हर सरकारी नीति किसी को फायदा पहुंचाती है, किसी को नुकसान

रघुराम राजन ने सही कहा है, विमुद्रीकरण और GST दोनों ऐसे कदम थे जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ी चोट पहुंचाई। विशेष रूप से लघु और सूक्ष्म उद्योगों को।

मूल रूप में ये दोनों फैसले विमुद्रीकरण और GST, डिसरप्टिव कदम थे। यानी ऐसे फैसले जो चली आ रही व्यवस्था को तहस नहस कर दें। जैसे ईमेल आया तो पोस्टकार्डो का हुआ।

और जो व्यवस्था थी वो क्या थी?

किस सिस्टम को इन दो फैसलों से टारगेट किया गया। उनमें खामियां क्या थीं?

चले आ रहे सिस्टम में दो खामियां थीं।

एक टैक्स बेस आनुपातिक रूप में बेहद कम था। चाहे इनकम टैक्स यानी डायरेक्ट टैक्स हो या सेल्स टैक्स इनडायरेक्ट टैक्स। आज इन दोनों कदमों से विमुद्रीकरण और GST से इनकम टैक्स और GST टैक्स कलेक्शन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

और आसार हैं कि आने वाले वक्त में इनकम टैक्स और GST दोनों दरें कम होंगी।

अब ये खामी ही क्यों थी? टैक्स बेस कम क्यों था?

इसका कारण एक दूसरी और शायद आज़ाद भारत की सबसे बड़ी कमज़ोरी जिसने देश की प्रगति को अवरूद्ध कर रखा था वो थी इनफॉर्मल इकॉनमी या इनफॉर्मल सेक्टर।

हमारे देश में 2016 तक 92% रोजगार इनफॉर्मल सेक्टर में था। 8% मज़दूर जो गिने हुए 50 तरह के उद्योगों की लिस्ट में थे वो फॉर्मल सेक्टर में गिने जाते थे।

फॉर्मल या इनफॉर्मल, दोनों में अंतर क्या है?

इनफॉर्मल सेक्टर का अर्थ है जहाँ मज़दूरों को सोशल सिक्योरिटी बेनिफिट नहीं मिलते, मिनिमम वेजेस यानी न्यूनतम घोषित मज़दूरी से कम तनख्वाह मिलती है, PF पेंशन योजना जिनके लिए केवल ख्वाब है।

इनफॉर्मल सेक्टर जो सरकार के पास रजिस्टर्ड नहीं हैं। जिन्हें सरकार टैक्स पर्पज़ से मॉनिटर नहीं कर रही।

और ऐसा संभव इसलिए होता है क्योंकि तनख्वाह कैश में है। चेक से नहीं है। लघु और सूक्ष्म उद्योगों का बहुतेरा काम कैश में था। व्यापारिक लेनदेन, तनख्वाहें सभी कैश में।

छोटे और लघु उद्योग बड़े उद्योगों से मुकाबला करने के लिए एक सबसे आसान रास्ता अपनाते हैं। उनका प्रॉफिट मज़दूरों को कम मज़दूरी, सरकार को कम टैक्स देने से आता है।

अगर अपने मज़दूरों को तय न्यूनतम मज़दूरी, सरकार को उचित टैक्स देना हो, वर्कर्स को सोशल बेनिफिट्स देने हों, तो कितनी कम्पनियां सर्वाइव कर पाएंगी।

इसीलिए विमुद्रीकरण से ऐसी तमाम कम्पनियाँ बंद हो गयी जो पूर्णतः कैश पर निर्भर थीं।

GST का सिस्टम भी इतना कॉम्प्लिकेटेड इसीलिए बनाया गया ताकि ट्रांज़ेक्शन्स और इन्वॉइसेस के मिलान से टैक्स चोरी पकड़ी जाये। आज GST के रिटर्न भरना इसीलिए टेढ़े काम हैं क्योंकि हर इनवॉइस डिटेल देनी है और वो सप्लाई की पूरी चेन में मैच की जाती है तब GST का इनपुट मिलता है।

तय था कि विमुद्रीकरण और GST के बाद ऐसी कम्पनियाँ नहीं बचेंगी जो वर्कर्स की कम मज़दूरी और सरकारी टैक्स चोरी पर आश्रित थीं।

और अभी सरकार का तीसरा बोल्ड स्टेप बचा है जो साल भर से पेंडिंग है। सोशल सिक्योरिटी बिल। वो जब आएगा तो और बड़ा नुकसान करेगा।

तमाम कम्पनियाँ डूबेंगी लेकिन बहुत से मज़दूरों, वर्कर्स, शिक्षकों को फायदा भी होगा।

हर सरकारी नीति किसी को फायदा पहुंचाती है किसी को नुकसान। इसीलिए लोग अपने अपने पक्षों के अनुसार इन नीतियों की आलोचना करते हैं। देश हित किसमें है ये देखना हमेशा मुश्किल रहा है।

जिन्हें ये सब कोरी कल्पना लगे, वो राहुल गांधी को लाकर देश बचा लें

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