कभी कभी प्रभु-लीला भी झुक जाती है, प्रेम-लीला के आगे

आज का लेख एक पति के प्रेम की पराकाष्ठा को समर्पित है। प्रेम की इस सत्यकथा पर शीघ्र ही बॉलीवुड के प्रख्यात डायरेक्टर सिद्धार्थ रॉय कपूर एक फ़िल्म भी बनाने जा रहे हैं…

तस्वीर अजेमर के निवासी विजेंद्र सिंह राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी लीला की है।

2013 में लीला ने विजेंद्र से आग्रह किया के वह चार धाम की यात्रा करना चाहती हैं। विजेंद्र एक ट्रेवल एजेंसी में कार्यरत थे। इसी दरमियान ट्रैवेल एजेंसी का एक टूर केदारनाथ यात्रा जाने के लिये निश्चित हुआ। पतिपत्नी ने अपना बोरिया बिस्तर बांधा और केदारनाथ जा पहुंचे।

विजेंद्र और लीला एक लॉज में रुके थे। लीला को लॉज में छोड़ विजेंद्र कुछ दूर ही गये थे के चारों ओर हाहाकार मच गया। उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ का उफनता पानी केदारनाथ आ पहुंचा था। विजेंद्र ने बामुश्किल अपनी जान बचाई। मौत का तांडव और उफनते हुये पानी का वेग शांत हुआ तो विजेंद्र बदहवास होकर उस लॉज की ओर दौड़े जहाँ वह लीला को छोड़ कर आये थे। परन्तु वहाँ पहुंच कर जो नज़ारा दिखा वह दिल दहला देने वाला था। सब कुछ बह चुका था। प्रकृति के इस तांडव के आगे वहां मौजूद हर इंसान बेबस दिख रहा था।

तो क्या लीला भी…..

नहीं नहीं। ऐसा नहीं हो सकता – विजेंद्र ने अपने मन को समझाया।

“वह जीवित है” विजेंद्र का मन कह रहा था। इतने वर्षों का साथ पल भर में तो नहीं छूट सकता।

परन्तु आस पास कहीं जीवन दिखाई नहीं दे रहा था। हर ओर मौत तांडव कर रही थी। लाशें बिखरी हुई थी। किसी का बेटा किसी का भाई तो किसी का पति बाढ़ के पानी मे बह गया था।

विजेंद्र के पास लीला की एक तस्वीर थी तो हर समय उसके पर्स में रहती थी। अगले कुछ दिन वह घटनास्थल पर हाथ में तस्वीर लिये घूमता रहा। हर किसी से पूछता “भाई इसे कहीं देखा है”।
और जवाब मिलता ………

“ना”

एक विश्वास था जिसने विजेंद्र को यह स्वीकारने से रोक रखा था के लीला अब इस दुनिया में नहीं है।

दो हफ्ते बीत चुके थे। राहत कार्य जोरों पर थे। इसी दरमियान उसे फौज के कुछ अफसर भी मिले जिन्होंने उससे बात की। लगभग सबका यही निष्कर्ष था के लीला बाढ़ में बह चुकी है।
विजेंद्र ने मानने से इनकार कर दिया।

घर मे फोन मिला कर बच्चों को इस हादसे के बारे में सूचित किया। बच्चे अनहोनी के डर से घबराये हुये थे। रोती बिलखती बिटिया ने पूछा के “क्या अब माँ नहीं रही” तो विजेंद्र ने उसे ज़ोर से फटकार दिया और कहा – “वह जीवित है “।

एक महीना बीत चुका था। अपनी पत्नी की तलाश में विजेंद्र दर दर भटक रहा था। हाथ में एक तस्वीर थी और मन मे एक आशा… “वह जीवित है”

इसी बीच विजेंद्र के घर सरकारी विभाग से एक फोन आया। एक कर्मचारी ने कहा के लीला मृत घोषित कर दी गयी है और हादसे में जान गँवा चुके लोगों को सरकार मुआवजा दे रही है। मृत लीला के परिजन भी सरकारी ऑफिस में आकर मुआवजा ले सकते हैं।

विजेंद्र ने मुआवज़ा लेने से भी इंकार कर दिया। परिजनों ने कहा के अब तो सरकार भी लीला को मृत मान चुकी है। अब तलाशने से कोई फ़ायदा नहीं है। परन्तु विजेंद्र ने मानने से इनकार कर दिया। जिस सरकारी कर्मचारी ने लीला की मौत की पुष्टि की थी उसे भी विजेंद्र ने कहा… “वह जीवित है”

विजेंद्र फिर से लीला की तलाश में निकल पड़े। उत्तराखंड का एक एक शहर नापने लगे। हाथ में एक तस्वीर और ज़ुबान पर एक सवाल ” भाई इसे कहीं देखा है?” और सवाल का एक ही जवाब

“ना”

लीला से विजेंद्र को बिछड़े अब 19 महीने बीत चुके थे। इस दरमियान वह लगभग 1000 से अधिक गाँव मे लीला को तालाश चुके थे।

27 जनवरी 2015

उत्तराखंड के गंगोली गाँव मे एक राहीगर को विजेंद्र सिंह राठौर ने एक तस्वीर दिखाई और पूछा “भाई इसे कहीं देखा है”

राहीगर ने तस्वीर ध्यान से देखी और बोला…

“हां”

“देखा है। इसे देखा है”। ” यह औरत तो बौराई सी हमारे गाँव मे घूमती रहती है”।
विजेंद्र राहीगर के पांव में गिर पड़े। राहीगर के साथ भागते भागते वह गाँव पहुंचे। वहीं एक चौराहा था और सड़क के दूसरे कोने पर एक महिला बैठी थी।

“लीला”

वह “नज़र” जिससे “नज़र” मिलाने को “नज़र” तरस गयी थी।

वह लीला थी। विजेंद्र लीला का हाथ पकड़ कर अबोध बच्चे की तरह रोते रहे। इस तलाश ने उन्हें तोड़ दिया था। भावनायें और संवेदनायें आखों से अविरल बह रही थी। आँखें पत्थर हो चुकी थी फिर भी भावनाओं का वेग उन्हें चीरता हुआ बह निकला था।

लीला की मानसिक हालत उस समय स्थिर नहीं थी। वह उस शख्स को भी नहीं पहचान पाई जो उसे इस जगत में सबसे ज्यादा प्यार करता था। विजेंद्र ने लीला को उठाया और घर ले आये। 12 जून 2013 से बिछड़े बच्चे अपनी मां को 19 महीने के अंतराल के बाद देख रहे थे। आखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था।

यह 19 महीने विजेंद्र सिंह राठौर के जीवन का सबसे कठिन दौर था। परन्तु इस कठिनाई के बीच भी विजेंद्र के हौसले को एक धागे ने बांधे रखा। वह “प्रेम” का धागा है। एक पति का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और समर्पण जिसने प्रकृति के आदेश को भी पलट कर रख दिया। लीला के साथ बाढ़ में बह जाने वाले अधिकतर लोग नहीं बचे। लीला बच गयी। शायद विजेंद्र प्रभु से भी कह रहे थे –

“वह जीवित है” और प्रभु को भी विजेंद्र के प्रेम और समर्पण के आगे अपना फैसला बदलना पड़ा।

ए माँ तुझे सलाम!

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