तुम विधवा विलाप ना करो, तुम्हारा समय खत्म हुआ!

प्रयाग को प्रयाग और अयोध्या को अयोध्या के रूप में पुनर्स्थापित किये जाने से जिन महान इतिहासकारों को क्लेश हो रहा है वे कौन हैं..? महात्मा, देवता, यक्ष, गंधर्व या कुछ और…

मैंने अपने कई साथी मित्रों को इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर और रामशरण शर्मा के लिए विनयावनत देखा है। एक पूरी पीढ़ी इनके पढ़ाए इतिहास का छात्र रही है।

वे तो जैसे मान बैठे थे कि इन्होंने जो लिख दिया है वही ब्रह्मवाक्य है। इतिहास वहीं से शुरू होता है और वहीं खत्म हो जाता है, जहां हबीब, थापर और शर्मा जैसे निर्लज्ज, पतित उसे खत्म करते हैं। आश्चर्य है कि इन्होंने अपने इतिहास में क्या लिखा.. सिर्फ हिन्दूनिंदा!!!

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पूर्व निदेशक के के मुहम्मद की साफ़गोई और अयोध्या में खुदाई से मिले मंदिर के दर्जनों प्रमाणों को इन मक्कारों ने कालीन के नीचे डाल दिया।

इससे निपट धूर्तता और कृतघ्नता और क्या हो सकती है कि पचासों स्तंभ… जल बहाव की प्रणाली, टैराकोटा की मूर्तियां, शिलालेख पर उत्कीर्ण विष्णु हरि का मंदिर… सब कुछ मिटा कर कह दिया कि नहीं… अयोध्या में तो राम का मंदिर था ही नहीं! राम का मंदिर तो रोम में होना था… क्यों मक्कार महोदय..! जिस हिन्दू देश ने इसे इतना कुछ दिया, उसे यह महापतित झूठ और ठगी के सिवा कुछ न दे सका…

इस पांत के इतिहासकारों ने अपने पूरे जीवन में एक ही बात प्रचारित की है कि प्राचीन से लेकर मध्यकालीन भारत में सबकुछ तो खराब ही था। और वह तो अनिवार्य रूप से था, जिसे हम हिन्दू जीवन पद्धति कहते हैं। इन राक्षसों ने जब ब्रह्मस्वरूप आदि शंकर को भी मलिन करने का प्रयास कर डाला तो राजा महाराजा किस खेत की मूली थे!

इनके इतिहास में हिन्दू जीवनपद्धति, कला संस्कृति, चिंतन परंपरा सबकुछ पतनशील है। यहां तो मुसलमानों के आने के बाद तहज़ीब रौशन हुई। सबकुछ नियमनिष्ठ हो सका। बौद्धों की भूरि भूरि प्रशंसा करना, हिन्दू सम्राटों की भर्त्सना करना ही इनका ध्येय रहा और ये सबसे सम्मानित सेक्यूलर भी कहलाए। हाय रे हतभाग्य हिन्दू… पहले आततायियों से लड़ते रहे फिर इन बौद्धिक बेशर्मों का प्रलाप सुना। और एक बाबरी ध्वंस कर ईशनिंदा का पात्र बन बैठा!

इन्होंने सबसे बड़ा अपराध तो यह किया कि एक पूरे दौर को, जिसने विभाजन की त्रासदी झेली उसे आत्मावलोकन का अवसर ही नहीं दिया। जो करोड़ों मुसलमान यहां रह गए उन्हें यह तो अनुभव करना ही था कि जिसे वो अपना पुरखा मानते हैं वो धार्मिक, नैतिक और सामाजिक तौर पर विश्व के सबसे विध्वंसक, पतित, हत्यारे और न्यूनतम संवेदनशील लोग थे। उन्हें यह जानना ही था कि गजनी से लेकर औरंगजेब और उसके दाक्षिणात्य भाई टीपू ने इस देश के हिन्दुओं को सिर्फ टीस ही दी है। हत्या और ध्वंस की हाहाकारी शतियां। जिसका वर्णन करते हुए विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार विल डूरान्ट लिखते हैं कि द मोहम्मेडन कन्क्वेस्ट ऑफ इंडिया इज़ प्रोबैबली द ब्लडिएस्ट स्टोरी टू टेल…!

अब मैं यह मानने लगा हूं कि यह हमारे समय का सबसे महान कालखंड है। हज़ार वर्षों के पतन को भोगकर यह सभ्यता सांस्कृतिक रूप से खड़ी हो रही है और यह हिन्दू जागरण का काल है। लेकिन, हिन्दू जागरण का अर्थ मुसलमान विरोध नहीं होता। उन्हें हमसे कोई भय नहीं होना चाहिए बशर्ते कि वे धारा के नीचे छुप कर षड़यंत्र न करें। परंतु सत्य का उद्घाटन तो होना ही है। उसे यह तो जानना ही होगा, हर बच्चे को जानना होगा कि इस देश के हज़ारों मंदिर कहां विलीन हो गए और हर मध्यकालीन मस्जिद, दरगाहों में हिन्दू देवी देवताओं की विखंडित मूर्तियां, बिखरे पड़े प्रस्तरखंड, शिलाएं क्यों मिलती हैं…

इरफान हबीब प्रयाग और अयोध्या तो हिन्दू संस्कृति के प्राण हैं। अब तो हर छोटे बड़े और गुमनाम शहरों के नाम भी बदले जाने चाहिए। कुछ ऐसे ही विचार मन में आ रहे हैं कि पूरे घर की बदल डालूंगा! ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सके कि वह प्रयाग था, प्रयाग है और प्रयाग ही रहेगा। इलाहाबाद तो कोई दु:स्वप्न था, खत्म हो गया। किसी आक्रांता के नाम पर बसाया गया शहर नए भारत में अस्तित्व में नहीं रहेगा। सारे बाद… बर्बाद होकर इतिहास की गर्त में जाएंगे और हर जगह से कर्णावती… अयोध्या उठेगी। तुम विधवा विलाप ना करो! तुम्हारा समय खत्म हुआ…!!

इरफ़ान हबीब, आप इतिहासकार हैं या मुसलमान!

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