शोर के बीच छुपे सन्नाटे की ‘आवाज़’ सुनिए

इस रविवार इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर कहते है कि “प्रधानमंत्री मोदी एक व्यक्ति और एक नेता के रूप में एक भयभीत करने वाले प्रतिद्वंद्वी है।”

किशोर कहते हैं, “उन्होंने संघ प्रचारक के रूप में 15 साल बिताए हैं, जिसने उन्हें ज़मीनी स्तर के सामाजिक ताने-बाने का प्रत्यक्ष अनुभव दिया है। फिर उन्होंने संगठनकर्ता (organizer) के रूप में 15 साल कार्य किये जिससे उन्हें भारत में राजनीतिक व्यवस्था कैसे चलती है, इसकी समझ मिली है।”

वे आगे कहते हैं, “फिर मोदी ने प्रशासक के रूप में 15 साल बिताये। इन सभी 45 वर्षों के अनुभव को जोड़े और मुझे बताएं कि कौन से अन्य नेता के पास ऐसा सामर्थ्य और योग्यता है। यह अद्वितीय है।”

निष्कर्ष रूप में प्रशांत कहते है, “इसलिए, यदि आप उन्हें पराजित करना चाहते हैं, तो आपको उस ज़मीनी स्तर को समझने की ज़रूरत है, आपको ऐसे अनुभव की आवश्यकता है, आपको प्रशासनिक कौशल की आवश्यकता है, आपको सामाजिक समझ की आवश्यकता है। यही कारण है कि वह एक दावेदार या प्रतिद्वंद्वी के रूप में इतने खतरनाक हैं।”

ऐसे उदगार केवल प्रशांत किशोर के मुख से ही आ सकते थे, क्योंकि राजनीति का विश्लेषण करने के लिए आंकड़ों की दुनिया के बाहर देखना होता, शोर के बीच छुपे सन्नाटे की ‘आवाज़’ सुनना होता है। किशोर में यह क्षमता है; तभी उनकी वैल्यू है।

व्यूहरचना और रणनीति में भारी अंतर होता है। व्यूहरचना किसी एक खेल या युद्ध के मैदान में विपक्ष को हराने के लिए बनायी जाती है, जबकि रणनीति के अंतर्गत दीर्घकाल में विपक्ष का समूल विनाश करने के दांव-पेंच बिछाए जाते है।

रणनीति भारतीय मूल्यों को स्थापित करने के लिए भी ज़रुरी है; राष्ट्र के गौरव की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक है। क्योंकि किसी सीमित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बिछाये चक्रव्यूह को तोड़ा जा सकता है।

याद कीजिये, प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश और गुजरात के चुनावों में मतदान के एक महीने पहले रैलियों से पाट दिया था। लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में पहले चरण के मतदान तक उन्होंने गिनती की कुछ रैलियां की। इसका अर्थ है कि वे छत्तीसगढ़ के परिणाम के बारे में आश्वस्त हैं।

इसी प्रकार, न्यायालय में राम मंदिर, सबरीमला, गुजरात पर सुनवाई, राफेल पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाना, सोनिया परिवार को छूट मिलना इत्यादि, एवं तीन राज्यों में चुनावों के बावजूद वे सिंगापुर जा रहे हैं।

अगर मैं विपक्ष में होता, तो इन सभी मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी से मेरी रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ जाती। विपक्ष को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि आखिर प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति क्या है?

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