विस्मित करता भारत का आधुनिक नेतृत्व, जो स्वयं को ही दे दे भारतरत्‍न

नेतृत्व का मूल्यांकन भविष्य करता है। करना भी चाहिए। क्योंकि वर्तमान को प्रभावित किया जा सकता है, और दुनिया के हर राजा ने यह करने का प्रयास किया है।

प्राचीन काल में राजदरबारी यही काम करते रहे हैं। प्रजातंत्र भी इस से अछूता नहीं। लेकिन भारत का आधुनिक नेतृत्व विस्मित करता है, जब वो स्वयं को भारतरत्‍न से विभूषित कर लेता है।

मगर फिर भविष्य का मूल्यांकन भी उतना ही निष्ठुर है। इतना कि यदि नाम ना भी लिखूं तो आज कोई भी समझ सकता है कि यहां बात किसकी हो रही है। और अगर ऐसा है तो उसके पर्याप्त कारण हैं।

चाचा नेहरू का संदर्भ आते ही कश्मीर केंद्र में आ जाता है। लेकिन क्या सिर्फ कश्मीर समस्या के ही केंद्र में नेहरू हैं? नहीं।

अनगिनत समस्याओं ने अगर आज भारत को जकड़ा है उनमे से अधिकांश के बीज नेहरू युग में ही बो दिए गए थे। इन बीजों ने आज विशाल वृक्ष का रूप धर लिया है।

हैरान करने वाली बात यह है कि इन बीजों ने नेहरू के सामने ही अंकुरित होना शुरू कर दिया था। और कुछ एक बीज की तो जानकारी भी थी कि यह कांटेदार विषैले वृक्ष होंगे मगर फिर भी इन्हें बोकर सींचा गया।

कश्मीर उसी समय अपना रूप दिखाने लगा था। और उसे लेकर पटेल से लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रयास भी किये लेकिन इसे नजरअंदाज़ किया गया। यही नहीं, जिस शेख अब्दुल्ला से पहले भाई जैसा प्रेम था उसे ही जेल में डाल कर कूटनीति का तमाशा बना दिया गया।

इस तरह की अनगिनत ढुल-मुल नीति का ही दुष्परिणाम हुआ कि बाद में कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करना पड़ा। नेहरू, जो स्वयं को कश्मीरी पंडित कहते थे, उनकी गलत नीति का यह सर्वाधिक दुखद पहलू है कि उनके अपने लोग ही घर से बेघर हो गए।

कश्मीर ही क्यों, जिस उत्तरप्रदेश से नेहरू चुने जाते थे उसकी वो स्थिति की, कि वो आज तक उबर नहीं पाया। प्रयागराज से लेकर रायबरेली, इसकी कहानी आज भी सुना सकते हैं।

कश्मीर से सटा हुआ तिब्बत। इसे देखें। यह कभी बफर देश था, चीन और हमारे बीच। तिब्बत के हटते ही चीन हमारे सर पर आ बैठा। और सर पर बैठने की कीमत हम चुका रहे हैं और चुकाते रहेंगे।

चीन का साम्राज्यवाद तिब्बत के रास्ते ही नेपाल पहुंच चुका है और अब हमारे दरवाज़े पर खड़ा है। ‘हिंदी चीनी भाई भाई’ कब युद्ध में परिवर्तित हो गए, इसका पता ही ना चलना, किसी राष्ट्र के नेतृत्व की दृष्टि सामर्थ्य पर कितना बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

और फिर उत्तर ही क्यों, पूरब में एल्विन वैरियर को आदिवासी कल्याण योजनाओं का काम सौंपकर, अप्रत्यक्ष रूप से ईसाइयत के प्रचार की खुली छूट दे दी गई थी। परिणाम क्या हुआ, उत्तर-पूरब का परिदृश्य आज हम सब के सामने है।

कई राज्य बागी बन गये थे और कई विद्रोही, इतने कि अपने ही देश के विरोध के स्तर तक चले गए। और ये सब दुष्परिणाम मात्र पचास साल के भीतर दिखने लगे थे। ऐसे में कैसे नेहरू को भारत का निर्माता कहा जा सकता है। क्या ऐसे ही राष्ट्र का निर्माण होता है?

दक्षिण में भाषा की समस्या का बीज बोने से जो कुछ हुआ, उससे इतिहास अब अनजान नहीं। लोकतंत्र को नेहरू से जोड़ने वालों को शायद याद नहीं होगा कि केरल में चुनी हुई नंबूदरी की सरकार पहली बार किसने गिराई थी।

भारत का पश्चिम क्षेत्र तो बंटवारे के घाव से पीड़ित था, मगर उसका कोई इलाज नहीं किया गया। बल्कि सेक्युलरिज़्म का वो बीज बोया गया जो आज नासूर बन चुका है।

क्या नेहरू ने बंटवारे से कोई सबक नहीं लिया था? शायद नहीं, जिसका भुगतान देश आजतक कर रहा है और भविष्य में कितना करेगा, सोच कर ही कभी कभी भय उत्पन्न हो जाता है।

विस्तार से लिखने लगें तो ग्रंथ बन कर तैयार हो सकता है। संक्षिप्त में भी देखे तो गांव में बसे भारत के लिए कुटीर उद्योग की जगह पब्लिक सेक्टर के विशाल हाथी ने विकास पथ को कैसे रौंदा, उसके खंडहर आज भी देखे जा सकते हैं।

शिक्षा नीति ने देश में काले अंग्रेज़ों की फौज खड़ी कर दी जो फिर कभी भी बौद्धिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकते। राजनीति का तो वो हाल है कि इसे वंशवाद के वटवृक्ष ने अपने भीतर समेट लिया है।

ऐसा लगता था कि देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन सत्ता के लिए, प्रजा के लिए नहीं। तभी तो सवाल पूछने तक की स्वतंत्रता नहीं थी। याद कीजिये 2014 के पहले की ज़मीनी हकीकत। देश का क्षितिज नेहरू से प्रारम्भ होकर गांधी पर खत्म हो जाता था। लेकिन अधिक हैरान करने वाली बात यह कि यहां गांधी भी असली वाले नहीं होते थे।

ज़मीन से लेकर आसमान तक, सितारे सिर्फ एक परिवार के थे जिन्हें सिर्फ दूर से देखने भर की आज़ादी थी। और साथ थी सिर्फ इनके जयकारा लगाने की आज़ादी।

हज़ारों हज़ार साल तक वैदिक ऋषियों की सिंचित यह देवभूमि, पिछले कुछ दशकों में इन सितारों की टिमटिमाती रोशनी में ही अपने रास्ते को ढूंढ रही है, जो फिर हमें कहां ले आयी उसका साक्षी वर्तमान है। और वहीं से खड़े हो कर समय अपना मूल्यांकन कर रहा है।

इतिहासकारों, नेहरू, अब्दुल्ला की चालों का शिकार, जम्मू कश्मीर के आखिरी हिन्दू राजा हरि सिंह

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