आखिर बिगड़ कैसे गई आम परिवारों की अर्थव्यवस्था

राजेश मांडलिक जी महाराष्ट्र के एक फर्स्ट जनरेशन उद्योगपति हैं। साधारण नौकरी से करियर की शुरुआत की, आज अच्छा खासा कारोबार है। अब अच्छे खासे की व्याख्या अपने अपने हिसाब से लीजिये।

यहाँ मैं उनके एक मराठी लेख का अनुवाद कर रहा हूँ। काफी सरल अंदाज़ में काफी गहरी बात कह जाते हैं। उम्मीद है उनकी बात के साथ न्याय कर सकूँ। सादर प्रस्तुत है।

हिसाब के लिए आसान हो इसलिए हम 1989 की मेरी सैलरी से शुरुआत करते हैं। रु. 1500 प्रति माह। आज उसी कंपनी में उसी पोज़िशन की सैलरी रु. 20,000 प्रति माह हो गयी है। याने 13 गुना अधिक पैसे मिल रहे हैं।

बाकी आप साधारणत: कोई भी आम खर्चे देखेंगे तो वे भी इसी अनुपात में बढ़े हैं। अनाज और सब्जी तरकारी में साधारण दस गुना वृद्धि हुई है, ऐसा मेरा अंदाज़ है।

अब ये बात हुई उसी पोज़िशन की याने इंजीनियर की नौकरी जॉइन करने के बाद की। जिस परिमाण में सैलरी बढ़ी है उसे देखते हुए मुझे किसी भी भाव बढ़ाने पर रोंआरोट (रोना-पीटना, हाय-तौबा) नहीं मचानी चाहिए। कम से कम अनाज, सब्जी तरकारी, दूध जैसे चीज़ों पर तो बिलकुल नहीं।

अब अगर ऐसा है तो परिवार की अर्थव्यवस्था बिगड़ने के कारण क्या हैं? सब से पहले परिवारों का विभाजन। ये हुआ एक हिस्सा।

लेकिन सब से अधिक भाव बढ़े हैं तो घरों के। देखिये, पुणे में भोसले नगर में ब्रह्मा गार्डन सोसायटी में 1989 में रु. 2,50,000 में फ्लैट मिलता था। याने मेरी तब की सैलरी के 166 गुना।

आज जो सैलरी दी जा रही है याने कि रु. 20,000; उसका 166 गुना होता होता है रु. 33,00,000. लेकिन आज वहाँ फ्लैट उतने में कहाँ मिलता है? उसकी कीमत आज कम से कम 450 गुना हो गई है। और सब से बड़ी बात यह है कि सब को नौकरी लगते ही घर लेना होता है, उसके बिना विवाह होना असंभव है।

इसलिए जो पैसे आप को कमोडिटी पर खर्च करने होते हैं वे घर के लिए गए ऋण की मार्जिन मनी या EMI में ही चले जाते हैं।

दूसरी एक बात बेहिसाब महंगी हुई है वह है शिक्षा, और उसमें भी उच्च शिक्षा। प्राइवेट संस्थानों की फीस वही गुणोत्तर में बढ़ी है, याने 12 से 13 गुना लेकिन सरकारी संस्थान जहां मिडिल और लोअर मिडिल क्लास के बच्चे सीखते हैं, उनकी फीस 200 गुना बढ़ी है।

तीसरा महत्व का मुद्दा है वे सब खर्चे जो वैश्वीकरण की देन हैं। जैसे महंगे मोबाईल, नेट, मल्टीप्लेक्स, वॉल्वो से ही यात्रा करना इत्यादि।

संक्षेप में, वैश्वीकरण के कारण अवसर पाकर जिनकी ज़िंदगी संवरी, ऐसे मेरे जैसे मिडिल क्लास आदमी को अनाज सब्जी तरकारी के भाव बढ़ाने पर चिल्लपों नहीं मचानी चाहिए।

घरों के दाम जो केवल लालच के कारण बढ़े हैं, अगर कम होंगे और अच्छी शिक्षा की कीमत हो जाये और अपनी विलासिता पर ज़रा लगाम लगाई तो किसानों को इन्फ्लेशन के कारण जो भाव बढ़ाकर देने चाहिए उन्हें देने में किसी को तकलीफ नहीं होगी, ऐसा मेरा मानना है।

और हाँ, राजनीतिक विचारधारा बाजू में रखें और निष्पक्ष सोचें तो पेट्रोल डीज़ल के भाव भी दस गुना ही बढ़े हैं।

इस ‘बनाना रिपब्लिक’ में चूसा जाता आम है मध्यम वर्ग

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