सूफी या खूंखार जिहादी

आज़ादी के बाद इस्लाम के खूंखार प्रचारकों को सूफी करार देकर उनको महिमामंडित करने का अभियान चल रहा है।

इस दुष्प्रचार का शिकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी हो गए हैं और उन्होंने लंदन में भाषण देते हुए फरमाया है कि अगर सूफी होते तो कोई हत्याकांड नहीं होता।

ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री को सूफियों की सच्चाई के बारे में या तो जानकारी नहीं है या वो मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण इस तरह की जुमलेबाज़ी कर रहे हैं।

वर्ष 1992 में विख्यात पत्रकार गिरिलाल जैन ने सूफी दरगाहों को इस्लाम में भर्ती करने वाली संस्थाओं की संज्ञा दी थी। गत कुछ दशकों से लम्बी-लम्बी दाढ़ियों वाले मौलवी जेबी संगठन बनाकर सूफीवाद की आड़ में अपनी दुकानें चला रहे हैं।

यह दावा सरासर गलत है कि सूफी, हिन्दू धर्म और इस्लाम के बीच पुल का काम करते थे। सच्चाई तो यह है कि अधिकांश सूफी, इस्लाम के खूनी प्रचारक थे। जिन्होंने इस्लाम को फैलाने के लिए और हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के लिए हर हथकंडा अपनाया। उनका हिन्दू धर्म या उनके दर्शन से कोई दूर-दर तक वास्ता नहीं था।

यह बात दूसरी है कि उन्होंने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए हिन्दवी भाषा का सहारा लिया। उनके खरीदे हुए गुलामों ने उनकी करामात के बारे में झूठे वायदे करके आस्थावान हिन्दुओं को उनकी ओर आकर्षित किया।

मैं इस श्रृखंला में कुछ सूफियों की असली तस्वीर पेश करने का प्रयास करूंगा। यह श्रृंखला सूफियों के बारे में लिखी गई फारसी, अरबी और अंग्रेज़ी भाषाओं की विख्यात पुस्तकों पर आधारित है।

बड़ी अजीब बात यह है कि इन तथाकथित सूफियों ने हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया और उनके पूजास्थलों को मिट्टी में मिलाया, उन्हीं की दरगाहों में हाजिरी देने वालों में 90 प्रतिशत मूर्ख हिन्दू होते हैं।

इस तथ्य से कोई व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि इन सूफियों ने जासूस के रूप में कार्य किया और मुस्लिम आक्रांताओं को हिन्दू राजाओं को पराजित करने के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवायी।

यदि ये सूफी भारत की बहुधर्मी संस्कृति में विश्वास करते थे तो उन्होंने क्या एक भी मुसलमान को हिन्दू धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया था? क्या उनमें से एक भी कथित सन्त ने मुस्लिम सुल्तानों द्वारा हिन्दू जनता के उत्पीड़न और उनके उपासना स्थलों को तबाह करने का कभी विरोध किया था? सच तो यह है कि इनकी दरगाहें इस्लाम के प्रचार का मुख्य केन्द्र बनीं।

पंजाब में बाबा फरीदगंज शक्कर का नाम काफी श्रद्धा से लिया जाता है। गुरूग्रंथ साहिब तक में उनकी वाणी शामिल है। मगर नवीं शताब्दी की एक फारसी पुस्तक जिसका नाम है ‘मिरात-ए-फरीदी’ (लेखक अहमद बुखारी) में इस महान सूफी की पोल खोलकर रख दी गई है।

लेखक के अनुसार इस सूफी ने पंजाब में 25 लाख हिन्दू जाटों का धर्मांतरण करवाया था। उनके दस हजार बुतखानों को ध्वस्त करवाया। इस पुस्तक में उनके इन कारनामों का बड़े विस्तृत रूप से ज़िक्र किया गया है।

अजमेर के हजरत गरीब नवाज मोइनउद्दीन चिश्ती के बारे में कुछ वर्ष पूर्व लाहौर के एक समाचारपत्र कोहिस्तान में कुछ फारसी पत्र प्रकाशित हुए थे। जोकि उन्होंने शाहबुद्दीन गौरी को लिखे थे। जिसमें उन्होंने अजमेर के किले तारागढ़ को कैसे जीता जाये इसके बारे में कई सुझाव दिए थे।

इनकी चार पत्नियां थीं जिनमें से एक पत्नी राजपूत थीं, जिसे किसी युद्ध में बंदी बनाया गया था। इसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया। उससे एक पुत्री का जन्म हुआ था जिसका नाम बीबी जमाल है जिसकी कब्र आज भी अजमेर स्थित दरगाह के परिसर में है।

