन में एक मुस्लिम युवक और हिन्दू युवती के प्रेम कहानी को चुना गया है। केदारनाथ हिंदुओं के चार धामों में एक है।

ऐसा नाम रखने के पीछे क्या मंशा रही होगी? क्या ये संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं है? धार्मिक नाम वाले एक फ़िल्म को एक ऐसा एंगल (लव जिहाद) देना, जो समाज में कटुता का कारण रहा है, कहाँ तक ठीक है?

एक लड़की तीर्थ करने जाती है और वहाँ उसे घोड़े पर चढ़ते-उतरते विधर्मी घोड़े वाले से प्यार हो जाता है। लड़की का परिवार इसे नहीं स्वीकारता और आपदा आ जाती है। क्या ये उस प्राकृतिक आपदा में मरे लोगों के मौत का मखौल नहीं है? कल्पना की सीमा तय होनी चाहिए। ये वो जबरदस्ती वर्ग विशेष के आस्था को ठेस पहुंचाने पर ही आधारित रहेगी?

ज्यादा पुरानी छोड़िए, इसी साल इसके पहले ‘राज़ी’ और ‘मुल्क’ जैसी फ़िल्में आ चुकी है। कश्मीर के एक मुस्लिम परिवार, विशेषकर एक बेटी के देशभक्ति को दिखाने वाली वो फ़िल्म नेपथ्य में अलग ही संदेश छुपाए हुए थी। ऐसा कि देखने वाले के मन मे सेना और उसके कार्यप्रणाली के प्रति एक नकारात्मक भाव पैदा हो।

शांति का पैरोकार होना ठीक है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वैसा कोई एकतरफा पहल आत्मघाती ही होगा! ‘मुल्क’ में प्लॉट बनारस का लिया गया था। उस शहर का जो ‘सर्वधर्म-समभाव’ को अपने स्वभाव की मस्ती में जीता है। वो एक ऐसे मुस्लिम परिवार की कहानी थी, जिसका एक लड़का आत्मघाती हमलावर बन जाता है। जाहिर है, ऐसे किसी परिवार पर पुलिस और समाज का नजरिया बदलेगा ही। लेकिन उन्हें साफ साबित करने के कारण पुलिस और बहुसंख्य समाज का ऐसा चित्रण किया गया है कि वो दोषी लगने लगते हैं।

ये सच है कि अति बुरी है, लेकिन दूसरा पक्ष भी तो होता है! चुनाव करीब है। अब ऐसे उपक्रम जो पहले कुछ महीनों के अंतराल पर हुआ करते थे, वो बढ़ेंगे।

ऐसे में सवाल ये है कि नफरत का बीज बोने वाले ऐसे लोगों का समाधान कहाँ है? समाज का शांतिप्रिय वर्ग इनसे कैसे निबटेगा? क्योंकि ये ‘सॉफ्टलाइनर्स’, ‘हार्डलाइनर्स’ से कहीं अधिक खतरनाक हैं। इन्हें न उगलते भलाई है न निगलते, बोल के आप प्रचार देंगे। चुप रहेंगे तो वो वैसे भी लोगों में अपना संदेश पहुँचा ही रहें। सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट देगी ही… तब!

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