सेना अपने चरित्र पर लांछन की चिंता करे या देश की सुरक्षा की?

जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक जहां भी भारतीय सेना तैनात है, वहाँ से सैनिकों द्वारा औरतों के साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार की खबर मिलती रहती है।

एक आम भारतीय भले ही आर्मी का महत्व समझता हो, उसे सपोर्ट करता हो, पर लगातार आती ऐसी खबरें कहीं ना कहीं आर्मी के चरित्र के प्रति उसके दिमाग में नकारात्मक छवि तो बनाती ही है।

मैं दुनिया की किसी भी organization को दूध का धुला नहीं मानती। औरत के साथ दुर्व्यवहार करने वाला चाहे कोई भी हो उसे सज़ा मिलनी ही चाहिये, आर्मी अपवाद नहीं है इसीलिये न्यूज़पेपर से बाहर मैं मिलिट्री से जुड़े अपने परिवार के कुछ अनुभव बताऊंगी।

बात करीब बीस साल पहले की है। मेरे पिता चंदेल में पोस्टेड थे। चंदेल मणिपुर का एक छोटा सा शहर है। हम थोड़ा गांव की तरफ रहते थे। आज की स्थिति का मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं पर उन दिनों चंदेल NSCN, जोकि एक अलगाववादी आतंकी संगठन है, का गढ़ हुआ करता था। पूरा मणिपुर तब वैसे ही जल रहा था जैसे आज कश्मीर। उन्हें एक अलग देश चाहिये था नागाओं (वहां की आदिवासी जातियां) के लिये।

चंदेल में बस तीन चीजें ही थी- जंगल, आतंकवादी, और मद्रास रेजिमेंट। इन सबके बीच था हमारा नवोदय विद्यालय जिसमें मेरे पिता शिक्षक के रूप में कार्यरत थे। NSCN अपनी फंडिंग के लिये इलाके के हर इंसान से वसूली करता था। चंदेल नवोदय के मेस में करीब पच्चीस से तीस लोगों का खाना उनके लिये फिक्स था जोकि हर रात कोई आतंकवादी लेने आता।

हम यहां बैठे सरकार को गाली देते हैं कि वे इन भटके हुये नौजवानों को शिक्षा के बल पर क्यों नहीं बदलते। पर धरातल की सच्चाई यह है कि स्कूल में जुटे इलाके भर के मासूम बच्चे इनके सबसे सॉफ्ट टारगेट होते हैं।

वहीं से वे अपने नये recruits चुनते थे। जिसमें 6th-7th क्लास के बच्चे भी चुने जाते थे। लड़के- लड़कियां दोनों। जो बच्चा NSCN में शामिल होता उससे ना तो शिक्षक ऊँची आवाज़ में बात करने की हिम्मत करते, ना ही होमवर्क से लेकर अटेंडेंस तक का कोई पंगा होता उसके लिये।

वे बच्चे महीनों कक्षा से गायब रहते और फिर भी उन्हें अच्छे नम्बर दिए जाते। यह ग्यारह-बारह साल के बच्चों के लिये पर्याप्त तत्कालीन पुरस्कार होता, बाकी जो उन्हें भविष्य के लिये सब्जबाग दिखाए जाते उसका तो कोई अंत नहीं था।

रिक्रूटमेंट करवाने वाले आतंकवादियों के अपने बच्चे होते थे जोकि खुद भी वहीं के students होते। शिक्षक वहाँ कक्षा में एक वाक्य भारत के पक्ष में नहीं बोल सकता था अगर उसे जिंदा रहना था तो। आतंकवादी इस बात का पूरा ध्यान रखते कि उनकी शिक्षा के अलावा कुछ भी ऐसा बच्चों तक पहुंचे ही ना जिससे बच्चे इस देश के बारे में अच्छा सोच भी पाये। ऐसा ही एक गलत वाक्य कक्षा में बोल देने के बाद एक शिक्षक को आतंकवादियों ने अगले दिन अधमरा कर दिया। ऐसे में कैसे पकड़ायेंगे आप दुश्मन के बच्चों के हाथ में कलम?

