जल परिवहन तो आरंभ है उस दायित्व का, जो सदियों तक वहन करना है हमें

बचपन में सोशल साइंस की पुस्तकें तो सबने पढ़ी होंगी। उसमें से कुछ याद न रहे तो अलग बात है लेकिन स्मृति पर जोर दिया जाए तो सोशल साइंस की पुस्तक हमारे लिए विश्व का द्वार हुआ करती थीं।

हिस्ट्री, जियोग्राफी और सिविक्स हमें यह बताते थे कि मानव सभ्यता का क्रमिक विकास किस प्रकार हुआ। जियोग्राफी में हम विभिन्न देशों तथा महाद्वीपों के बारे में पढ़ते थे।

उत्तरी अमेरिका का उल्लेख आते ही यू एस ए दिमाग पर छा जाता था। यू एस ए की राजधानी, पाँच बड़ी झीलें, न्यू यॉर्क सिटी की गगनचुंबी इमारतें, येलोस्टोन पार्क, कैलिफोर्निया इत्यादि के बारे में हम अपने पड़ोस से अधिक जानकारी रखते थे। इन सबके साथ एक और चीज याद रहती थी- मिसिसिपी मिसौरी नदियों पर होता जल परिवहन।

अमेरिका की आर्थिक उन्नति को देखकर यदि किसी के मन में हलचल नहीं होती तो या तो वह चेतना शून्य व्यक्ति है या झूठ बोल रहा है। क्योंकि मुझे इस बात की टीस होती थी कि यार बगल में गंगा जी हैं लेकिन उनमें कोई परिवहन क्यों नहीं होता। गंगा जी तो छोड़िए भारत की किसी भी नदी में जल परिवहन नहीं के बराबर होता रहा है।

हम लोग केवल इतना करते रहे हैं कि मल्लाह को कुछ सौ रुपये देकर एक दो घण्टे ‘गंगा विहार’ कर के चले आते थे। अर्थात असि घाट पर बैठे और दशाश्वमेध घाट पर उतर गए। सत्तर वर्षों में हमने गंगा को इससे अधिक उपयोगी नहीं समझा। मल्लाह केवट बेचारे इस घाट से उस घाट तक नाव ले जाने को ही सार्थक आर्थिक पुण्यकर्म मानते रहे।

आज जो कन्टेनर MV Tagore माल लेकर वाराणसी पहुँचा था उसके कैप्टन साहब को देखकर मेरे मन में प्रश्न उठा कि क्या ये गंगा को उन केवटों से अधिक जानते हैं जिनकी पुश्तें घाट पर ही जन्म लेकर वहीं मर खप गयीं?

कैप्टन साहब बता रहे थे कि टैगोर बार्ज को चलने के लिए बहुत अधिक पानी नहीं चाहिए, वह वर्षपर्यंत गंगा में माल ढुलाई कर सकता है। प्रति किमी खर्च भी एक रुपये से कुछ अधिक ही है।

कल्पना कीजिए, यदि inland waterways की ठोस संकल्पना ने कई दशकों पूर्व ही मूर्त रूप लिया होता तो आज मल्लाहों की अपनी नौका परिवहन की कम्पनियाँ होतीं। उनकी सन्तानें शिप बिल्डिंग में तकनीकी रूप से दक्ष होतीं।

गंगा कितनी स्वच्छ है अथवा नहीं, इसकी जानकारी क्या केवल तटों पर रहकर गंगा की पूजा और सफाई के आंदोलनों से हो सकती है? जब तक आप गंगा के जल में कलकत्ता से बनारस की यात्रा नहीं करेंगे तब तक आप गंगा को कितना जान पाएंगे?

आधे से अधिक लोगों को तो तैरना भी नहीं आता क्योंकि वे कभी पानी में गए ही नहीं हैं। ऐसी विचित्र उदासीनता के कारण ही अमेरिका- जिसका इतिहास ढाई सौ वर्षों से अधिक नहीं है- जल परिवहन में भारत से कहीं आगे है जहाँ गंगा हजारों वर्षों से बह रही हैं। अस्तु।

बचपन में ही अमर चित्र कथा में पढ़ा था कि जब मेगस्थनीज़ पाटलिपुत्र आता है तब हाथी पर बैठकर गंगा की प्रशंसा करता है क्योंकि तब भी गंगा एक विशाल जनसमूह की जीवनदायिनी माँ थी। आज जब गंगा हमको आवागमन का मार्ग देगी तब सम्भवतः हम उसे और अधिक जान समझ पाएंगे।

जल परिवहन तो आरंभ है उस दायित्व का, जो हमें एक सभ्यता के नाते सदियों तक वहन करना है जिसमें साथ होगी तकनीक, आर्थिकी और कर्मठता का वह भाव जिससे कर्मयोगी कृष्ण ने कहा था- “स्रोतसामस्मि जाह्नवि”- मैं नदियों में गंगा हूँ।

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