नोटा का सिक्का क्यों है खोटा?

असल में नोटा एक Booby Trap है। हो सकता है कि इस शब्द से आप परिचित नहीं हों लेकिन यह चीज़ क्या है आप को भली भांति पता है। समझते हैं, आप भी तुरंत समझ जाएँगे।

आम तौर पर बूबी ट्रैप शत्रु को फँसाने का वो जाल है जो दूर से पता ही न चले और उसे छूने या उसपर कदम रखने से वो अपना असर दिखा दे। कहीं दरवाज़े से बांधा धागा जो दरवाजा धकेलने पर टूट जाये और दरवाजे के पीछे लगाया बम फटे या और कुछ घटे जो प्राणघातक हो। या कहीं टाट और पत्तियों से ढंका गड्ढा हो जिसमें नुकीले बांस खड़े रखे हों – लिस्ट लंबी है, लेकिन आप समझ गए ही होंगे बूबी ट्रैप किसे कहते
हैं।

सहसा ये बूबी ट्रैप्स हारती, पीछे हटती सेना, शत्रु की आगे आती सेना का नुकसान करने के लिए रखती है। अब समझते हैं नोटा बूबी ट्रैप क्यों है।

नोटा से कोई दुबारा चुनाव नहीं होगा। यह मांग स्वीकार नहीं की गई है, जब कि दुबारा चुनाव हो यही NOTA का अर्थ हैनन ऑफ द अबव का अर्थ यही होता है कि उपलब्ध प्रत्याशियों में जनता को कोई भी पसंद नहीं है।

तो क्या इसका अर्थ यह नहीं होता कि दुबारा चुनाव हो?

लेकिन नहीं, जिसको सर्वाधिक वैध मत मिलेंगे वो विजयी घोषित होगा। फिर भले ही एक ही मत छोड़कर सभी मत NOTA क्यों न हो, अगर उसे मिला तो वो विजयी। फिर क्या लाभ इस कानून का जो सीधा कहता है कि मतदाताओं को एक भी प्रत्याशी पसंद नहीं?

अगर आप ये सोचते हैं कि पुन: चुनाव की केवल मांग स्वीकृत नहीं हुई है तो यह जान लीजिये कि नोटा कानून की मांग करने वालों ने याचिका में इस पर कितने प्रतिशत मत नोटा को मिलने से दोबारा चुनाव हो, इस पर कुछ नहीं कहा था। याने मूल मांग ही दूषित है।

और आप को क्या लगता है कितने प्रतिशत नोटा को मिले तो दोबारा चुनाव होने चाहिए? क्या आप को पता नहीं कि 2% से 5% प्रतिशत का भी अंतर चुनाव के परिणाम बदल देता है? क्या 5% नोटा को मिलने से पुन: चुनाव की मांग की गई थी?

मैंने अक्सर यह पाया है कि लोगों से यह पूछने पर लोग अक्सर कम से कम 50% मत नोटा के लिए से शुरू करते हैं। जबकि चुनाव में हार-जीत का अंतर अक्सर 5% से अधिक नहीं होता। Be realistic!

क्या आप को पता है कि नोटा की मांग किस संस्थान ने उठाई थी? PUCL, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ ने। अब यह भी जान लीजिये कि महाराष्ट्र में हाल ही में गिरफ्तार किए गए शहरी नक्सलियों में एक महिला है – सुधा भारद्वाज – इसी PUCL के छत्तीसगढ़ यूनिट की जनरल सेक्रेटरी है। और छत्तीसगढ़ नक्सलियों से कितना पीड़ित रहा है, यह रक्तरंजित इतिहास है । क्या विश्वसनीयता है इस मांग की कि यह नागरिकों के भले के लिए उठाई गयी थी?

इसलिए मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि काँग्रेस ने भांप लिया था कि 2014 में अपना पराभव होगा और इसीलिए 2019 में लौटने की रणनीति के तहत NOTA का बूबी ट्रैप फटाफट बना दिया। इसके समर्थन में ये तर्क प्रस्तुत हैं।

हर सरकार अपने कार्यकाल में सभी नागरिरकों को खुश कर ही नहीं सकती क्योंकि उन नागरिकों में उसके कट्टर विरोधी भी शामिल हैं ही। वे तो इसे गिराकर ही खुश होंगे। अस्तु, कुछ मुद्दे तो रहेंगे ही जिनपर जनता में नाराज़गी रहेगी, और इस स्थिति में NOTA जैसी सुविधा बिलकुल एक लोकतांत्रिक सरकार को हराने में आसानी से काम आ
सकती है।

समर शेष है… जो NOTAस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

विरोधियों को बस इतना करना है कि लोगों में भाजपा को सबक सिखाने के लिए, भाजपा पर अंकुश रखने के लिए – कुछ भी कह सकते हैं – NOTA दबाने को कह दीजिये। कुछ ऐसे लोगों को थोड़ी हवा दीजिये, उनको प्रमोट कीजिये और कुछ तो स्वयं ही चने के पेड़ पर चढ़ जाएँगे कि भाजपा ने यह नहीं किया या यह किया इसके लिए उसको सबक सिखाएँगे NOTA दबाकर। भीतरघातियों और जल्द बहकने वाले लोगों की कमी थोड़े ही है?