एक बार मेरी माँ मुझे लेकर डॉक्टर के पास जा रही थी कि मिलिट्री ने बस रुकवाई और हर यात्री को सिर पर हाथ रख कर ज़मीन पर लेटने को कहा। फिर एक-एक कर उठवा कर चेकिंग कर रहे थे। जब मेरी माँ की बारी आयी तो उनकी ID देखने के बाद मिलिट्री के एक नौजवान सैनिक ने उन्हें एक तरफ बुला कर उनसे रिकवेस्ट की कि उनके पास महिलायें नहीं थी तो क्या उन लोकल महिलाओं की तलाशी लेने में मेरी माँ मदद कर सकती है। माँ ने मिलिट्री से माफी माँगते हुये मना कर दिया। तभी उनका ऑफिसर आया और उसने उस सैनिक को बड़ी तेज डांट लगायी। फिर माँ से, “Sorry for inconvenience” कहकर बस में बैठने को कहा।

चंदेल जैसे इलाके में आपके बगल में बैठी मासूम दिखने वाली औरत भी आतंकवादी हो सकती थी जोकि उस ऑफिसर को मालूम था। किसी से उनकी चेकिंग करवाना मतलब उस इंसान को टारगेट बनाना। शाम को रास्ते पर चलते वक्त आप टॉर्च की लाइट गलती से किसी के चहरे पर नहीं कर सकते थे। यह आत्मघाती होता।

उन चार सालों में करीब एक दर्जन बार ऐसा हुआ कि अचानक रात दो बजे हमारे दरवाजे खटखटाये गये। दरवाजा खोलते ही आप दरवाजे की दोनों तरफ सटे दो सैनिकों के गनपॉइंट पर होते। फिर आपके पूरे परिवार को खुले जगह पर ले जाया जाता। इलाके के हर घर से लोगों को निकाल कर मैदान में बैठा दिया जाता। फिर पूछताछ शुरू होती।

दूर मिलिट्री के ऑफिसर की कुर्सी लगी होती। एक-एक कर सबको बुलाया जाता और तफ्तीश होती। मिलिट्री पूरे इलाके को इसीलिये बुलाती है कि अगर गवाह मिले तो भी आतंकवादियों को नहीं पता चले कि आखिर था कौन। मिलिट्री को अच्छे से मालूम होता है कि इन लोगों में से कई खुद आतंकवादी है, बाकी उनके समर्थक जो हमारी मौत चाहते हैं, पर यह जानते हुये भी इन सार्वजनिक तफ्तीशों के दौरान एक इंसान से वे लंबी बात नहीं करेंगे ताकि आतंकवादी उसपर शक कर उसपर हमला ना करे।

जब रात को अचानक मिलिट्री की raid पड़ती तो आपके पास इतना समय नहीं होता कि आप अपना हाथ भी इधर से उधर कर दे। दरवाजा पर knock हुई कि मिलिट्री के साथ चुपचाप चल दो। आप औरत हैं तो भी आपको समय नहीं दिया जायेगा कि आप अंदर जाकर साज-श्रृंगार कर के आयें क्योंकि इतना समय देने पर औरत अंदर से बम भी लेकर आ सकती है। यकीन मानिये वहाँ ऐसा करने की चाहत रखने वाली औरतों की संख्या बहुत थी, भले ही इसके लिये उन्हें जान भी देनी पड़े।

आतंकवादियों के परिवार और उनका समर्थन करती हुई बहुत सी औरतें जान-बूझकर दरवाजे पर खटखटाहट होते ही कपड़े उतार लेती। फिर भरी भीड़ में उनका सुबकना शुरू होता कि कैसे उन्हें नंगे ही उठा लिया गया। कैसे उन्हें गलत तरीके से छुआ गया, या बलात्कार कर दिया गया। मिलिट्री वाले उन औरतों के साथ कोई बदतमीजी नहीं करते। खुद उनके घर से कपड़े निकाल कर देते। पर ज़रा सोचियेगा ये औरतें अपने शरीर का घटिया प्रयोग कर वहाँ उपस्थित हर इंसान के मन में मिलिट्री की क्या छवि बनाने की कोशिश करती थीं?

