हिंदुओं के दो चिरंजीव : कृष्णाजी भास्कर और मिर्ज़ा राजा जय सिंह

कृष्णाजी भास्कर और मिर्ज़ा राजा जय सिंह, इन दोनों महान (!) व्यक्तियों का संबंध छत्रपति शिवाजी महाराज से है। कृष्णाजी भास्कर के बारे में कहा जाता है कि वे अफज़ल खान के वकील थे।

‘कहा जाता है’ लिखने का कारण बता रहा हूँ, पहले प्रसंग समझ लीजिये।

जब शिवाजी महाराज ने अफज़ल खान को मार गिराया तो उसकी चीखें सुनकर कृष्णाजी भास्कर जो शामियाने के बाहर खड़े थे, तलवार लेकर अंदर दौड़े और उन्होने शिवाजी महाराज पर वार किया।

शिवाजी महाराज ने खुद को पहले वार से तो बचा लिया और कृष्णाजी को चेतावनी दी कि वे उनपर वार नहीं करना चाहते, इसलिए कृष्णाजी तलवार म्यान करें। लेकिन कृष्णाजी नहीं माने तो प्रतिकार का कोई विकल्प नहीं बचा और उनपर वार करना पड़ा।

इसके बाद क्या हुआ इसपर आज काफी जातिवादी विवाद मचाया जा रहा है; यहाँ तक कि लोग कृष्णाजी भास्कर का अस्तित्व भी नकार देते हैं कि ऐसा कोई व्यक्ति था ही नहीं। इसलिए विवाद से बचकर केवल इतना कहना चाहूँगा कि उसे एक व्यक्ति तक सीमित न मानकर एक विचार माना जाये तो ठीक होगा।

मिर्ज़ा राजा जय सिंह औरंगज़ेब के क्षत्रप थे। आमेर रियासत के महाराज। बड़े ही कुशल सेनापति थे इसलिए औरंगज़ेब ने उन्हें बड़ी सेना दे कर शिवाजी महाराज को हराने भेजा।

जय सिंह वाकई श्रेष्ठ सेनापति साबित हुए और शिवाजी महाराज को प्रजा और राज्य बचाने के लिए काफी भारी शर्तों पर सुलह करनी पड़ी। इसमें एक शर्त औरंगज़ेब के अंकित बने रहने की भी थी और उसकी रस्म के लिए आगरा जाना भी जरूरी था।

गए भी, और आगे का इतिहास सब को विदित है। लेकिन भले ही पूरे सम्मान के साथ ले गए जय सिंह, वो यात्रा एक हारे हुए राजा की ही थी। हार का कलंक मिटा दिया बंदीवास से पलायन कर लौटते ही, वो इतिहास अलग है लेकिन जय सिंह के रणकौशल का महत्व कम नहीं होता।

मुझे यहाँ जो बात रखनी है वो यह है कि युद्ध के दौरान शिवाजी महाराज और मिर्ज़ा राजा जय सिंह के बीच हुआ संवाद। शिवाजी महाराज ने उन्हें मनाने की पूरी कोशिश की थी क्योंकि जय सिंह एक कर्मठ हिन्दू भी थे और उनकी धार्मिकता का अधिक्षेप करने की औरंगज़ेब की भी हिम्मत नहीं थी। लेकिन जय सिंह की मुगलों से निष्ठा अधिक जोरावर निकली और उन्होने शिवाजी महाराज का प्रस्ताव नकार दिया, जब कि वह काफी व्यवहारिक था, अगर वे हाथ मिला लेते तो भारत का चित्र दूसरा होता।

ऐसा नहीं कि औरंगज़ेब को यह ज्ञात नहीं था। लेकिन जब जय सिंह के वचनबद्ध होने के कारण दरबार में शिवाजी महाराज की हत्या न हो सकी और बाद में शिवाजी महाराज पलायन भी कर गए तो औरंगज़ेब ने इसकी सज़ा मिर्ज़ा राजा जय सिंह को दी, उनको दरबार से अपमानित कर के निकाल दिया, उनका रुतबा छीन लिया, उनकी काफी संपत्ति छीन ली और उनके बेटे राम सिंह को आसाम भेज दिया लचित बोड़फुकन से लड़ने को। उनकी मृत्यु भी संदिग्ध अवस्था में हुई जिसमें संदेह की सुई औरंगज़ेब पर है।

अब इन दो विभूतियों को मैं हिंदुओं के चिरंजीव क्यों कहता हूँ? आप को ज्ञात होगा कि कुँवर नटवर सिंह ने अपनी पुस्तक में इन्दिरा गांधी जी के बारे में इशारा सा किया है कि वे खुद को बाबर की वंशज मानती थी।

अगर मुस्लिम शासकों ने जो भी हिन्दू विरोधी कुकृत्य किए उसके बावजूद निजी स्वार्थ और लाभ के लिए कृष्णाजी भास्कर या मिर्ज़ा राजा जय सिंह उनसे वफादार रहे, तो क्या वही चिरंजीव आत्माएँ काँग्रेस पार्टी को आबाद नहीं कर रहीं? क्या ये जन्मना हिन्दू ही हिंदुओं का मज़ाक नहीं उड़ा रहे। किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं ले रहा क्योंकि फिर जातिवादी कांव कांव बहुत मचेगी इसलिए रहने देते हैं।

भवानी माता का मंदिर तोड़नेवाले अफज़ल खान से वफादार रहनेवाले कृष्णाजी भास्कर के नाम से काँग्रेस पार्टी को कृष्णाजी भास्कर पक्ष क्यों न कहा जाये? कम से कम ऐसे जन्मना हिन्दू काँग्रेसियों को तो यही दो नाम सर्वथा योग्य हैं।

इसके पहले की पोस्ट में मित्र भरत शर्मा जी की NDTV पर ‘रणनीति’ में डिबेट की वीडियो लिंक पोस्ट की थी। उनके विरोधक भी एक काँग्रेसी हिन्दू थे जो बात भटकाने का भरसक प्रयास कर रहे थे।

अन्य डिबेट्स में भी हम कई ऐसे नमूने देखते हैं जो जन्मना हिन्दू होकर भी विधर्मियों से अधिक कट्टर हिन्दू विरोध दिखाते हैं जब कि निजी ज़िंदगी में ये नास्तिक या अधर्मी नहीं होते।

दस नवम्बर 1659, शिवाजी की पहली बड़ी विजय का दिन

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