‘कैसे’ और ‘किसने’ से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि इन्हें इतिहासकार बनाया ‘क्यों’ गया!

मित्र देवांशु झा पेशे से मीडियामैन हैं। रवीश-बरखा टाइप नहीं, राष्ट्रवादी वाले, वो भी पक्के वाले। मतलब एकदम यूनिक।

इतने यूनिक कि संवेदनशील कवि के साथ क्रिकेट का भी शौक रखते हैं। उनकी क्रिकेट की पोस्ट इतनी जानदार होती है कि उसमें कवर ड्राइव से लेकर स्ट्रेट ड्राइव, ठीक बॉलर के ऊपर से, चौके -छक्के ही पड़ते हैं।

लेखन में एक दम विराट कोहली हैं, हर विषय पर इतना कड़ा प्रहार करते हैं कि बॉल का शेप बिगड़ जाता है।

पिछले दिनों उन्होंने नकली इतिहासकार इरफ़ान हबीब की धुनाई करते हुए लेख लिखा था। मगर मुझे उनके शॉट पर मजा नहीं आया तो मैंने उन्हें तुरंत फोन किया और आग्रह किया था कि इस प्लांटेड इतिहासकार की ऐसी धुनाई करें कि एक ओवर में आठ छक्के हों। आठ कैसे, वो ऐसे कि बॉलर बाल डालना भूल जाए और दो नो बॉल डाल दे। उन्होंने मेरा आग्रह हंसते हुए स्वीकार कर लिया था।

बाद में मैंने उनके लेख को फिर से पढ़ा तो पाया कि लेख में तर्को के साथ जम कर प्रहार हो रखा था। फिर मुझे संतोष क्यों नहीं हुआ? मन ही मन विश्लेषण किया तो पाया कि असल में हबीब के सफ़ेद झूठ को लेकर इतना मन में आक्रोश है कि वो शांत नहीं हो पा रहा। और हो भी नहीं सकता।

वामपंथी बौद्धिक गिरोह ने भारत के समृद्ध इतिहास को इतना विकृत कर दिया है कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति सवाल के घेरे में आ गयी। और यह आक्रोश मेरा अकेले का नहीं, हर आम भारतीय इनकी बातों को सुनकर हैरान होता है, जब वो पाता है कि जो इनके द्वारा बताया जा रहा है वो ज़मीन पर बिलकुल उलट है।

वो तो सनातन संस्कृति लोककथाओं में परम्पराओं में रची बसी है, हमारा इतिहास श्रुति रूप में सदियों से जन जन के मन मस्तिष्क में अंकित है और जीवंत रहा, वरना इन्होंने हमें अपने ही घर से बेघर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आप पूछ सकते हैं, कैसे?

इस गिरोह ने ही तो आर्यों को बाहरी और आक्रमणकारी घोषित कर रखा है। इन दिनों मैं अपनी अगली पुस्तक ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ लिख रहा हूँ, अध्ययन में पाता हूँ कि इन लोगों की आर्यन थ्योरी शायद दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है।

इस पर तो मैं विस्तार से अपनी पुस्तक में लिख ही रहा हूँ, मगर ये अकेला झूठ नहीं जो इन्होंने परोस रखा है बल्कि इनके रचे इतिहास के हर पन्ने में तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा गया है। जब ये लोग, भारत के दिल में बसे श्रीराम को काल्पनिक कह सकते हैं तो इनके झूठ कि कोई सीमा नहीं हो सकती।

[इरफान हबीब, आप इतिहासकार हैं या मुसलमान!]

ऐसे में जब ये लोग राष्ट्रवादी संगठन आरएसएस की आईएसआईएस से तुलना करते हैं तो इनके चेहरे से नकाब हटता है और फिर नज़र आता है इनका असली रूप-स्वरूप जिसकी कुरूपता के बल पर इन्होंने बौद्धिक आतंक मचा रखा है।

जब ये इतने बड़े बड़े झूठ बोल सकते हैं तो शाह शब्द को पारसी से संबंधित बताना तो छोटी मूर्खता ही है। और एक मिनट के लिए अगर इसे सच मान भी लें तो भी इन्हें शायद ईरान का स्वयं का इतिहास नहीं पता। जो फिर कभी आर्यों से प्रभावित संस्कृति ही रही आयी है।

