माटी माटी को पुकारती है

छठ-पूजा की अग्रिम शुभ कामनाएं…!

इसे आप मन पर अंकित संस्कारों की अमिट छाप कहें या मूल की ओर लौटने की स्वाभाविक मानवीय प्रकृति, त्योहारों के आते ही मन है कि शहरों की चकाचौंध को छोड़ गाँव की ओर भागने लगता है।

पहले मैं सोचा करता था कि आख़िर क्यों कोई आजीवन देश-परदेश रहने के बाद अपना अंतिम समय अपनी माटी, अपने परिवेश, अपने लोगों के संग-साथ ही बिताना चाहता है?

अब समझ में आया कि माटी माटी को पुकारती है; हर पल हमें हमारा मूल पुकारता रहता है, भीतर बहुत भीतर अपना कोई आवाज़ दे रहा होता है। यह बार-बार लौटने की, मूल की ओर, जड़ों की ओर लौटने की प्रवृत्ति है कि छूटे न छूटतीं!

और गाँव के वे खेत-खलिहान, कूल-कछार, ताल-तलैया त्योहारों के आते ही हमारी स्मृतियों में नए सिरे से आकार लेने लगते हैं। एक-एक करके संस्कारों में बैठीं वे सारी आदतें, परंपराएँ सम्मोहित करने लगती हैं और हम अनायास उन विधियों, रीतियों, तरीकों का पालन करने लगते हैं, जिन्हें हमारे पुरखे या पूर्वज करते आए हैं। संभव है प्रारंभ में हमें वे रीतियां, वे परंपराएँ, भले न सुहाते हों..!

लोक-आस्था का महापर्व छठ भी मेरी स्मृतियों में ऐसे ही गहरे पैठा है। मैकॉले प्रणीत शिक्षा-पद्धति का दोष कहें या छीजते विश्वास का दौर, हमारा मन अपने ही त्योहारों, अपनी ही परंपराओं के प्रति सशंकित रहता है। सर्वाधिक सवाल-जवाब हम अपनी परंपराओं से ही करते हैं; भले ही वे परंपराएँ वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरे उतरते हों; सामूहिकता-सामाजिकता को सींचते हों; समय के शिलालेखों पर अक्षर-अक्षर जीवंत हों!

स्वाभाविक है कि बचपन में मुझे भी लगता था कि छठ के अवसर पर हर सूप या डगरे में अर्घ्य के रूप में चढ़ाया गया गौ-दुग्ध या गंगा-जल एक प्रकार की फिजूलखर्ची है। लाखों-करोड़ों लोगों का एक साथ नदियों में डुबकी लगाना, पूजन के पश्चात उच्छिष्ट पदार्थों को विसर्जित करना, एक प्रकार का जल-प्रदूषण है।

आज उम्र के इस पड़ाव पर यह समझ आया है कि मैं कितना ग़लत था। हर सूप, हर गमले या हर डगरे में दूध या जल का दान बर्बादी नहीं बल्कि अर्घ्य-दान है, कृतज्ञ मानव की प्रकृति के प्रति यह अपनी ही तरह की श्रद्धाभिव्यक्ति है, जीवन को पोषण देने वाले भगवान सूर्य के प्रति कृषि-संस्कृति की यह आदरांजलि है।

हम देंगे नहीं तो पाएँगे कहाँ से? कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। यह कृतज्ञता की संस्कृति है। जब हमारे पास बहुत कुछ हो, उसमें से कुछ दे दिया तो क्या दिया?जब हमारे पास कम है, थोड़ा है, अपनी आवश्यकता भर का है, उसमें से जो दिया वही तो वास्तविक देना है।

जैसे कोई किसान ढेर सारा अन्न उगाने के लिए कुछ सुंदर-सुगठित अन्न के दाने का बीज के रूप में दान करता है, वैसा ही है यह अर्घ्य; और इन त्योहारों मुख्यतः छठ की सामूहिकता ऐसी कि किसी के पास सूप-गमले-डगरे में अर्घ्य के लिए गौ-दुग्ध न हो तो गाँव से बिन माँगे आपके पास दूध पहुँचाने वालों की कमी नहीं।

‘व्रती’ के ‘पारण’ (भोजन) में लौकी की सब्ज़ी अनिवार्य रहती है, मुझे ध्यान आता है कि ‘पारण’ से बहुत पूर्व ही गाँव के किसान लौकी तोड़ना बंद कर देते हैं, क्योंकि हर व्रती तक लौकी पहुँचाना उनके लिए एक पुनीत कर्त्तव्य-सा है।

अव्वल तो महीनों पूर्व छठ की तैयारी प्रारंभ हो जाती है, फिर भी कोई कोर-कसर या अभाव हो तो सामूहिकता ऐसी कि किसी के पास प्रसाद आदि के लिए सामग्री न हो तो हर कोई उसकी मदद को तत्पर रहता है। सामग्री भी कैसी, प्रकृति जनित-गन्ना, हल्दी, मूली, नारियल, डाभ, अंकुरित चना, अमरूद, सिंघाड़ा, ठेकुआ आदि-आदि।

प्रकृति से प्राप्त इन तमाम चीजों को कृतज्ञ हृदय भगवान सूरज को अर्पित कर धन्य-धन्य हो उठता है; प्रकृति से प्राप्त सामग्री को प्रकृति-माता को अर्पित करना कैसा तृप्तिदायक अनुभव है; तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा का यह भाव कितना अनूठा है!

