श्रीराम जन्मभूमि मंदिर मामले में इस्तेमाल होता ‘ओमेरटा’ का कानून!

तस्वीर और उससे सम्बंधित जानकारी 13 नवम्बर 2018 के दैनिक जागरण से साभार

‘गॉडफादर’ नाम की अपनी प्रसिद्ध किताब में मारियो पूजो ‘लॉ ऑफ़ ओमेरटा’ का जिक्र करते हैं। बाद में उन्होंने ‘ओमेरटा’ नाम की भी एक किताब लिखी थी।

उनके हिसाब से इतालवी माफिया का एक अनकहा सा कानून होता था, जिसके मुताबिक सरकारी अधिकारियों से कोई बात नहीं की जाती थी।

उन्हें जानकारी न देने का ये कानून इतना सख्त था कि वो रास्ता पूछें या बाज़ार में सामान की कीमत, कुछ भी नहीं बताना था! थोड़े से ढीले रूप में इस कानून का मतलब होता था कि माफिया के सदस्य पुलिस को कोई जानकारी नहीं देंगे।

‘ओमेरटा’ का ये कानून भारत में इस्तेमाल होते देखना हो तो ‘राम जन्मभूमि मंदिर’ कहकर देखिये। पिछले तीन-चार वर्षों में कई राष्ट्रवादियों ने इसपर चुप्पी साध रखी है। इसके बारे में भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में आखिरी पन्नों पर लिखा होता है, शायद इसलिए इसकी याद भी अंत में आई होगी।

थोड़े समय तेज़ी से चले मुकदमों ने कुछ भरोसा दिलाया था, लेकिन हाल के घटनाक्रम ने परिस्थितियां बदल दी हैं। सबरीमला पर हुए आक्रमण ने जनता के एक बड़े वर्ग का भरोसा न्याय व्यवस्था पर ही नहीं, राजनैतिक नेतृत्व पर भी काफी कम कर दिया।

आक्रमणकारियों से छीनकर सबरीमला पर वापस सनातनियों के अधिकार के लिए जारी लड़ाई सड़कों पर आई और अंततः न्यायलय को अपने ‘फैसले’ पर पुनः विचार के लिए तैयार किया गया।

राम मंदिर के मामले में फुसलाने के प्रयास आग में घी का काम करते ही दिख रहे हैं। दबाव के सोशल मीडिया पर बढ़ने से शुरू होकर सड़कों की तरफ जाने के क्रम में पेड मीडिया ने भी इसपर ध्यान देना शुरू किया है।

कल के ‘दैनिक जागरण’ (13 नवम्बर 2018) में इस विषय पर पूरा एक पन्ना दिखा। लेख के साथ लगी तस्वीर वहीँ से स्कैन की हुई है। इसमें मुख्य विषय ए.एस.आई. द्वारा की गई वैज्ञानिक जांच-पड़ताल है।

लेख के मुताबिक सोलह साल पहले, अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर 1 अगस्त 2002 और 23 अक्टूबर 2002 को विवादित स्थल के जियो-रेडियोलॉजिकल सर्वे के आदेश दिए गए थे। 17 फ़रवरी 2003 को इसकी सौंपी गयी रिपोर्ट के आधार पर 5 मार्च 2003 को ए.एस.आई. को खुदाई के आदेश दिए गए।

सन 1993 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति ने पूछा था कि क्या वहां कोई हिन्दू मंदिर या हिन्दू धार्मिक स्थल था, तो सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इस सवाल को बेकार और अनावश्यक बताते हुए वापस कर दिया था।

वैज्ञानिक जांच में ट्रेंच आठ से निकले नमूनों में 90 से लेकर 340 तक के नमूने हैं। यहाँ से शुंगकालीन (ईसा पूर्व पहली और दूसरी शताब्दी), कुषाण कालीन (पहली से तीसरी शताब्दी), गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी), उत्तर गुप्त या राजपूत काल (सातवीं से दसवीं शताब्दी) के अवशेष मिले हैं।

जो सबसे बड़ी संरचना मिली उसके 50 में से अभी सिर्फ चार खम्भे ही मिले हैं। ये रिहाइशी संरचना से बिलकुल अलग था और इसका लम्बे समय तक सार्वजनिक इस्तेमाल हुआ हो, ऐसे प्रमाण मिले हैं। ये संरचना ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी की है।

इस रिपोर्ट का ज़िक्र किया जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि चुप्पी लगा जाना किसी विचार की हत्या करने का सबसे सरल उपाय है। यही कारण है कि सीताराम गोयल जैसे इतिहासकारों या गुरुदत्त जैसे लेखकों की किताबों पर अगर आप कोई समीक्षा, कोई रिव्यु ढूंढेंगे तो नहीं मिलेगा। उन्हें अच्छा तो क्या, बुरा घोषित करने वाला भी कुछ नहीं मिलेगा।

इसकी तुलना में घटिया फिल्मों के आने से पहले ही उसे किसी न किसी विवाद से जोड़ दिया जाता है। जैसे ही विवाद होता है और निम्न कोटि के लेखक-फ़िल्मकार के समर्थक विवाद को हवा देते हैं, उसपर पक्ष-विपक्ष से चर्चा होने लगती है। चर्चा से प्रचार अपने आप हो जाता है। शायद इन वजहों से इस रिपोर्ट पर चुप्पी (ओमेरटा) लागू किया गया होगा।

तीन खण्डों की इस रिपोर्ट में निष्कर्ष-सार मिलकर दस चैप्टर हैं। पहले खंड में 200, दूसरे में 188 पन्ने हैं और तीसरे के 167 पन्नों में रंगीन तस्वीरें हैं। सिर्फ भावनाओं के बदले ठोस सबूतों की बात नहीं होती, इसलिए कई बार ‘कालनेमि’ भी भगवा धारण किये, राम काज में देरी करवाने का प्रयास करने आ धमकते हैं।

सत्ता किधर गयी ये पहचानकर उसी ओर आ जाने वाली किराये की कलमों की भी पहचान करते रहना चाहिए। बाकि सबरीमला का आन्दोलन जिस समय सड़कों पर चल रहा था, उसके साथ ही सनातनियों ने ये लड़ाई अदालतों में भी जारी रखी थी। एक विजय से सीखकर उसे दोहराया जाना भी सीखने लायक चीज़ है।

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