और हाँ, क्या आप ने कभी किसी NOTA समर्थक को यह कहते सुना है कि एक भी प्रत्याशी सही नहीं है इसलिए नोटा दबाएँगे? कह ही नहीं सकते, क्योंकि जब कोई लिस्ट ही नहीं जारी हुई तो कैसे कह सकते हैं? और अगर लिस्ट लगती भी है तो क्या इन्हें बाकी प्रत्याशियों के नाम और चुनाव चिह्न भी पता हैं या केवल ‘भाजपा हराओ, नोटा दबाओ’ इतना ही इनको कहना है?

ऐसा ही है तो क्या इन्हें NOTA का अर्थ भी पता है? नन ऑफ द अबव – कोई भी प्रत्याशी पसंद नहीं? अरे, नाम ही मालूम नहीं, तो पसंद-नापसंद की बात ही कहाँ? तो फिर क्या ये NOTA के उद्देश्य को ले कर ईमानदार हैं भी?

इन जल्द बहकने वाले, खुद को कट्टर कहलाने वाले हिंदुओं को यह समझ आता नहीं या उन्हें समझना ही नहीं है कि नोटा का फायदा सबसे बड़े विरोधी पक्ष को ही होनेवाला है ताकि वो मतों के अंतर को कम कर सके

जनता झांसे में आ सकती है क्योंकि ये लोग काँग्रेस या अन्य किसी विरोधी पार्टी का प्रचार नहीं कर रहे होते लेकिन केवल भाजपा का विरोध और मोदीजी की निंदा कर रहे होते हैं। लोग ये नहीं समझते कि भाजपा की हार काँग्रेस की जीत ही तो है। कहीं तो यहाँ तक भी धूर्तता से काम लिया जाता है कि इससे तो स्थानीय नेता को ही हराना है, मोदी जी तो अपने ही है

अरे भाई, क्या आप यह भी समझते हैं कि जितने भी उम्मीदवार कम जीतेंगे, संख्या कम पड़ने से मोदीजी की ही हार होगी। और विधानसभा में भी आप ने भाजपा को हराकर काँग्रेस को वोट दिया तो क्या लोकसभा में उस समय की स्थानीय काँग्रेस सरकार आप को भाजपा को आसानी से वोट देने देगी?

कानून और व्यवस्था राज्य का विषय होता है और जब तक राज्य या राज्यपाल, केंद्र से हस्तक्षेप की मांग नहीं करता, केंद्र सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती? बड़ी ही आसानी से जनता को रोका जा सकता है, क्या आप को 60 वर्षों का अनुभव नहीं है?

हमारा यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कई सारे ऐसे लोग हैं जिनको वाकई लगता है कि सरकार हिंदुओं की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है। उनकी अपेक्षाएँ व्यक्तिगत स्वार्थ की भी नहीं है, हिंदुओं के लिए चिंता ही हैं। लेकिन सब से बड़ा दुर्भाग्य यही है कि जिसे overall picture और रणनीति कहा जाये, इसमें इनकी समझ अगर इनकी चिंता के बराबरी की होती तो अधिक अच्छा होता।

लोगों में इनके लिए आदर है और 2014 में उन्होंने अपने फॉलोअर्स को मोदीजी को वोट देने के लिए कहा था तो आज उन्हें उन अपेक्षाओं की पूर्ति न होने पर मोदीजी का विरोध करना अपना नैतिक कर्तव्य जान पड़ता है, इसलिए वे NOTA का समर्थन करते हैं।

उनके हिसाब से देखने जाये तो वे काँग्रेस का समर्थन तो नहीं कर रहे हैं फिर NOTA समर्थन करने में क्या हर्ज़ है? काश वे समझ पाएँ कि काँग्रेस को जिताने के लिए ही तो उनका उपयोग किया जा रहा है!

अब तक आप समझ गए ही होंगे कि पहले लटका कर, फिर 2014 में पराजय की छायाएँ दिखने पर काँग्रेस ने जल्दी से NOTA पास करवा लिया। इसकी दीर्घ दृष्टि समझनी है तो ये समझिए कि ये मामला कब का दर्ज करवा रखा था, एक वामपंथी NGO से, जिसकी असलियत सुधा भारद्वाज जैसे शहरी नक्सल का बुर्का उतरने पर जाहिर हुई है।

यह महज एक बूबी ट्रैप के सिवा कुछ भी नहीं है। ईश्वर न करें, लेकिन अगर काँग्रेस लौटी तो सब से पहले NOTA को खारिज करवाएगी और सभी उछलते नोटासुर नोटा के सोटे से स्वगुदाभंजन कराके शांत हो जाएँगे।

और हाँ, सभी नोटासुर हिंदू ही हैं। आज तक आप ने किसी मुस्लिम या ईसाई नेता को अपने लोगों को नोटा दबाने को कहते देखा भी है?

लेकिन आप को तो स्वयं को सक्षम और समर्थ नहीं करना, बस नोटा दबाना है!

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