ईरान का संबंध भारत से इतना निकट का है कि कहा जाता है कि वहां भी आर्य ही यहाँ से जाकर ही कभी बसे थे। यकीन नहीं होता तो उनके ग्रंथ अवेस्ता को पढ़ लें। इसकी भाषा संस्कृत से प्रभावित है और विचारों के केंद्र में वेद हैं।

पर्शिया भी कभी आर्य साम्राज्य का ही हिस्सा था। मगध तक यह सिलसिला कुछ कुछ चला है। पर्शिया का एक नाम आर्यणाम भी हुआ करता था जिससे आधुनिक शब्द ईरान बना है जिसका वर्णन ऋग्वेद और अवेस्ता में आया हुआ है।

भारत और ईरान, दोनों देशों की प्राचीन भाषाओं में मूलतः पर्याप्त समानता है। चूंकि दोनों देशों के प्राचीनतम ग्रन्थ क्रमश: ‘ऋग्वेद’ तथा ‘अवेस्ता’ हैं और ‘अवेस्ता’ का निर्माण-काल लगभग ई. पू. की शताब्दी है, जबकि ऋग्वेद इससे सहस्रों वर्ष पूर्व रचा जा चुका था।

अतः स्वाभाविक रूप से किसने किससे शब्द लिए होंगे, आसानी से समझा जा सकता है। एक उदाहरण लेते हैं, संस्कृत में जल को आपः कहते हैं जो वहाँ जाकर आब बना और यही आब वापस हिंदुस्तान आकर क्या क्या शब्द बनाता है हम सब को मालूम है। अब हबीब कह सकते हैं कि ‘आब’ हमने ईरान से लिया लेकिन वो यह नहीं बता पाते कि हमने ही उन्हें ‘आप’ दिया।

वैसे हबीब साहेब, शब्द निर्माण की प्रकिया संस्कृत में अद्भुत है। वैसे तो आप लोग पढ़ते नहीं, लेकिन कभी पढ़िएगा। कैसे हरित और सरिता एक दूसरे से जुड़ कर उत्पन्न होते हैं। संस्कार – संस्कृत – संस्कृति, यह क्रम जितना देखने में आपस में जुड़ा हुआ है उतना ही इनके अर्थ भी एक दूसरे से गुंथे हुए हैं।

[तुम विधवा विलाप न करो, तुम्हारा समय ख़त्म हुआ!]

अरे आप तो ‘शाह’ जैसे एक शब्द में ही फंस गए। चलो थोड़ी बात उसकी भी हो जाए। तो क्या आप को इतना भी याद नहीं कि दुनिया के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल के राजवंश का क्या नाम था – शाह वंश। राजस्थान और मध्य भारत में शाह से मिलते जुलते नाम प्रचलित रहे है। वो सब कौन थे? थोड़ा अध्ययन कीजिये।

शिवाजी के एक पौत्र का नाम शाहू था जो फिर साहू से मिलता जुलता है। और यह साहू शब्द साधू से जा मिलता है। वैसे कितने भी प्रमाण दे दो, इस गिरोह को तो सच मानना ही नहीं है। क्योंकि इनको पैसे झूठ बोलने-लिखने के लिए ही मिलते रहे हैं। याद नहीं, जब अयोध्या की खुदाई में मंदिर के अवशेष मिलने लगे थे तब कैसे इन लोगों ने झूठ के नए कुतर्क रचे थे। ऐसे में इन सब से तथ्यों के साथ तर्कपूर्ण बात की उम्म्मीद करना ही मूर्खता है।

हैरानी इस बात की नहीं कि ये सब इतिहाकार कैसे बने, अधिक हैरानी इस बात को लेकर है कि इन्हें इतिहासकार बनाया किसने? उससे अधिक महत्वपूर्ण है इन्हें इतिहासकार बनाया क्यों गया? इस ‘क्यों’ के जवाब में अनेक राज़ छिपे हैं।

फिलहाल यह मान कर चलें कि इन वामपंथियों की हर बॉल, नो-बॉल होती है, जिसे आप क्रीज़ से आगे बढ़कर खुलकर मार सकते हैं। जब तक इनकी हर बॉल पर छक्का नहीं जड़ा जाएगा, तब तक इनका मनोबल नहीं टूटेगा।

क्या भारत इतनी देर सब्र कर पायेगा?

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