छठ महापर्व : सूर्य को अर्घ्य और प्रसाद

आस्था के महापर्व छठ पूजा में स्वच्छता का विशेष महत्व दिया जाता है । चार दिनों तक चलने वाले पर्व के दौरान भगवान के भोग के साथ-साथ व्रती के खान-पान के भी अपने नियम होते हैं। नहाय-खाय, खरना और संध्या अर्ध्य के पकवान इस प्रकार है।

नहाय खाय के दिन का खाना

‌‌अरवा चावल का भात, फ्राई चना‌ दाल, लौकी की सब्ज़ी, आलू फुलगोभी की सब्ज़ी, करेले की भाजी, कद्दू – आलू का चक्का, पापड़, सलाद इत्यादि।

छठ महापर्व : नहाय खाय के दिन का खाना

खरना

नहा – खा के दूसरे दिन खरना होता है। इस दिन पर्व करने वाली महिलाएं सारा दिन उपवास ) में रहते हुए शुद्ध चूल्हा व आम के लकड़ी के जलावन पर शाम को खीर तथा रोटी बना कर, रोटी में घी लगाकर भगवान को चढ़ाते हुए पूजा करती हैं तथा पूजा के बाद पीतल की थाली में स्वयं भोग लगाती हैं।

ये भोग (भोजन) तथा पानी उस पर्व करने वाली महिलाओं के लिए अन्तिम होता है क्योंकि उस समय के बाद लगातार परणा दिन तक खाने की बात तो दूर जल भी ग्रहण नहीं करती है। प्रत्येक पर्व करने वाली महिलाएं जितना अर्क का पूजा करती है उतना रोटी तथा खीर का पूजा करती है। पूजा के बाद उस प्रसाद को घर के पुरुष भोग में खाते हैं। प्रसाद आसपास के लोगों को बुलाकर या उनके यहाँ भेज कर खिलाते हैं।

भोर से पर्व करने वाली महिलाएं तथा घर के कुछ और लोग स्नान वगैरह करके प्रसाद चढ़ाने खजूरी (ठेकुआ) बनाने में लग जाते हैं। ईख, मूली, आदि – हर्दी, नारियल, केला, सेब, संतरा, अनार, अलुआ – सुथनी, पानीफल, इत्यादि फल वगैरह बाजार से खरीद कर चढ़ाते हैं।

संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन सूर्यास्त होने से पहले अपने नजदीकी नदी या अपने सुविधा अनुसार बनाये घाट पर जाकर प्रसाद को सूर्य भगवान की ओर सारा प्रसाद सूप में सजाकर रखते हैं जैसे ही सूर्यास्त होने को होता है सभी पर्व करने वाली महिलाएं अर्घ्य देना प्रारम्भ कर देते हैं। इसे संध्या अर्घ्य कहते हैं।

सुबह का अर्घ्य

चौथे दिन सुबह सूर्य उगने से पहले सभी पर्व करने वाली महिलाएं फिर उसी घाट पर जाकर पूर्व की ओर फिर सूप में प्रसाद रख कर, दीप – अगरबत्ती जलाकर सूरज भगवान के ऊगने का इंतज़ार करती है जैसे ही सूरज भगवान के उगने पर लाली आकाश में दिखाई पड़ती है वैसे ही पूजा अर्चना करना प्रारम्भ कर देती है तथा सुबह के अर्घ्य के साथ ही पूजा समाप्ति हो जाती है। जिसे साधारणतः परणा कहते हैं।

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