पीरियड्स के खून को इत्र समझ नहीं रगड़ेंगी, तो क्या बराबरी का अनुभव नहीं होगा!

फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर कोई जो ऐसा महीना निकल आये जब पीरियड्स पर क्रांति नहीं होती हो। पीरियड्स क्या है इसे समझने के लिये कक्षा आठ की बायोलॉजी की किताब काफी है, तो इसके वैज्ञानिक पक्ष पर बात करने का कोई मतलब नहीं है मेरे लिये।

पर अब क्रांति सड़ांध मारने लगी है, अतः इसके अनुभव पर बात करूँगी। जब मेरे पीरियड्स शुरू हुये तो शुरुआती सालों में काफी इलाज की जरूरत पड़ी क्योंकि दर्द बहुत ज़्यादा था। कुछ लड़कियों के लिये यह थोड़ा बुरा होता है कुछ के लिये ज़्यादा बुरा। मेरे लिये बहुत ज़्यादा बुरा था। मैं स्कूल में थी और पीरियड्स शब्द से खौफ खाती थी। मुझे याद है उन दिनों पापा देर रात तक मेरे बगल में बैठते थे। पेट पर सेंक लगाते थे। रोती थी तो चुप कराते थे। बाल सहला कर ढाढस देते थे।

ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मेरी धार्मिक स्वभाव की माँ ने भी मेरे पीरियड्स के दौरान मेरे सारे अधिकार छीन लिये। उस दौरान ज्यादा ख्याल रखा गया हमेशा।

मेरी बहन और जानने वाली औरतों के साथ भी मैंने यही देखा है कि जो भी थोड़े sensible परिवार का हिस्सा हैं, उनको इस दौरान स्पेशल केयर मिलता है। मेरे पुरुष मित्र हो या रिश्तेदार, अगर उन्हें मालूम है कि लड़की का पीरियड्स चल रहा है तो वे ज्यादा co-operative होते हैं। एक बार अचानक रात में शुरू होने पर मैंने अपने किसी पुरुष दोस्त को फोन किया है कि प्लीज मेरे PG के नीचे आ जा एक सेनेट्री पैड का पैकेट खरीद कर। क्लास में अचानक शुरू होने पर एक क्लासमेट को भेजा है कि भाग कर बाइक निकाल और ले कर आ। कोई मज़ाक नहीं उड़ाया मेरा इन बातों पर या नीचा नहीं दिखाया मुझे।

जिन औरतों के पीरियड्स के दौरान भी उनके साथ बुरा व्यवहार होता है वे उस परिवार का हिस्सा हैं, जो औरतों को दबा के रखता है। ऐसे घरों में औरतों को दबाने के हज़ार कारण हैं, एक पीरियड्स ही नहीं।

ज़रा सोचिएगा, क्या जिसको औरत के साथ अत्याचार करना होगा वह पीरियड्स का इंतज़ार करेगा कि वह शुरू हो तो मैं इसको नीचा दिखाना शुरू करूँ? कितनी बेवकूफी भरी बात होगी यह। पर पीरियड्स को ऐसा दिखाया जा रहा है मानो पूरी दुनिया के धार्मिक लोग पीरियड्स वाली औरत को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं।

अब बात धार्मिक नियमों की तो धर्म में तो हज़ार चीजें हैं जो logical नहीं हैं, scientific नहीं हैं। फिर धर्म से जुड़ी एक बात पीरियड्स को ही क्यों target करना?

धार्मिक रुप से भी पीरियड्स सुचिता का प्रश्न है, पवित्रता-अपित्रता का नहीं। फिर बिना इस बात को समझे जबरदस्ती इसको पवित्र साबित करने की कोशिश निहायत बेवकूफाना है।

मेरा पीरियड का खून पूरी तरह unhygienic होता है। तो उसे मैं पवित्र कैसे कह दूँ? हाँ, उस दौरान मैं अपवित्र नहीं होती पर वह खून तो अपवित्र ही होता है, अगर आपको अपवित्र शब्द का मतलब मालूम हो तो।

अब आयुर्वेदिक इलाज के बाद दर्द पहले की तरह असहनीय नहीं है पर पाँच दिनों तक लगातार शरीर से खून रिसना मेरे लिये मन घिना देने वाला अनुभव होता है। बहुत ही ज़्यादा uncomfortable… शरीर की प्राकृतिक प्रकिया है लेकिन क्या पसन्द आने लायक है इस रिसते खून में?

पर भारत तो भारत, पश्चिम जिसे मॉडर्न माना जाता है वहाँ भी पीरियड्स के खून को पवित्र साबित करने के लिये लोग पागल हुये जा रहे हैं। इन मोहतरमा ने अपने पूरे शरीर पर ही यह खून लगा लिया।

हे क्रांतिकारी भारतीय औरतों, लग जाइये आप भी यही करने में। क्योंकि जब तक पूरी दुनिया पीरियड्स के खून को इत्र समझ कर नहीं रगड़ेगी, आपको बराबरी का अनुभव नहीं होगा।

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