ज़हरीली शराब एक वैज्ञानिक निगाह : मीसा में फंसते-फंसते बचे इस लेख के लेखक

“ज़हरीली शराब एक वैज्ञानिक निगाह” मेरे जीवन का एक ऐतिहासिक लेख है, जो 13 अक्टूम्बर 1976 की नईदुनिया इन्दौर में प्रकाशित हुआ था।

आपातकाल के दौरान इन्दौर में एक ज़हरीली शराब काण्ड होगया था। देखते ही देखते 112 लोग छटपटाकर मर गए। चारों तरफ हड़कम्प मच गई। ज़िला प्रशासन बौखला गया। उस समय इन्दौर में कलेक्टर श्री ओपी रावत और पुलिस अधीक्षक श्री सुरजीत सिंह थे।

शराब काण्ड के कुछ दिन बाद ही शरद पूर्णिमा थी। नईदुनिया के सम्पादक श्री राजेन्द्र माथुर और हम लोग विश्व विद्यालय परिसर में मेरे निवास की खुली छत पर चन्द्रमा की अमृत किरणों से तरो ताज़ा हुए बादाम पिस्ता युक्त स्वादिष्ट दूध का स्वाद चख रहे थे।

मेरा परिवार और छोटे छोटे बच्चे आपस में अंताक्षरी खेल रहे थे। राजेन्द्र जी और मेरे मित्रगण छत के एक कोने में बैठे ज़हरीली शराब के वीभत्स नज़ारे का आँखों देखा हाल सुन रहे थे। अचानक राजेन्द्र जी ने मुझसे पूछ लिया राम भाई यह ज़हरीली शराब क्या होती है।

उन दिनों मैं अपने होलकर कालेज में फ़ार्मेसी विषय की भी कक्षाएँ ले रहा था। औषध रसायन की विस्तृत जानकारी मुझे भलीभाँति ज्ञात थी। मेरी पूरी बात सुनकर राजेन्द्र जी ने कहा ‘आप जल्दी से जल्दी यह सब जानकारी एक लेख के रूप में लिख दो “। मैंने लेख लिख दिया। दूसरे ही दिन अख़बार में छप गया।

..अख़बार में छपते ही मानो क़यामत का जैसे पहाड़ टूट गया। राजेन्द्र जी भागे भागे मेरे घर आए। मैं बच्चों को स्कूल छोड़ने गया था। पत्नी बाहर खड़े ठेले वाले से सब्ज़ी ख़रीद रहीं थी। सदा गंभीर और प्रसन्नमुद्रा में रहने वाले राजेन्द्र जी परेशान नज़र आ रहे थे। पत्नी ने उनकी खैरियत का पूछा और उन्होंने हड़बड़ाते हुए मेरे बारे में पूछा श्रीवास्तव जी कहाँ हैं? बहुत ज़रूरी काम है। फिर बोले जैसे ही मैं आऊँ सब काम छोड़कर एकदम नईदुनिया कार्यालय भेज देना।

बच्चों को स्कूल छोड़कर घर आते ही मुझे राजेन्द्र जी का संदेश मिला। मेंने लेख से संदर्भित पुस्तकों को थैली में भर कर सीधा नईदुनिया कार्यालय की ओर प्रस्थान किया। नईदुनिया पहुँचा ही था मुझे बाहर ही जोशी जी मिले कहा जल्दी से लाइब्रेरी पहुँचिये सब मेरा इन्तजार कर रहे है।

ऊपर जाकर मैंने पाया सब एकदम गमगीन माहौल में बैठे हैं। नईदुनिया की आपातकालीन बैठक चल रही थी। सभी वरिष्ठजन मौजूद थे, बड़े तिवारी जी, लाभचन्द जी, सेठिया जी, अभय जी, राहुल (बाबा) बारपुते जी और राजेन्द्र जी। बाबा ने मेरे हाथ में भारी भरकम थैला देखकर पूछा। इसमें क्या है? मैंने जब सन्दर्भ पुस्तकों का ज़िक्र किया तो बाबा ने एक ही साँस में जल्दी से बोला’ ‘अरे भाई इन सबको छोड़ो, इनकी कोई ज़रूरत नहीं है। आप तो सीधे घर जाइये और आपने जो लेख लिखा है उसकी पाण्डुलिपि या अन्य कोई भी सन्दर्भित प्रमाण हों तो उनको तुरन्त जाकर नष्ट कर दो या जला दो। कुछ भी लेख से संबंधित प्रमाण नहीं रहना चाहिए। पुलिस आपके घर छापा मारने ज़ा रही है।’

यह सब सुनकर मैं भी सन्नाटे में आ गया। चौंकते हुए मैंने पूछा – ऐसा क्या हो गया? मैंने ऐसा तो लेख में कुछ भी नहीं लिखा है। जो भी लिखा है उसका हर एक वाक्य का लिखित प्रमाण मौजूद है। यह लेख तो पूरा वैज्ञानिक आधार पर लिखा है। इसमें मेरा क्या क़सूर है जो पुलिस छापा मारेगी।

अभय जी ने कहा भाई आपातकाल है किसी को कुछ पता नहीं होता उसका क्या क़सूर है? मैं अच्चम्भे से सबका चेहरा बारी बारी से देखरहा था। और सब लोग मुझे ऐसे घूर रहे थे मानो जैसे कोई निर्दोष को फाँसी पर चढ़ाया जा रहा हो और सब लोग बेबस होकर बलि के बकरे को निहार रहे हों।

मुझे बताया गया सुबह से कई बार एस पी का फोन आ चुका है। वे उस लेखक का नाम और पता पूछ रहे हैं जिसने ज़हरीली शराब पर लेख लिखा है। उन्हें उस लेखक को गिरफ़्तार करके “मीसा” का केस बनाना है। मीसा का नाम सुनते ही मुझे लगा मेरे नीचे से मानो ज़मीन ही खिसक गई हो।

मुझे परेशान देखकर लाभचन्द जी ने मेरी पीठ पर अपना हाथ रख कर बोला, ‘घबराओ नहीं हमने तुम्हारी स्क्रिप्ट की टाइप करा ली है। अब हमसे कोई तुम्हारा नाम पता पूछेगा तो हम कह देंगे हमें तो यह लेख डाक से मिला है। रायपुर से किसी ने भेजा है हम नहीं जानते यह किसने भेजा है?’

थोड़ी देर चिन्ता में सोचते सोचते। मैंने कहा “देखिये जहाँ तक मुँह ज़ुबानी बोलने का प्रश्न है, मैं कह दूँगा लेख मैंने नहीं लिखा, पर अगर किसी ने लिखित में मुझसे पूछा तो बड़ा मुश्किल है।
झूठा लिखकर कैसे दिया जा सकता है।”

एक लम्बी गहरी साँस भरकर मैंने कहा – देखिये बचपन से ही मेरा उसूल है GOD DOES EVERYTHING FOR OUR GOOD. अब जो होगा सो देखा जाएगा। आप तो मुझ पर इतना एहसान ज़रूर कीजिए “डूबते को तिनके के सहारे की तरह नईदुनिया का आशीर्वाद मुझपर बनाए रखिए”। मेरा वाक्य पूरा होते ही पास बैठे बाबा राहुल जी ने उठकर मुझे अपने गले से लगा लिया। और बहुत देर तक पीठ थपथपाते रहे। मुझे आज भी ऐसा लगता है कि बाबा का हाथ अभी भी मेरी पीठ थपथपा रहा हो।

नईदुनिया कार्यालय से निकल कर मैं सीधा जस्टिस गोवर्धन लाल जी ओझा के पास गया। उन्होंने मुझे ढाढस बँधाकर घर रवाना कर दिया। उस रात पहली बार रात भर नींद नहीं आई। बाहर से आने वाली हर आवाज़ के साथ मैं चौंक पड़ता था, और महसूस करता था पुलिस अब आई …अब आई।

दूसरे दिन पता लगा कि ओझाजी ने कलेक्टर और एस पी को समझाया। और मैं “मीसा-बन्दी” होने से बच गया। आज मैं सोचता हूँ तो सिहर जाता हूँ अगर मैं सच में मीसा में बन्द हो जाता तो मेरे छोटे छोटे बच्चों की कितनी बुरी हालत हो जाती। 24 महीने भीतर बन्द रहने पर मेरी नौकरी चली जाती, बच्चों की पढ़ाई चौपट होजाती और पत्नी को बच्चों का पेट भरने के लिए न जाने कहां पर नौकरी करना पड़ती।

इरफ़ान हबीब, आप इतिहासकार हैं या मुसलमान!

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