ठग ऐसे-वैसे, ठग कैसे-कैसे!

मित्र रविंद्र कांत त्यागी ने आज कुछ लेख लिखे हैं जिनमें वह बतला रहे हैं कि कैसे दुष्ट प्रवृत्ति के लोग साधारण व्यक्ति को ठगा करते हैं।

ठगने के लिए वे किसी महंगी वस्तु को सस्ते में देने का प्रलोभन देते हैं या किसी खज़ाने या धन संग्रह को आप से बांटने की बात करते हैं, भले ही आपकी उस खज़ाने या पूंजी में कोई भागीदारी ना हो।

लेकिन यह तो हुई छोटी-मोटी ठगी की घटनाएं जिनमें कुछ हज़ार से लेकर, कुछ लाख या करोड़ तक भी गंवाए जा सकते हैं। इन सभी ठगी के पीछे एक ही ‘शक्ति’ है : वह है मानव स्वभाव का लालची होना।

पहले भी लिख चुका हूँ कि केवल ठग ही नहीं बल्कि नेतागण भी जनता को ऐसे ही मूर्ख बनाते हैं। महंगी सेवाओं को सस्ते में या फ्री में बोलकर जनता को लुभा लेते हैं और कोई भी व्यक्ति या नहीं पूछता कि इसके लिए पैसे कहां से आएंगे।

बचपन में हमारे माता-पिता क्यों कहते थे कि किसी भी चीज़ को समझ-बूझकर कर खरीदो, अगर कोई सस्ते में आलू बेचे तो देखो कि उसमें सड़े हुए आलू तो मिक्स नहीं है? तराजू के नीचे हाथ तो नहीं लगा रखा, कंटिया तो नहीं मारी हुई है? इसी तरह अगर कोई लॉलीपॉप दे, तो उन अंकल के साथ मत जाना।

फिर हम क्यों पब्लिक सर्विस, ट्रैन टिकट, सस्ती बिजली, पानी इत्यादि के बारे में यह प्रश्न नहीं पूछते हैं? क्यों हम लागत से कम में ट्रैन टिकट चाहते हैं? क्यों हम सस्ती बिजली, पानी से खुश हैं, और फिर शिकायत करते हैं कि बिजली 8 घंटे गोल रहती है, पानी, वह भी गन्दा, केवल एक घंटे आता है?

यही हाल पब्लिक सर्विस या जन सेवाओं का है। भारत के अभिजात्य वर्ग को पता है कि जनता को सस्ती कीमत पर उच्च सेवा का वादा देकर वह बरगला सकता है क्योंकि जनता भी प्रदूषित पानी, उतार चढ़ाव वाली बिजली, वह भी कुछ घंटो के लिए, टूटी-फूटी सड़कें, देर से पेंशन, राशन में चोरी इत्यादि को सहन कर लेगी, क्योकि कीमत कम है।

जबकि वही अभिजात्य वर्ग टैंकर का पानी, जेनेरेटर से बिजली, निजी सिक्योरिटी, हवाई जहाज़ इत्यादि का प्रयोग करके अच्छी गुणवत्ता की सेवाएं हमारे टैक्स के पैसे से फ्री में ले रहा है।

इसी अभिजात्य वर्ग ने जनता को बरगला कर स्वतंत्रता के बाद से कब्ज़ा किया हुआ था। सन 2000 से सिनेमा का टिकट कम से कम पांच गुना बढ़ गया, रेस्टोरेंट में खाने का दाम बढ़ गया, चाय महंगी हो गयी, लेकिन पिछली सरकार के समय रेल का भाड़ा – उपशहरी, लोकल, सामान्य, नॉन-AC का – नहीं बढ़ा।

क्योंकि इन्ही लॉलीपॉप से भ्रष्ट elites ने सत्ता पर कब्ज़ा किया हुआ है, हमारी उन संस्थाओं को extractive (यानि कि, शोषण करने वाली) बना दिया। हमारी संस्थाए – जैसे कि, सरकार, उद्योग, ब्यूरोक्रेसी, विधानसभाएं, NGOs इत्यादि elites – अभिजात्य वर्ग – ने कब्जिया लिया।

उन्हें पता है कि स्लोगन, नारेबाजी, और सस्ते दामों के नाम पर वो मेजॉरिटी को उल्लू बना सकते हैं। मतदान के द्वारा सत्ता परिवर्तन केवल एक भ्रम था।

शक्तिशाली अभिजात्य वर्ग अक्सर आर्थिक प्रगति के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, क्योंकि वह अपने हित को – अपनी constituency – जैसे कि अपनी सीट, अपना उद्योग, अपना NGO – सुरक्षित रखना चाहते हैं।

उन्हें डर है कि आम जनता अगर सशक्त हो गयी तो उनका रचनात्मक विनाश (creative destruction) हो जायेगा। उनका आर्थिक स्थिति खो जाएगी। उन्हें अपने विशेषाधिकार खोने का डर है। और इसीलिए ‘वे’ ग्रोथ या विकास में बाधा डाल देते हैं, और हमारी आँखों पर पट्टी।

तभी मुझे लगता है कि पहली बार सत्ता में आयी मोदी सरकार जनता के हित की बात कर रही है, कह रही है कि हम बीस ट्रिलियन डॉलर (अमेरिका से भी बड़ी) की अर्थव्यवस्था बनाने का सपना क्यों नहीं देख सकते? कई ऐसी नीतियां बना रही है और बना दी हैं जो क्रांतिकारी साबित होंगी। इस अभिजात्य वर्ग की रीढ़ की हड्डी तोड़ देगी!

भूल जाइए कि मोदी ऐसी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था चोरों के लिए छोड़ने जा रहे हैं

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