जूही चावला जन्मोत्सव : टेढ़ी है पर मेरी है

‘क़यामत से क़यामत’ तक फिल्म आई थी तब मेरे घरवालों के हिसाब से मैं इतनी छोटी थी कि उन्होंने मुझे यह फिल्म देखने नहीं दी थी. स्कूल में मेरी सारी सखियों ने यह फिल्म देख डाली थी क्योंकि उनके अभिभावकों की नज़र में वे बड़ी हो चुकी थीं.

जब मैंने उन्हें बताया मम्मी ने मना कर दिया ऐसी फिल्म दिखाने से तो सारी सहेलियों ने मेरा खूब मज़ाक उड़ाया था… लेकिन मैं जब भी जूही को देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है माँ मेरी ने ठीक ही किया था जो मुझे यह फिल्म नहीं देखने दी थी… उनकी नज़र में मैं उम्र में चाहे कितनी भी बड़ी हो गयी होऊँ लेकिन परिपक्वता के आधार पर मेरा मन सच में उस कच्ची मिट्टी का था जिस पर घर से भागी हुई लड़की की प्रेम कहानी और प्रेम में जान दे देनेवाली मासूम लड़की की कहानी सच में बहुत गहरा असर डालती…

लेकिन माँ मेरी यह नहीं जान पाई कि उम्र के बहुत लम्बे सालों तक मेरा मन उतना ही कोमल रहा जैसी जूही की सूरत… मासूम और कोमल, घुँघरू खनकती सी हंसी… चेहरे पर बच्चों से हावभाव…

तो मुझे “सिद्धार्थ” की तरह ऐसी बहुत सी घटनाओं और ऐसी फिल्मों को देखने से रोका गया जो मेरे मन में कोई गहरा प्रभाव छोड़ जाए. लेकिन फिर भी मेरा भाग्य बदलने में उनके ये प्रयास काम न आए… और अपना राज पाट छोड़कर जीवन के जंगल की ओर जाने से रोक न सके…

खैर मैं सिद्धार्थ से बुद्ध बन सकी या नहीं यह एक अलग मुद्दा है उसके लिए बुद्धत्व की परिभाषा तक जाना होगा… जैसे मेरे लिए जूही हमेशा एक मासूम सी किशोरी है, उम्र के किसी भी पड़ाव पर मैंने उसे एक परिपक्व औरत या तारिका के रूप में नहीं देखा… आपके लिए एक किशोरी की परिभाषा आज के समय के अनुसार अवश्य बदल चुकी होगी इसलिए आप उस तरह की कल्पना नहीं कर सकेंगे जैसी मैं अपनी किशोर उम्र और समय में थी.

तो जूही मुझे इसलिए भी पसंद है क्योंकि उसने ताउम्र उस मासूमियत को अपने अंदर ज़िन्दा रखा जिसे मैंने ‘क़यामत से क़यामत तक’ के रिलीज़ के दो साल बाद उस फिल्म में उसे देखा था…

शायद उसकी यह मासूमियत ही कारण रहा होगा कि रोमांटिक फिल्मों में जब तारिका का अंग प्रदर्शन फिल्म मिलने का पैमाना नहीं हुआ करता था तब सबसे रोमांटिक कहे जाने वाले ऋषि कपूर और शाहरुख़ जैसे कलाकारों के साथ उन्हें बहुत सारी फ़िल्में करने को मिली…

हालांकि अपनी बढ़ती उम्र के पड़ाव पर जूही ने I Am, गुलाब गैंग, स्वामी जैसी फ़िल्में भी की, लेकिन आज भी जब वह किसी विज्ञापन में आती है तो किसी भी विज्ञापन में आप उसे अन्य तारिकाओं की तरह देह की नुमाइश के कारण नहीं देखेंगे, उसका व्यक्तित्व, उसका किशोर उम्र का चुलबुलापन जो उसने ताउम्र सहेज कर रखा ऐसे ही विज्ञापन में “टेढ़ा है पर मेरा है” कहते हुए ही पाएंगे…

आपने ऐसे कई विज्ञापन देखे होंगे जिसमें बदलते समय के साथ पञ्च लाइन वही रही, लेकिन तारिकाएँ बदलती रही जैसे लक्स साबुन का विज्ञापन… हद तो तब हो गयी जब तारिकाओं का स्थान शाहरुख़ ने ले लिया… लेकिन मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कुरकुरे के विज्ञापन में “टेढ़ा है पर मेरा है” पंचलाइन को आप किसी और तारिका पर स्वीकार नहीं कर सकते.. क्योंकि उस विज्ञापन की जान सिर्फ वह पञ्चलाइन नहीं जूही की नजाकत भरी अटखेलियाँ और मासूमियत है…

तो मेरे लिए बस बुद्धत्व का यही अर्थ है कि आप उम्र के हर पड़ाव पर अपनी सरलता और सहजता बनाए रखते हुए आगे बढ़ते रहे, ज्ञानियों ने स्थितप्रज्ञ होना भी तो इसे ही कहा है…

शायद इतनी बड़ी तुलना एक सीधी सादी तारिका के लिए आप पचा नहीं पाएंगे इसलिए मैं जूही के लिए उसके जन्मदिन पर अपनी तरफ से इतना ही कहूंगी.. “टेढ़ी है पर मेरी है”…

इस उम्मीद के साथ कि कोई मेरे लिए भी यह कहे… “टेढ़ी है पर मेरी है”…

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