दस नवम्बर 1659, शिवाजी की पहली बड़ी विजय का दिन

आदिलशाही फौजों की कमान खूंखार अफज़ल खान के हाथ में थीं। उसे अपने लम्बे चौड़े कद के लिए जाना जाता था।

जेहादी अफज़ल खान की योजना थी कि किसी तरह शिवाजी को मैदानी इलाकों में खींच लाया जाए ताकि शिवाजी की सेना उसकी तोपों और बंदूकची का आसान शिकार बन जाएँ।

अपने मकसद को पूरा करने और शिवाजी को मैदानों में खीच लाने के लिए जेहादी अफज़ल ने पंढरपुर पर हमला किया और तुलजापुर का भवानी मंदिर तोड़ दिया।

जेहादी अफज़ल की फौज़ में करीब 12 हज़ार घुड़सवार, 10 हज़ार पैदल सैनिक और 80-90 तोपें थीं। उसे जंजीर के सिद्दी से मदद भी मिली थी।

इस विशाल इस्लामिक फौज़ का सामना करने में शिवाजी की मदद सबसे पहले देशमुखों में कान्होजी जेढे ने की। उनके घुड़सवारों की कमान नेताजी पालकर ने संभाल रखी थी।

शिवाजी के पास सिर्फ 3 हज़ार पैदल सैनिक थे जो मोरोपंत पिंगले के नेतृत्व में थे। शिवाजी के मारे जाने की स्थिति में अफज़ल खान से अंतिम युद्ध लड़ने के लिए पीछे शाहजी अपनी सेना के साथ तैयार थे।

शिवाजी ने अपना दूत अफज़ल खान के पास भेजा और कहलवाया कि वो समझौते की बात करने के लिए तैयार हैं। इस्लामिक हमलावर ये देख चुके थे कि राजा के मरते ही हिन्दुओं की सेना अपने आप हार मान लेती है और अफज़ल खान ने यही करने का इरादा कर रखा था।

युद्ध की नीतियों में मूर्खतापूर्ण नैतिकता के बदले शिवाजी चतुराई से काम लेते थे। इसलिए अफज़ल खान से मिलने जाते वक्त शिवाजी अपने साथ यशाजी कंक और जीवा महाला जैसे अंगरक्षकों को साथ ही ले गए थे।

हुआ भी वही जिसका डर था। धोखेबाज कायर अफज़ल खान ने शिवाजी की हत्या कर देने की कोशिश की। कपड़ों के अन्दर कवच पहने शिवाजी तो बच गए लेकिन शिवाजी के बिछुवा-बघनखे का वार अफज़ल खान को घायल कर गया।

उसे घायल होता देख अफज़ल खान के अंगरक्षक सय्यद बाँदा ने शिवाजी की हत्या करने की कोशिश की। वहीँ खड़े जीवा महाला ने फ़ौरन हमलावर के दो टुकड़े कर डाले।

इस घटना के कारण मराठी कहावत “होता जीवा महानुन वचाला शिवा” भी चलने लगी। भागते हुए कायर कुत्ते का शम्भाजी कोंडालकर ने पीछा किया और अफज़ल खान का सर काट लिया।

इसी वक्त इशारा पाकर कान्होजी जेढे अपने घुड़सवारों के साथ आगे बढ़े और अफज़ल खान के बंदूकचियों पर धावा बोल दिया। मोरोपंत पिंगले ने आदिलशाही फौजों पर बायीं तरफ से हमला किया। राघो अत्रे के साथ के घुड़सवारों ने इस्लामिक हमलावरों की घुड़सवार सेना को रौंद डाला।

अबतक भागती हुई आदिलशाही फौज़ पर पैदल सैनिकों के साथ नेताजी पालकर टूट पड़े थे। अपने से कई गुना बड़ी इस्लामिक आदिलशाही फौज़ को शिवाजी की सेना ने रौंद डाला। इस जोरदार लड़ाई में करीब 5000 आदिलशाहियों के मुकाबले में 1700 के लगभग मराठा सैनिक खेते रहे।

आज ही के दिन 10 नवम्बर 1659 को शिवाजी ने अपनी पहली बड़ी विजय हासिल की थी। जो जानी पहचानी सी पेंटिंग आप देखते हैं, वो आज की ही है। जय भवानी!

(जानकारी इन्टरनेट के अलग अलग स्रोतों से साभार)

हे मी लॉर्ड! सहने और प्रतीक्षा की भी एक हद होती है!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY