सनातन धर्म और सहिष्णुता

श्री चैतन्य महाप्रभु ने लिखा है –

तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः।।

इसका पद्यानुवाद खाकसार ने कुछ यूँ किया था कि

खुद को तिनके से भी तुच्छ मानता जो नर
रहता है तरु सा सहिष्णु संयमी धरा पर।
मानरहित हो जो देता सम्मान किसी को
हरि कीर्तन का है केवल अधिकार उसी को।।

ये पंक्तियां इतना बताने के लिए काफी है कि सहिष्णुता सनातन धर्म का अस्थिविन्यास है, जो अन्य मतों यथा इस्लाम, इसाईयत, यहूदी, पारसी, जैन, बौद्ध, सिख, आर्य समाज, ब्रह्म समाज आदि में कदापि उपलब्ध नहीं है।

कारण ये सारे संप्रदाय किसी अन्य के प्रति अवमानना, द्वेष, हीनता, स्वयं के प्रति गर्व की पैदाइश हैं जबकि सनातन धर्म ही नहीं बल्कि जीवनशैली है। आपका हर विचार सनातन धर्म की सीमारेखा के अंदर ही आएगा। हमारी परंपरा में व्रत करना भी यम नियम का हिस्सा है और भोजन करना भी।

विचारों का वैविध्यपूर्ण संघर्ष सनातन धर्म में एक नये दर्शन को जन्म देता है, जबकि अन्य संप्रदायों में ईशनिंदा कानून का। ईसा का करुणा सिद्धांत यहूदी और मुसलमानों के मामले में फुस्स हो जाता है तो यहूदी का सिर्फ सनातन से ही छत्तीस का आँकड़ा नहीं है।

सनातन का अहिंसक और अव्युत्क्रमणीय चरित्र ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, जैन, आर्य समाज, सनातन धर्म का ईसाई संस्करण ब्रह्म समाज आदि के लिए बेहतरीन पौधशाला बन गया। सनातन धर्म के गोदाम से इन खुदरा विक्रेता सरीखे मतों या संप्रदायों की दूकानें भरी जाने लगी पर मतावलंबियों के रिवर्स ऑस्मोसिस को रोकने के लिए ईशनिंदा, कुफ्र, खुले आचार विचार, हिंदू समाज की परंपराओं पर दकियानूसी होने का आरोप/ प्रलोभन देकर नव दीक्षितों का व्युत्क्रम प्रवाह रोका गया।

मेरे सारे शब्द विन्यास का तात्पर्य बस इतना है कि सनातनेतर संप्रदायों की उत्पत्ति ही निजी महत्वाकांक्षापूर्ति, द्वेष, घृणा, प्रलोभन, भय और सनातनियों के अज्ञानता सह दरिद्रता आदि के शोषण व दोहन का परिणाम है।

स्वतंत्रता के खुले वैचारिक दौर में भारतीय परिदृश्य में आयातित साम्यवाद ने भी सनातन की परंपराओं को कुरीति का नाम देकर अधिकांश शिक्षित युवाओं में बुद्धिजीवी बनने का वायरस डाला और एक बेहद जुझारू क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के हाथों में मार्क्स, लेनिन, माओ आदि की रचनाएँ थमाकर (और गुरुग्रन्थ साहिब हटाकर) साम्यवाद का नया शुभंकर जैसा एक अपना अलहदा चे ग्वेरा बना लिया। पता नहीं सुखदेव और राजगुरु के फांसी के फंदों में क्या कमी रह गई कि उनमें फ्रेडरिक एंजेल्स, स्टालिन या कास्त्रो की छवि भारतीय कम्युनिस्टों को नहीं दिखी।

भगतसिंह की छवि का भी दोहन सदियों तक चलता रहेगा, कारण उनका ‘आतंकवादी’ होना वाम विचारक इतिहासकारों की कलम ने ही लिखा है और उन्हें इस आरोप से मुक्त कराने की कोशिश भी पाकिस्तान के कोर्ट में ही हो रही है, भारतीय कम्युनिस्ट तो कसाब और अफज़ल की सज़ा माफ कराने का अरण्यरोदन करने में व्यस्त हैं। भगतसिंह का चेहरा तो बस टी शर्ट के हैश टैग के लिए चाहिए।

