जब ‘मुलायमी’ दावे के मुंह पर पड़ा ज़ोरदार थप्पड़, आखिर कौन था वह लंगोटधारी साधु

पिछले 26 वर्षों के दौरान कुम्भकर्णी नींद सोते रहे उद्धव ठाकरे, करणी सेना, काँग्रेसी प्रमोद कृष्णम, हिन्दू महासभाई चक्करपाणि सरीखे तमाम नए नवेले रामभक्तों के सूचनार्थ/ध्यानार्थ यह श्रृंखला शुरू कर रहा हूं जिनकी भुजाएं राम मंदिर निर्माण के लिए पहली बार अचानक फड़कने लगीं हैं, खून खौलने लगा है।

अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए ऐसे शातिर रामभक्त ठेकेदारों की ज़रूरत ना तब थी, ना अब है। उनकी ज़रूरत क्यों नहीं है? आज इसी सवाल के जवाब वाली इस पहली कड़ी के साथ श्रृंखला शुरू कर रहा हूं।

30 अक्टूबर 1990 को निर्धारित कारसेवा से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दम्भी दावा किया था कि बाबरी ढांचा तो छोड़िए, अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा।

मुलायम सिंह यादव का वह दावा ‘हवाई दावा’ मात्र नहीं था। मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में पुलिस और पीएसी के लगभग 40 हज़ार जवानों की तैनाती कर के अयोध्या को छावनी में बदल दिया था।

अयोध्या की तरफ जाने वाली ट्रेनों बसों को रोक दिया गया था। अयोध्या स्थित बाबरी ढांचे की तरफ जानेवाले मुख्य मार्गों और गलियों तक में अनेक स्थानों पर लोहे की बैरिकेडिंग लगाकर ढांचे तक जाने वाले सारे मार्ग सील कर दिए गए थे। हर बैरिकेडिंग पर सशस्त्र पुलिस बल भी तैनात किया गया था।

पूरे देश से किसी तरह अयोध्या तक पहुंचे रामभक्तों के जत्थों के लिए इन सारे सुरक्षा प्रबंधों के कारण ढांचे तक पहुंचना असम्भव कर दिया गया था।

कारसेवकों द्वारा पहली बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश के जवाब में पुलिस द्वारा किये गए भयंकर लाठीचार्ज के कारण विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल समेत दर्जनों रामभक्तों के सर बुरी तरह फूट गए थे और वो लहुलुहान हो गए थे किंतु बैरिकेडिंग नहीं टूट सकी थी।

किन्तु तभी एक करिश्मा हुआ था…

बाबरी ढांचे से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित हनुमानजी के विश्वविख्यात मन्दिर के बंद कपाट अचानक खुले थे और मात्र एक भगवा लंगोट पहने हुए साधु तेजी के साथ हनुमान गढ़ी से निकला।

उस साधु ने छलांगे मारते हुए वहां खड़ी पीएसी की बस पर चढ़कर बस की ड्राइविंग सीट सम्भाल ली थी और पलक झपकते ही वह बस रास्ते में लगी बैरिकेडिंगों को रौंदते हुए बाबरी ढांचे की तरफ दौड़ने लगी थी।

राह में लगी दर्जनों बेरिकेडिंगों को रौंदकर कुछ ही क्षणों में बाबरी ढांचे तक पहुंच गयी थी।

उस लंगोटधारी साधु द्वारा बहुत संकरी सड़क पर रौद्र शैली में दौड़ायी जा रही बस से अपनी जान बचाकर भागे पुलिस के जवानों तथा बस द्वारा पूरी तरह रौंद दी गयी बेरिकेडिंगों के कारण बिल्कुल साफ हो गए रास्ते पर रामभक्त कारसेवकों का सैलाब बस के साथ उसके पीछे उमड़ पड़ा था।

बस के रौद्र रूप से सहमा पुलिसबल जबतक सम्भलता तबतक बाबरी ढांचा हज़ारों रामभक्त कारसेवकों से घिर गया था तथा कारसेवकों ने ढांचे के गुम्बद पर चढ़कर उसके शिखर पे भगवा ध्वज फहरा दिया था।

30 अक्टूबर 1990 को बाबरी ढांचे पर चढ़े कारसेवकों और उसपर लहराते भगवे का वह दृश्य उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के उस दम्भी दावे के मुंह पर जोरदार थप्पड़ की तरह था जिन मुलायम सिंह यादव ने पुलिस बल के 40 हज़ार जवानों की भारी भरकम फौज तैनात कर के यह दम्भी दावा कर दिया था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा।

हनुमान गढ़ी से निकल कर बाबरी ढांचे से निकला वह साधु कौन था? इस प्रश्न का उत्तर आजतक नहीं मिल सका।

बस के पीछे पीछे आयी रामभक्तों की भीड़ में बस रोक कर शामिल हुआ वो साधु कहां गया? यह प्रश्न भी आजतक अनुत्तरित ही है।

एक मंदिर से निकला साधु उस कई संकरे मोड़ों वाली संकरी सड़क पर किसी मंझे हुए ड्राइवर की तरह बस कैसे चलाने लगा? बस की चाभी उसको कैसे मिल गयी थी? आजतक इन सवालों का जवाब भी नहीं मिला है।

इसीलिए मैं कहता हूं कि…

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

शशि थरूर शायद भूल गए हैं तो याद दिलाना ज़रूरी है कि…

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