यह सच मीडिया नहीं बताता कि RSS BJP ने मन्दिर निर्माण की क्यों ठानी!

रामजन्मभूमि अयोध्या श्रृंखला शुरू की थी अपने पहले लेख में 30 अक्टूबर 1990 की घटना के साथ। उसके आगे की बात करने से पूर्व आपको उस तथ्य से परिचित कराना चाहता हूं जिसने इस देश की राजनीतिक सामाजिक दशा और दिशा ही बदल दी।

अयोध्या में रामजन्मभूमि का विवाद आज जिस स्थिति में पहुंच चुका है वह स्थिति महाभारत के उस प्रसंग की याद दिला रही है जब पांडवों ने अपने राज्य के बदले कौरवों से केवल 5 गांव मांगकर झगड़ा खत्म करने का प्रस्ताव दुर्योधन के समक्ष रखा था किन्तु उसने सुई की नोंक बराबर ज़मीन भी नहीं देने का ऐलान कर उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

1949 से रामजन्मभूमि पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा जड़े गए ताले को खोलने की मांग हिन्दुओं द्वारा तभी से की जा रही थी। 80 के दशक में स्वयं RSS द्वारा निकाली जा रही राम जानकी रथयात्रा का नारा राम मंदिर निर्माण नहीं बल्कि यह था कि ‘आगे बढ़ो जोर से बोलो, जन्मभूमि का ताला खोलो’। उस समय तक हिन्दुओं की तरफ से यही मांग ही की जा रही थी।

31 अक्टूबर 1984 को हुई इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात यह रथयात्रा भी स्थगित कर दी गयी थी। इसके पश्चात दशकों से चल रहे रामजन्मभूमि विवाद के मुकदमे का फैसला सुनाते हुए 1986 में फैज़ाबाद के जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिन्दूओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दे दिया था।

इस फैसले से हिंदू समुदाय संतुष्ट भी था। सच तो यह है कि आम मुसलमान ने भी इस फैसले के पक्ष या विरोध में कोई रुचि नहीं दिखाई थी। एकतरह से अगर यह कहा जाए कि विवाद वहीं खत्म हो गया था तो गलत नहीं होगा।

लेकिन शाहबानो के पक्ष में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में आकर राजीव गांधी द्वारा संसद में कानून बनाकर पलट दिये जाने से पूरी तरह बेकाबू और बेलगाम हो चुके मुस्लिम कट्टरपंथियों ने फैज़ाबाद जिला न्यायालय के फैसले को भी शाहबानो के फैसले की तरह बदलवाने का ऐलान करते हुए बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमेटी का गठन कर डाला था।

उस समय बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमेटी के सैयद शहाबुद्दीन ने बहुत दम्भ के साथ दावा किया था कि जब हमने सुप्रीम कोर्ट का फैसला सरकार से बदलवा दिया तो जिला न्यायालय के इस फैसले की क्या हैसियत है। हम सरकार से इसे भी बदलवा देंगे।

इसी के साथ उस कमेटी ने सरकार पर दबाव बनाना प्रारम्भ कर दिया था। यही वह बिंदु था जिसने पूरे परिदृश्य को बदल दिया था। कट्टरपंथी मुस्लिमों की ठेकेदार बनी बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमेटी की उस धूर्त मांग के खिलाफ देश और उत्तरप्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकारों समेत सभी राजनीतिक दलों ने शातिर मौन साध लिया था।

बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमेटी की उस जहरीली ज़िद के खिलाफ सिर्फ भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद ही मज़बूती के साथ खड़े हुए थे। और जवाब में अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण की घोषणा कर दी थी। भाजपा ने सबसे पहले 1989 में पालमपुर अधिवेशन में मंदिर के निर्माण के संबंध में संकल्प लिया था।

यह स्थिति महाभारत के उस प्रसंग की याद दिला रही थी जब पांडवों ने अपने राज्य के बदले कौरवों से केवल 5 गांव मांगकर झगड़ा खत्म करने का प्रस्ताव दुर्योधन के समक्ष रखा था किन्तु उसने सुई की नोंक बराबर जमीन भी नहीं देने का ऐलान कर उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसका परिणाम क्या हुआ था यह सब जानते हैं।

अतः सेक्युलरिज़्म के सियासी/ मीडियाई ठेकेदार जब BJP RSS VHP पर रामजन्मभूमि को लेकर साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाते हैं तो बहुत शातिर तरीके से यह सच छुपा लेते हैं कि यदि बाबरी मस्ज़िद एक्शन कमेटी की उस ज़हरीली साम्प्रदायिक ज़िद के ख़िलाफ़ अगर BJP RSS VHP नहीं खड़ी हुई होती तो बाकायदा कानून बनाकर रामजन्मभूमि पर हमेशा के लिए ताला जड़ दिया गया होता।

आजकल राम मन्दिर निर्माण के लिए जल बिन मछली की तरह तड़प रहे, BJP RSS को कोस रहे कालनेमि नस्ल के बहुरूपिये रामभक्तों की फौज उस मौके पर गधे के सिर से सींग की तरह गायब थी।

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