तो आ जाइए फिर सहिष्णुता के ट्रैक पर।

सनातन धर्म में वैचारिक भिन्नता या ईश चरित्रों की निंदा तर्क पोषित होने पर सर्वदा नए दर्शन की जन्मदात्री रही है। दैहिक अंतरंगता की मुक्त चर्चा को असामाजिक और दंडनीय या तिरस्करणीय मानने वाला हमारा पूर्ण धार्मिक समाज वात्स्यायन और चार्वाक को ऋषि तुल्य ही स्वीकार कर उन्हें एक नये जीवन दर्शन का पुरोधा मानने में देर नहीं करता है।

एक ओर जहाँ तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की उपस्थिति हमें श्रद्धा पोर्टेबिलिटी का आध्यात्मिक विकल्प देने को आतुर है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न ऋषियों के दर्शन हमें आध्यात्मिक आलोचना के परास में परब्रह्म को भी लाने का हक देता है।

एडम ईव से अब्राहम, मूसा, ईसा और हजरत मुहम्मद तक को दिव्य अवतार मानने वाले सारे सनातनेतर ज्ञानी लोग ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट से तथा कुरान के परे झाँकने की जुर्रत भी नहीं कर सकते। अगर सपने में भी किया तो यहोवा, गॉड और अल्लाह के सहिष्णु बंदे ईशनिंदा कानून की ओट से कब धर्मयुद्ध या क्रूसेड छेड़ दें और फिर उस ज्ञानी को न कनफेशन बचा पाएगा, न तौबा।

पर सनातन धर्म का हर केन्द्रीय पात्र अपने पूर्ववर्ती की ऐसी तैसी कर देता है और महान ही रहता है और जनाब ये है सहिष्णुता वरना इस्लाम यजीद को, यहूदी ईसा को और ईसाई ईसा के तेरहवें शिष्य को उसी शिद्दत से ढूंढ रहा है जैसे शिवानी की कहानी ‘सती’ में मदालसा सिंघाड़िया को तीनों सहयात्री ढूँढते रह जाते हैं।

भगवान शिव के आलोचक उनके ससुर दक्ष प्रजापति हैं तो कृष्ण का शिशुपाल और गांधारी। राम की आलोचना पहले रावण और फिर धोबी कर रहा है, तो कभी बर्बरीक के आगे हमारा सदेह परब्रह्म विवश दीखता है।

रावण को सीता हरण का दोषी मानकर भी शिव ताण्डव स्तोत्र का महत्व कभी कम नहीं किया गया। बराबरी का योद्धा होने पर भी राम रावण वध के कारण ब्रह्म हत्या के दोषी रहे। एक पत्नीव्रत को ध्येय और अनुकरणीय मानकर भी सनातन धर्म में बहुपति और बहुपत्नी प्रथा का उल्लेखनीय उदाहरण मिलता ही रहा है।

जरासंध के डर से भागने वाले को सनातन धर्म में ईश्वर माना गया. पर ईश्वर को भी परास्त करने वाले को विशेष आदर नहीं मिल पाया है। अनुलोम प्रतिलोम विवाह की व्यवस्था अंतर्जातीय विवाह को सामाजिक मान्यता देता है जो सामाजिक समरसता के समर्थक छद्म सेकुलर आज तक न कर पाए हैं। कोर्ट समर्थित अंतर्जातीय विवाह के नव दंपति अगर स्वावलंबी न हुए तो वे न इधर के रहे न उधर के रहे।

सनातन धर्म की सहिष्णुता का प्रभाव ही है कि महेश योगी, रविशंकर, मोरारी बापू, ओशो आदि के लिए आदर की कमी न रही, पर पथभ्रष्ट कई स्वयंभू भगवान जेल की रोटियां तोड़ रहे हैं।