नकली त्योहार बाज़ार पैदा करते हैं, पर चाहकर भी वे उन त्योहारों को लोगों की आत्मा में नहीं उतार पाते… पर छठ में जन-भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ता है। देश-परदेश में काम कर रहे लाखों लोग इस अवसर पर बाट जोह रहे अपनों की आस को पूरा करने के लिए अपने घर लौट आते हैं; वे लाख मुसीबत उठाकर भी हर हाल में लौटना चाहते हैं, ट्रेन के जनरल कोच में धक्के खाकर हो या बसों में लदकर, वे व्रतियों के संकल्प को मज़बूती देने के लिए उनके साथ खड़ा रहना चाहते हैं। वे इस महापर्व में शामिल होकर वर्ष भर के लिए ऊर्जा का संचय कर लेना चाहते हैं। यह ऊर्जा अपनों से दूर भी उन्हें गतिमान बनाए रखती है।

एकता के स्लोगनी इंटलेक्चुअल्स को यह अद्भुत सोशल इंजीनियरिंग या सांस्कृतिक एकता का विज्ञान समझ में नहीं आता! वे किसी कृत्रिम या आयातित विचार के आधार पर अनेकता में एकता के ख़्वाब संजोते हैं, पर लोक की सामूहिक चेतना से निःसृत इन अनूठी परंपराओं को हिकारत से देखते हैं।

वे भूल जाते हैं कि ये परंपराएँ ही हमें ‘मैं’ से ‘हम’ बनाती हैं। वे लाखों श्रद्धालुओं की डुबकी या पूजन में प्रदूषण तक ढूंढ लाते हैं, पर महीनों पूर्व से घाटों, नदियों, ताल-तालाबों की साफ-सफ़ाई उन्हें नहीं दिखती।

स्त्री-विमर्श चलाने वाले तथाकथित नारीवादी प्रायः यह प्रश्न उठाते हैं कि स्त्रियाँ ही क्यों व्रत करें? उन्हें शायद नहीं मालूम या वे जानना नहीं चाहते कि छठ जैसे त्योहारों में हजारों-लाखों पुरुष भी व्रत रखते हैं, वे अपने घर से घाट तक की सारी व्यवस्था सँभालते हैं, घाट की साफ-सफाई से लेकर ठेकुआ के लिए पिसान हो, प्रसाद के लिए सामग्री जुटान हो या कुछ और… ये सारी व्यवस्था घर के पुरुषों के कंधों पर ही होती है।

घर के तमाम पुरूष सदस्य घर से घाट तक भगवान सूर्य को दण्डवत प्रणाम देते हैं और ये सब खुशी-खुशी; व्रती स्त्रियाँ उनकी श्रद्धा की सर्वोच्च केंद्रबिंदु होती हैं, उनका हर आदेश-आग्रह उनके लिए ब्रह्म-वाक्य की तरह होता है। मजाल क्या कि लाखों की भीड़ में भी किसी महिला के साथ कोई बदसलूकी का दुःसाहस करे?

दरअसल ये त्योहार, ये परंपराएँ जनमानस के अंतर्प्रक्षालन की अद्भुत प्रक्रिया है। स्वाभाविक रूप से त्योहार एक-दूसरे के लिए त्याग का भाव जगाते हैं, एक-दूसरे के लिए जीना सिखाते हैं, परस्पर प्रेम और आदर का भाव पैदा करते हैं।

जब सारी दुनिया उगते हुए सूरज की पूजा-परिक्रमा में जुटी हो, यह महापर्व हमें ढलते हुए सूरज की भी सहेज-सँभाल करने की अनूठी सीख देता है। आइए, इन अनूठी परंपराओं पर गर्व करना प्रारंभ करें। आधुनिकता का अभिप्राय अपनी परंपराओं के प्रति हीनता-ग्रन्थि पालना नहीं, बल्कि उनके पीछे के विज्ञान को समझना है।

इन परंपराओं ने ही हमें अनंत वर्षों से एक राष्ट्र के रूप में मज़बूती से थामे रखा है; बढ़-चढ़कर इनका हिस्सा बनें, इन्हें आगे बढ़ाएं… अपनी संततियों को इनके बारे में बताएँ…!

सच मानिए तो ये त्योहार हमें जीना सिखाते हैं, इनमें उल्लास और जीवन के गीत हैं। क्या आपको सनातन संस्कृति का एक भी ऐसा त्योहार ध्यान आता है, जिस पर मातम मनाया जाता हो; शायद ही किसी को श्रीराम, श्रीकृष्ण या हमारे अन्य आराध्यों का मृत्यु-दिवस ज्ञात हो? हम जीवन का गीत गाने वाले लोग हैं। नैराश्य और पलायन हमारे लिए अपराध है। जीवन का ध्येय स्वयं जीवन है। बल्कि मृत्यु भी सनातन संस्कृति में एक उत्सव है।

आइए, अपनी उत्सवधर्मिता को इन त्योहारों और परंपराओं के रूप में अक्षुण्ण रखें। पुनश्च, परंपराएँ हैं तो हम हैं, इन्हें हर हाल में सुरक्षित और समृद्ध रखना हमारा धर्म है, उत्तरदायित्व है।

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