IFFI में पहली बार इज़रायल होगा ‘कंट्री ऑफ़ फोकस’

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‘आईएफएफआई’ यानी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया शीघ्र आयोजित होने जा रहा है और उसके प्रांगण से एक ख़ुशख़बर है।

देश की आज़ादी के बाद के तमाम वोट बैंकीय इतिहास को धता बताते हुए पहली बार इस फेस्ट में इज़रायल ‘कंट्री ऑफ़ फोकस’ होगा और उसी के मास्टर फिल्मकार डान वॉल्मन (Dan Wolman) को ‘लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से नवाज़ा जाएगा।

कहने की आवश्यकता नहीं कि यहूदी भारत के सनातन की तरह एक प्राचीन धर्म, सभ्यता और संस्कृति है। जिस तरह हिन्दुओं को विगत में प्रताड़ित किया गया है, ठीक उसी तरह यहूदियों को तमाम अकल्पनीय अत्याचार और नरसंहार सहन करने पड़े हैं।

कोई कारण नहीं था कि उसे भारत के राजनीतिक संपर्कों से इस कदर अछूत समझा जाए, लेकिन यह अनाचार भारत के वोट बैंक आधारित राजनय ने लगातार सत्तर साल तक किया।

ग़ज़ब की बात यह है कि भारत की सत्ता हमेशा फ़लस्तीन समर्थक रही और बहुसंख्य जनता इज़रायल समर्थक। यह दरअसल क्रिया की प्रतिक्रिया थी।

भारतीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री फलस्तीन जाते रहे, लेकिन इजरायल नहीं गए। कोई राष्ट्रपति इज़रायल गया, तो उसका उसके बाद फलस्तीन जाना अवश्यम्भावी रहा। परम सेक्यूलर नेता प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने अपनी इज़रायल यात्रा इसलिए रद्द कर दी थी कि उन्हें फलस्तीन जाने को नहीं मिल रहा था।

भारत को वर्तमान पीएम मोदी को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने वोट बैंक की राजनीति को एक तरफ पटका और अपने सबसे पुराने मित्र के कंधे थपथपाने वहां जा पहुंचे। ताज़्ज़ुब होता है कि ऐसा करने वाले वे पहले पीएम हैं।

महमूद दरवेश निस्संदेह फ़लस्तीन के श्रेष्ठ कवि हैं, लेकिन उनका अवदान तब निरर्थक सिद्ध हो जाता है, जब फ़लस्तीन पर आतंकवादी संगठन ‘हमास’ का कब्ज़ा हो जाता है और वह यासेर अराफ़ात के संघर्षों तथा सिद्धांतों से विमुख होते हुए आतंकी गतिविधियां शुरू कर देता है।

‘सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है’, जो यह सिद्धांत मानते हैं, उनके लिए यह सही है, लेकिन उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि फिर सत्ता बन्दूक की नली से ही सुरक्षित रहती है। इज़रायल ने यह भली-भांति समझा भी दिया है।

यह एक विस्तृत सब्जेक्ट है। इस पर मैं बहुत कुछ लिखना चाहता हूं, लेकिन अभी बस, इतना कि इस घटनाक्रम ने मुझमें असीम ऊर्जा भरी है। मैं हिब्रू नहीं जानता। मैं शिद्दत से चाहता आया हूं कि इज़रायल का साहित्य मुझे पढ़ने को मिले, लेकिन यह कभी संभव नहीं हुआ। नेट पर कई पेज मौजूद हैं, जो इज़रायल से सम्बद्ध हैं।

मैंने कई बार उनसे संपर्क साधा और पूछा – ‘क्या आप हिंदी अथवा अंग्रेज़ी में प्रकाशित इज़रायली साहित्य के बारे में कुछ जानकारी दे सकते हैं?’ लेकिन कहीं से कभी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।

अब यह राह खुली है, तो मुझे उम्मीद है कि कई और नए पथ शीघ्र खुलने वाले हैं। तथास्तु।

आज इसलिए ज़िंदा है इज़रायल और उसका यहूदी

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