इनके बारे में तत्कालीन फारसी इतिहासकारों ने यह दावा किया है कि उन्होंने दस लाख काफिरों (हिन्दू) को कुफ्र की जहालत से निकालकर इस्लामी के नूर से रोशन किया अर्थात् उनका धर्मांतरण करवाया। इस सूफी की प्रेरणा से अजमेर और नागौर में अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया गया। अजेमर स्थित ढाई दिन का झोपड़ा इसका ज्वलंत उदाहरण है।

बंगाल में खूंखार और लड़ाके सूफियों में एक मुख्य नाम सिलहट (अब बांग्लादेश में) के शेख जलाल का भी है। गुलज़ार-ए-अबरार नामक ग्रंथ के अनुसार उन्होंने राजा गौड़ गोविन्द को हराया। शेख जलाल का अपने अनुयायियों को स्पष्ट आदेश था कि वह हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने की दावत दें और जो उससे इंकार करे उसे फौरन कत्ल कर दें।

बहराइच के गाज़ी मियां उर्फ सलार मसूद गाज़ी का नाम भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। यह महमूद गजनवी के भांजे थे और उन्होंने सोमनाथ के मंदिर को ध्वस्त करने के लिए अपने मामा को प्रेरित किया था। प्रारम्भ से ही उनका हिन्दुओं के सामने एक ही प्रस्ताव था – मौत या इस्लाम।

बहराइच के समीप वीर हिन्दू महाराजा सोहेल देव की सेनाओं के हाथ वह अपने हज़ारों साथियों सहित मारे गए थे। मोहम्मद तुगलक ने उनके मज़ार पर एक पक्का मकबरा बनाया था।

गाज़ी मियां उर्फ बाले मियां उत्तर प्रदेश और बिहार में एक बेहद लोकप्रिय पीर के रूप में विख्यात हैं। ‘ज़िक्र बाले मियां’ नामक उर्दू पुस्तक के अनुसार उन्होंने पांच लाख हिन्दुओं को मुसलमान बनाया था और अपने अनुयायियों को यह आदेश दिया था कि वह हिन्दू महिलाओं से जबरन निकाह करें।

इतिहासकारों के अनुसार मेरठ स्थित नवचंडी मंदिर को ध्वस्त करने वाले बाले मियां ही थे। बाले मियां के काले कारनामों का उल्लेख (ईलियट एण्ड डाउसनः हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया बाई इट्स ओन हिस्टोरियन्स, खण्ड-2, पेज-529-547) में विस्तृत रूप से किया गया है।

कश्मीर का इस्लामीकरण करने में भी सूफियों का महत्वपूर्ण हाथ है। जाफर मिक्की ने कश्मीर में इस्लाम नामक फारसी पुस्तक में यह स्वीकार किया है कि तुर्किस्तान से आने वाले 21 सूफियों ने नूरूद्दीन उर्फ नंदऋषि के नेतृत्व में कश्मीर के 12 लाख हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया था। इन सूफियों ने पांच लाख उन हिन्दुओं को कत्ल दिया जिन्होंने इस्लाम कबूल करने से इंकार कर दिया था।

कश्मीर के कुख्यात धर्मांध और कट्टरवादी मुस्लिम शासक सुल्तान सिकंदर बुत शिकन ने कश्मीर घाटी में स्थित सभी हिन्दू मंदिरों को तहस-नहस करवा दिया था। मार्तंड के विख्यात सूर्य मंदिर के खंडहरात आज भी इन सूफियों के ज़ुल्मों की कहानी के साक्षी हैं। इस सुल्तान ने अवंतीपुर के विष्णु के भव्य मंदिर को भी तहस-नहस करवाया था।

जारी…

NOTE : मैंने यह तथ्य मान्यता प्राप्त पुस्तकों से प्रस्तुत किए हैं। यदि कोई सज्जन इन तथ्यों के विपरीत तथ्य पेश करना चाहें तो एक अकादमिक चर्चा के तहत वह अपना पक्ष पेश करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है। इस चर्चा का उद्देश्य किसी सम्प्रदाय या व्यक्ति के खिलाफ द्वेष फैलाना कतई नहीं है बल्कि इसका लक्ष्य ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इन सूफियों के बारे में एक पक्ष को प्रस्तुत करना मात्र है।

[मनमोहन शर्मा के अन्य लेख पढने के लिए उनके नाम पर क्लिक करिए]

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