उन सब गांववालों से मेरे परिवार की पहचान थी और मिलिट्री के जाने के बाद वे आराम से हँस-बोल रही होती और हमारे घर पर आकर चाय भी पीती। उन औरतों को देखकर यह भरोसा करना असम्भव होता कि एक रात पहले इनके साथ बलात्कार जैसा कुछ जघन्य हुआ है।

आपको आज तक मसाला फिल्मों में झूठ दिखाया गया है कि मिलिट्री की ट्रक गांव में घुसकर लात-जूते बरसा कर पूछताछ कर रही है। मिलिट्री वाले गाँव वालों को ना तो एक लाइन से खड़ा कर के गोली मारते हैं, ना ही मिलिट्री के raid में कभी किसी औरत के साथ कोई बदतमीजी होती है। दर्जन भर बार इन तफ्तीशों के दौरान मेरी माँ से भी अकेले में पूछताछ की गयी है। बस तमीज से पूछा जाता था कि वे इलाके के किसी NSCN वाले को पहचानती है या नहीं? क्या वे देश को सुरक्षित बनाने के लिये आर्मी की मदद करेंगी?

मैं यह दावा नहीं कर रही कि मिलिट्री में हर इंसान दूध का धुला होगा औरतों के मामले में। पर मणिपुर और कश्मीर जैसे जगहों पर जहाँ हर दूसरा इंसान ही सैनिकों को मरता देखना चाहता हो, जहाँ हर दिन कुछ राउंड फायरिंग दिनचर्या है, जहाँ हर रोज एक-दो सैनिको का मरना कोई खबर नहीं, वहाँ मिलिट्री बहुत ज्यादा ध्यान रखती है अपनी इमेज का।

आप कितनी भी अप्सरा हो वे आपको घूर कर देखेंगे भी नहीं। आर्मी दुनिया की सबसे disciplined organization होती है ना कि लुच्चों की भीड़। ऊपर से नीचे तक सख्त ऑर्डर और कड़ी निगाह होती है कि सैनिक कोई ऐसी गलती ना करे कि लोकल्स में सैनिको के प्रति रोष पैदा हो। उनकी hierarchy इतनी ज्यादा कठोर होती है कि उन्हें मालूम है उनपर लगा ऐसा कोई भी इल्जाम आते ही सबसे पहले उनके खुद के सीनियर ही उनकी खात खड़ी कर देंगे।

उन पर लोकल आतंकवादियों को जान से मारने का भी दबाव होता है और आम लोगों के दिल जीतने का भी। सोचियेगा जरा, Indian Army जिसके पास औरतों की इतनी कमी है कि चंदेल जैसे sensitive इलाके में एक भी महिला सैनिक नहीं थी, वे कितनी मुश्किल से डील करते हैं उन महिलाओं से, जो पुरुष आतंकवादियों को बचाने के लिये शील्ड बनती है?

वे उनके साथ धड़-पकड़ करें तो वे नँगा होकर चिल्लाने लगती हैं, “Indian Army Rape Us”। अगर वे ना पकड़ें तो वे जैकेट में बम लगाकर उड़ाने के चक्कर में पड़ी रहती हैं। कितनी मुश्किल स्थिति होती होगी यह सैनिकों के लिये?

अब मिलिट्री ऐसे में करे तो क्या करे? पूरी दुनिया के सामने अपने चरित्र पर लांछन की चिंता करे या देश की सुरक्षा की?

हमें शुक्रगुजार होना चाहिये कि आर्मी अपने ऊपर शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक हमला बर्दाश्त करते हुये भी पहले के बजाय दूसरा ऑप्शन चुनती है और हमें सुरक्षित रखती है।

ऐसा नहीं है कि आजतक किसी सैनिक ने बलात्कार नहीं किया होगा पर इन आतंकवादियों के इलाके में रह चुका हर इंसान यह जानता है कि सैनिकों द्वारा ऐसे कृत्य rarest of rare है। वे ज़रूरत पड़ने पर औरत को गोली ज़रूर मार दे पर उसके साथ ऐसा कुछ नहीं करेंगे कि उनपर हमला करने के लिये भूखे so called मानवाधिकार वाले भेड़ियों को कोई ऐसी हेडलाइन मिले जोकि मिलिट्री की छवि बर्बाद कर दे। पर फिर भी हर दिन झूठी हेडलाइन्स बनती हैं और हर दिन हमारे दिमाग़ में यह डालने का प्रयास होता है कि आर्मी सिर्फ बलात्कारी पुरुषों की जमात है।

कभी रह कर देखियेगा कश्मीर, नॉर्थ-ईस्ट या किसी भी आतंकवाद और नक्सल प्रभावित क्षेत्र में, आपको जो नंगी-रोती औरतों की तस्वीर दिखायी जाती है, उसके पीछे की सच्चाई आपको बताये गये तथ्यों से कोसों दूर है।

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