हिंदुओं ने न अपने नेरेटिव को कभी महत्वपूर्ण समझा, न अपने लोगों को सपोर्ट करना

एक ग्रुप में नेरेटिव को लेकर एक सदस्य ने सब से आसान राह पकड़ ली, “भाजपा सरकार क्या कर रही है, काँग्रेस की ही नेरेटिव आगे चला रही है। इतिहास का एक भी लेसन नहीं बदला है।”

उन को वहाँ उत्तर दिया। लेकिन लगा कि यह अपने आप में एक लेख है जिसे सब के साथ शेयर भी करना उपयुक्त होगा। सादर प्रस्तुत है :

आज नेरेटिव भी महज एक शब्द है लोगों के लिए जिसे यहाँ वहाँ जैसे मन करे, प्रयोग किया जा रहा है, क्या और कैसे नेरेटिव बनाया जाता है, उसका thought process क्या होता है, इसपर बहुत कम लोग जानते हैं।

नेरेटिव के लिए पहले सामाजिक सपोर्ट की आवश्यकता होती है जो सरकार से बाद में संख्या के दबाव से मांगी जा सकती है। यहाँ एक बात है कि पुराने होने कारण और नेहरू के सीधा सपोर्ट के कारण वामियों को काँग्रेस का सपोर्ट उपलब्ध था। कभी Fabian Society पर जानकारी हासिल कीजिये, गूगल पर उपलब्ध है।

हिंदुओं ने अपने नेरेटिव को कभी महत्वपूर्ण समझा ही नहीं और अपने लोगों को सपोर्ट करना जरूरी समझा ही नहीं। संसाधनों में हिन्दू पैसे लगाते गए लेकिन उसके लिए उनको जो काबिल लोग दिखे वे पूरे वामी इको सिस्टम से लिए, क्योंकि हिन्दू इको सिस्टम कोई था ही नहीं।

आज तक लोगों को समझ नहीं आ रही और न ही लोग इसे बनाना चाहते हैं, बस यही चाहते हैं कि ऐसी कुछ व्यवस्था बन जाये जिसमें धनी हिंदुओं से पैसे लिए जाये। धनी हिन्दू कहते हैं हम क्यों दे, हमारा क्या फायदा।

साधारण हिन्दू की संख्या इतनी है कि संख्या से ही फंड जमा हो सकता है, लेकिन यहाँ हिन्दू का एक दूसरे से द्वेष और जलन मार जाती है। कोई ज़रा सा काम करे तो उसे चन्दाखोर घोषित किया जाता है जब कि चिल्लानेवालों ने एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी होती। बस उसकी इमेज खराब की जाती है।

नेरेटिव बिल्डिंग के लिए विचारक चाहिए। उनको आजीविका की आश्वस्ति चाहिए जो कोई पार्टी नहीं दे सकती। आज काँग्रेस या वामी किसी को सीधा फंडिंग नहीं कर रहे जब कि वे ही फंडिंग कर रहे हैं और उसके द्वारा लोगों को कंट्रोल भी कर रहे होते हैं। लेकिन सीधा जुड़ाव साबित नहीं हो सकता।

ये सभी संस्थान अलग हैं, दिखाने को स्वायत्त भी हैं। उनको सरकार से अनुदान मिलता है। लेकिन यहाँ लोग एक बात को भूल जाते हैं या देखना नहीं चाहते कि ये संस्थान बनाए जाते हैं।

कागज़ी ही सही, तीन साल की कानूनी प्रक्रिया पूरी कर के उनको अनुदान के लिए पात्र बनाया जाता है। यह अपने आप में इनवेस्टमेंट है जो हिन्दू, हिंदुओं के लिए नहीं करता, जो करता है वो खुद के लिए NGO बाजी का धंधा करने के लिए करता है।

बाकी सरकार और हमें केवल इतना दिखता है कि इन सभी संस्थानों से जुड़े विचारक काँग्रेस या वाम की धुन अलापते हैं, मुसलमान और ईसाई के गुण गाते हैं तो हम कहते हैं कि काँग्रेस सरकार उन्हें फंडिंग करती थी।

यह गलत है, काँग्रेस नहीं, सरकार उन्हें फंडिंग करती है। काँग्रेस ने उन्हें सरकार की ज़िम्मेदारी बना दिया। और इतने सालों से सिस्टम में बिठाये अपने गुर्गों से यही चालू रखवाया।

आज ज़माना करियर का है, नौकरी बदलने का। हर किसी को तरक्की चाहिए, तो अगर कोई राइट विंग में नौकरी करे तो एक समय के बाद नौकरी बदलने को चाहे तो कहाँ मिलेगी? सभी बाकी नौकरियाँ तो लेफ्ट संचालित संस्थानों के पास है जहां ये अस्पृश्य हो जाता है। उतने राइट विंग संस्थान होते ही नहीं जहां वो घूमता रहे, तरक्की पाता रहे। कहाँ से मिलेंगे आप को विचारक?

आदमी होशियार हो सकता है लेकिन विद्वान बनने के लिए मेहनत लगती है। मेहनत तभी करता है जब कोई लक्ष्य हो। यह लक्ष्य आज आर्थिक है। और इसकी पूर्ति हिंदुओं के लिए काम करने से दिखती नहीं क्योंकि हिन्दुओं ने ऐसे सिस्टम बनाए ही नहीं।

आज इतिहास अगर लिखना है तो उसके लिए नामचीन हिस्टोरियन्स की आवश्यकता है जो प्रोसेस का जानकार हो और उसके लिए आवश्यक क्वलिफ़िकेशन रखता हो। हिस्टोरियोग्राफी एक क्लिष्ट विधा है जिसके सर्टिफाइड निष्णात कोई नहीं हैं राइट विंग के पास। जो भी उपलब्ध हैं सभी लेफ्ट के पास हैं। स्टोरी टेलिंग और हिस्ट्री का अध्ययन और अध्यापन में बहुत अंतर है, क्या आप उस अंतर को प्रमाणित मार्ग से समझा सकते हैं?

बाकी सरकार को दोष देना तो अपना नेशनल टाइम पास है।

व्यापारियों के वर्चस्व से दबे संगठनों ने ऐसे कोई सिस्टम नहीं बनाए जो इकोनॉमी और इकोसिस्टम खड़ी कर सके क्योंकि व्यापारी उसमें अपने को प्रतियोगी देखते हैं तो ऐसी सिस्टम खड़ी करने भी नहीं देंगे।

समस्या को बस दोष देने से समस्या हल नहीं होती। प्रभु श्री राम समस्याओं से झुके नहीं, रोते नहीं बैठे, नसीब को दोष देते नहींरहे बल्कि समस्याओं से लड़े, अंत तक लड़े और यशस्वी भी हुए इसलिए ही पूजे जाते हैं। बाकी समस्याओं के लिए दूसरे, शत्रु और नसीब या भगवान को दोष देते रोते हुए कितने खत्म हो गए किसको याद है ?

वो गाना याद है? ‘देखो ओ दीवानों तुम ये काम ना करो, राम का नाम बदनाम ना करो’?

…तो सत्य सिर्फ परेशान ही नहीं, पराजित भी हो जाएगा

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY