आने वाली पीढियां भोगेंगी, हमें क्या?

अरब/अफगानिस्तान से ये भूखे प्यासे लोग घोड़ों पर सवार होकर हमारे देश में आये। यहाँ खूब अन्न/जल देखा और नृशंसतापूर्व हम पर हावी हो गए।

अफसोस यह रहा कि हम लोगों ने भी इनका हिंसक होकर प्रतिकार नहीं किया और अपने देश से खदेड़ा नहीं।

वेद-पुराण पाठी और धर्मपरायण/अहिंसक हमारे पूर्वज इनकी धूर्तता को समझ नहीं पाए। भारत में इस्लाम का प्रादुर्भाव इसी वजह से तो हुआ कि हम उनकी दुर्भावनाओं को समझ नहीं पाए।

आज भी समझ नहीं पा रहे। आज भी हम वोटों के चक्कर में रोहिंग्याओं को शरण देकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। जम्मू में एक इलाका ही इन से अटा पड़ा है। धीरे धीरे फैल रहे हैं ये।

हम हैं कि इनकी वकालत कर रहे हैं। ध्यान रहे इन खुराफातियों को तो उनके देश ने ही अपने यहाँ रहने नहीं दिया और मारपीटकर भगा दिया। कोई मुस्लिम देश भी इन्हें अपने यहां शरण देने को तैयार नहीं है।

धर्मार्थ, सद्भाव, दया, ममता आदि का ठेका हमारे देश ने ही लिया है। हम मृदुभाषी और ईशसेवक/अहिंसक प्राणी रहे हैं। हिंसक होते तो क्या मजाल थी कि हमारे यहां ये विधर्मी जम जाते।

सुना है नादिर शाह अपने वतन से निकल कर मारकाट करता दिल्ली तक पहुंच जाता था और माल असबाब लूटकर लौट जाता था।

हम लोग क्लीव बने रहते क्योंकि एकजुटता नहीं थी। आज भी नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि हमारी जनसंख्या घट रही है और इनकी बढ़ रही है।

इस तरफ किसी का ध्यान नहीं है। हम तो अकबर- अकबर, मूर्ति-हाथी खेल रहे हैं। “आने वाली पीढियां भोगेंगी, हमें क्या?” यही हो रहा है।

बरगद का पेड़, इस्लाम और रोहिंग्या मुसलमान

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