इस्लाम आजतक अल्लाह का अगला पैगम्बर सोच नहीं पाता और कुरान को आखिरी किताब मानकर शरीअत की छतरी के नीचे पूरी दुनिया भर को लाना चाहता है और ईसाई समुदाय हर उपलब्ध भाषा में बाइबिल छपवाकर गॉड का चुनावी घोषणा पत्र बांट रहा है। और अपनी मजबूरी ये है कि इन असहिष्णु समुदायों के विधवा प्रलाप सुनकर हमारी शान्तिप्रियता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है।

गुरुद्वारे में मत्था टेकना हो या दरगाहों की चादर चूमनी हो, हम सनातनी ही सबसे आगे हैं। लखनवी बीफ कबाब पर बैन हो या पोर्न साइट पर विद्रोह का परचम उठाए हाथ किसी सनातनी के ही होंगे।

मुस्लिम लीग, कम्युनिस्ट पार्टियां, मिशनरी स्कूल और सूफियों की मज़ारें सनातन बहुल देशों में ही संभव हैं। इस्लाम, ईसाई और यहूदी देशों में शायद ही वामपंथी झाड़ उगी हुई पाएँगे आप। साम्यवादी देशों में तो नाम रखने के लिए भी दिशा निर्देश जारी होता है कि बच्चे का नाम अल्फ्रेड चांग होगा या मोहम्मद चांग या सिर्फ चांग।

सबरीमला, शिंगणापुर आदि में रजस्वला नारियों के प्रवेश हेतु संघर्षरत प्रगतिशील जत्था सौ साल पहले तक यह मानता था कि औरतों के मुँह में मर्दों से कम दाँत होते है और इस बात की वजह नहीं बता सकते कि औरतें जमात के साथ मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकती हैं या भारत की एक दयालु महिला को संत की उपाधि वरास्ते वैटिकन क्यों मिलती है या एक पारसी प्रेमी से विवाह करके कोई महिला पारसिन क्यों नहीं बन जाती।

स्वर्ण मंदिर में माथा टेकनेवाले, दरगाहों में चादर चढ़ाने वाले, लद्दाख के बौद्ध मठों के पर्यटक, दिलवाड़ा-पावापुरी के सैलानी, लोटस टेम्पल के टूरिस्ट… सबके सब अधिकतर सनातनी ही मिलेंगे जबकि शायद ही किसी हिंदू तीर्थ स्थल पर अन्य मतावलंबी भ्रमण करते दिखें।

वो तो असहिष्णु सनातन धर्म के चंगुल में फँसे सबरीमला, शिंगणापुर के मंदिरों में सैनिटरी नैपकिन के साथ उन तकलीफ भरे दिनों में हिंदू स्त्रियों को पहुँचाने का अभियान है तो थोड़े बहुत नास्तिक भी मंदिर के सिंहद्वार तक आ गये हैं (खासकर वामपंथी कार्यकर्ता भी, जिनके पप्पा के अनुसार धर्म अफीम है और उसी अफीम का एक डोज़ दिलाने के लिए भाई लोग धार्मिक रेव पार्टी आयोजित कर रहे हैं।)

सनातन धर्म की सहिष्णुता का आलम तो ऐसा है कि भारतीय फिल्मों में अमर, अकबर और एंथनी का बाप भी एक हिन्दू ही होता है। अगर हिम्मत हो तो वाघा बॉर्डर पर मोमबत्ती जलाकर कोई अर्द्धहिंदू फिल्मकार किसी अहिन्दू पिता की संतति को अमर, एंथनी और नेतन्याहू बनाकर दिखाए। दो मिनट में सहिष्णु असनातनियों की शांतिप्रियता परदे से बाहर आ जाएगी।

इन पंक्तियों के लेखक ने लगभग हज़ारों कीमती घंटे हिन्दी फिल्मों को देखकर ज़ाया किए हैं पर एक प्रतिशत फिल्मों में भी अहिंदू महिला के साथ शीलहरण का न तो रेप सीन दिखाया गया है न इसकी चर्चा हुई है।

पर असहिष्णु कौन… हम सनातनी।

बस एक शे’र से ये किस्सा तमाम करता हूँ…

मुहल्ले की मस्जिद में जो जा न पाए,
मदीने में मरने का हक चाहते हैं।

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