महाप्रश्न का उत्तर हैं श्रीकृष्ण के कर्म और श्रीराम के आदर्श

मैं स्वयं को अल्पज्ञानी मानता हूँ। यूं तो पढ़ता बहुत हूँ मगर लगता है कि मेरी जानकारी अभी भी सीमित ही है। एक सवाल मन में बार बार उठता है, क्या आप में से कोई इस पर मेरा ज्ञानवर्धन करेंगे।

सवाल सीधा और सरल है, दुनिया के किसी भी भूखंड के किसी भी काल में किसी भी सभ्यता-संस्कृति में, क्या श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे कोई अवतारी पुरुष हुए हैं?

रुकिए! ठहरिये!! उत्तर देने से पूर्व यह तो जान लीजिये कि श्रीराम और श्रीकृष्ण, दोनों ने मानव की तरह जीवन जिया था। ये दोनों पलायनवादी नहीं थे। इन्होंने परिवार और समाज में रहते हुए, दुखों को भोगते हुए, कष्टों को सहते हुए विपत्तियों का सामना करते हुए मानवीय जीवन के साथ साथ सामाजिक जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया।

इन्होंने ज्ञान प्राप्ति के नाम पर कभी कुछ त्यागा नहीं था, ना ही सन्देश के नाम पर कभी किसी को संन्यासी बनने के लिए प्रेरित किया। ये दोनों अपने अपने युग के जननायक रहे।

नायक वही कहलाता है जो खलनायक का वध करता है। और हाँ, नायक कभी चमत्कार नहीं करते, कर्म करते हैं, संघर्ष करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण है कि स्वयं धर्म का पालन करते हैं।

इन दोनों के लिए लिखे गए काव्यात्मक वर्णन पर ना जाएँ, फिर देखें इन दोनों का जीवन पथ कितने काँटों से घिरा-भरा था। दोनों का अंत भी मानव की तरह ही हुआ। इस दोनों के जीवन में कुछ भी हवा-हवाई नहीं। सब कुछ इतिहास में अंकित, जो फिर प्रत्यक्ष भी है और प्रमाणित भी।

और तो और, इनके बाद इनके नाम के पंथ, सम्प्रदाय, मज़हब नहीं बने, बल्कि इनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श बन गया जो फिर मानव को मानव बनाये रखने के लिए प्रेरित करता है। ये दोनों, युगों युगों से, अपनी अपनी जीवनकथा से, सभ्यता संस्कृति और विश्वसमाज को समृद्ध करते आये हैं।

मेरे दृष्टि में तो कोई ऐतिहासिक पुरुष नहीं, जिनकी तुलना इन दोनों महामानव से की जा सके। इन दोनों ऐतिहासिक-मानव की आपस में तुलना भी निरर्थक ही होगी। क्योंकि दोनों का कालखंड ही नहीं, युग भी भिन्न हैं। दोनों अपने अपने युग के प्रतीकपुरुष हैं।

हाँ, दोनों ही इस देवभूमि के पुत्र हैं। एक मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो दूसरे योगेश्वर कहलाते हैं। श्रीकृष्ण के नाम अनेक हैं तो श्रीराम के रूप अनेक हैं। माता-सीता, भाई-लक्ष्मण और वीर-हनुमान के राम की बात ना भी करूं तो तुलसी के राम उपास्य हैं तो प्रणम्य भी, जबकि वाल्मीकि के राम अनुकरणीय के साथ साथ आलोच्य भी हैं। श्रीकृष्ण तो राधा-मीरा से लेकर सूरदास के आराध्य हैं तो वीर योद्धा अर्जुन के प्रेरणास्रोत भी।

त्रेता और द्वापर की आवश्यकताएं और परिस्थितियां, दोनों ही भिन्न भिन्न थीं। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व जहां हँसता-हंसाता खिलता-खिलाता है, वहीं राम धीर भी हैं और गंभीर भी। धैर्य तो दोनों महाबलियों का आभूषण था। दोनों का जीवनसंघर्ष ही जीवनलीला है।

श्रीकृष्ण कभी किसी नियम से नहीं बंधते तो श्रीराम कभी नियम तोड़ते नज़र नहीं आते। इसका मतलब यह भी नहीं कि श्रीकृष्ण उच्छृंखल हैं, ना ही श्रीराम मर्यादा के नाम पर कभी पौरुषत्व से पीछे हटे। दोनों ने युद्ध किया, धर्म की स्थापना के लिए। दोनों सत्ता के केंद्र में रहे, मगर दोनों ही सत्ता के मोह में कभी नहीं बंधे। दोनों का जीवन कर्म-प्रधान रहा।

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व आकाश की तरह असीम है तो श्रीराम का व्यक्तित्व समुद्र के समान गहरा। दोनों की सीमाओं को नाप पाना कठिन है। दोनों की सम्पूर्ण व्याख्या सम्भव ही नहीं। यूं ही नहीं, दोनों की अनंत कथा अनंत काल से आज तक जीवंत हैं।

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श्रीराम और श्रीकृष्ण, दोनों नाम के शब्दार्थ को व्यक्त करना जितना कठिन है उनके भावार्थ को आत्मसात करना उतना ही सरल। ये दोनों मस्तिष्क से अधिक मन में उतरते हैं। दोनों महादेव के उपासक हैं। लेकिन इन दोनों के उपासक किसी चमत्कार की कल्पना नहीं करते, ना ही इनके भक्त इनसे किसी वरदान की चाहत रखते हैं। इनको भजने वाले इनके जीवन से प्रेरित हो कर कर्मशील बनते हुए आदर्श मानव बनने का प्रयास करते हैं।

यही कारण है जो मैंने अपनी पुस्तक ‘अगली सदी का एकमात्र प्रवेशमार्ग – वैदिक सनातन हिंदुत्व‘ की अंतिम पंक्तियां इन दोनों महामानव के नाम समर्पित की हैं। आप को मेरे द्वारा ऊपर पूछे गए प्रश्न का उत्तर शायद नहीं मिला होगा, मगर मुझे अपनी पुस्तक के मूल प्रश्न का सार्थक समाधान मिल गया था।

सवाल है – हमें कौन बचाएगा, कौन निकालेगा इस महाविनाश (कलयुग) से?

दो शब्दों में उत्तर है – श्रीकृष्ण के कर्म और श्रीराम के आदर्श।

जय श्रीकृष्ण
जय श्रीराम

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