आंवला नवमी : आयुर्वेद आशीर्वाद और परम्पराएं

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प्रकृति का अद्भुत चमत्कार ऋतु परिवर्तन का मनुष्य पर प्रभाव पडता है। कार्तिक महिने मे ठंडी की शुरुआत होती है। ऐसे समय बहुउपयोगीआंवला फल प्रकृति हमें प्रदान करती है।

आंवले का धार्मिक दृष्टि से भी महत्व है। आंवले के वृक्ष पर अनेक देवी देवता वास करते हैं ऐसा समझा जाता है। इस वृक्ष के मूल में विष्णु, तने में ब्रम्हदेव और टहनियों में भगवान शंकर का वास है।

इसलिए ये वृक्ष विशेष पूजनीय है। कार्तिक मास में आंवले के पूजन का महत्व है। कार्तिक शुद्ध अष्टमी से पूर्णिमा तक आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करते हैं।

भोजन के पहले वृक्ष की व श्री विष्णु की पूजा करने का विधान है। वृक्ष के नीचे दीपक जलाए जाते हैं। आंवला संबंधी श्लोक या भजन कहकर सभी भोजन का आस्वाद लेते है।

आंवले पर दीप लगाकर वृक्ष कीआरती उतारते हैं। सदीप आंवले का दान करते हैं। इसे आंवली भोजन कहते हैं।

कार्तिक महीने में किये जाने वाले तुलसी विवाह में आंवला, गन्ना, बेर का भी महत्व है। आंवले के अलौकिक गुणधर्म का सभी को पता चले इसलिये आंवली भोजन के समान कार्यक्रम किये जाते हैं।

हमारी संस्कृति में इसी कारण वृक्ष पूजा का महत्व है। आंवला गुणकारी है फिर भी तुलसी विवाह के पूर्व उसका सेवन ना करें, ऐसा संकेत है। आंवले के वृक्ष में देवों का निवास होने के कारण मंदिर, घर की दक्षिण दिशा में आंवले का वृक्ष लगाते हैं।

कार्तिक मास में इस वृक्ष के नीचे राधा दामोदर की मूर्ति स्थापन कर उनका पूजन किया जाता है। इस मास में नित्य आंवला वृक्ष की पूजा करने से पूजक विष्णु व शिव का प्रिय होता है, आंवला एक पवित्र फल है जो अलक्ष्मी का नाश करता है।

धात्रिदेवि नमस्तुभ्यं सर्वपापक्षयंकरि ।
निरोगं कुरु मां नित्यं निष्पापं धात्रि सर्वदा ।।

आंवले के वृक्ष की छाया व आंवला फल के अनेक उपयोग होने से उसे “अमृतफल”कहते हैं। आंवला फल दुर्लक्षित न हो या इस हेतु से व इस फल व वृक्ष प्रेम संवर्धन के लिए आंवला पूजन व आंवली भोजन का आयोजन होता है इस दैवीय आंवले के छाया मे कुछ समय बैठना भोजन करना कार्तिक मास में आरोग्यप्रद होता है भोजन करना, खेल खेलना ये केवल निमित्त है, आंवलावृक्ष के आसपास का वातावरण व उससे निकलने वाली तरंग शक्ति का लाभ हमें मिलता है इसलिये आंवले के वृक्षों का संवंर्धन आवश्यक है।

– Vishwaksen Deshmukh

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