हम रिटायरमेंट तक का इंतजार नहीं करने वाले!

एचपी की वो एड वीडियो आपने देखी होगी आपने। ‘कहा था न अम्मा! सारे दीये बिक जाएंगे।’ प्रवाह में एक अचानक विराम से वीडियो की ये आखिरी पंक्ति भावुक कर देती है।

दीये बेचने वाली महिला ‘लल्ला, लल्ला!’ करते हुए उसके पीछे भाग पड़ती है… जैसे उसके आगे कुछ हो ही न…

दस सेकंड के इस दृश्य में हमारा भारत बसता है। आम हिन्दुस्तानी बराबर भावुक होता है। मन में दया, करुणा और श्रद्धा लिए, उसके भीतर अपने समाज के लिए कुछ कर जाने की बलवती इच्छा होती है। अपनी व्यस्तताओं में उलझे रहने के कारण वो इसे ज़ाहिर नहीं कर पाता। इसलिए ऐसे वीडियो और संदेश हमें और गहरे छूते हैं। वो कहीं न कहीं हमारा भाव लिए होते हैं। हमारे लड़कपन के, छुटपन के नि:स्वार्थ, निश्छल से भाव!

हमारे त्योहारों के धार्मिक पक्ष के इतर उनका सामाजिक और भावात्मक पक्ष भी होते हैं। लोक में उन्हें लोकप्रिय बनाए रखने के लिए यही पक्ष महती भूमिका निभाते हैं।

आप जब दीवाली की बात करते हैं, तो पहले-पहल आपके जेहन में क्या आता है! निश्चित ही आपका बचपन आता होगा, घर-गाँव-बड़ों का प्यार, पटाखे-पकवान याद आते होंगे। लेकिन जीवन की हकीकत मानिए या नियति, हर दौर बीतता है और एक वक्त के बाद ये चीजें उत्साहित नहीं करतीं।

हमारे देहात में एक कहावत होती है, ‘जेहने रब दिन, तेहने सब दिन।’ मतलब जैसा रविवार का दिन वैसे ही सभी दिन। त्योहार भी आम दिनों की तरह होने लगें तो ये कहावत याद आती है।

कामकाजी लोगों के जीवन में रविवार का दिन छुट्टी का होता है, जबकि गाँव के किसान के जीवन में कोई छुट्टी नहीं होती। वो रविवार को भी उतनी ही मेहनत करते हैं। वैसे ही गाँव के बेरोजगारों का हर दिन रविवार ही होता।

लेकिन गाँव इस कहावत को बखूबी जीता है, इसलिए उनके लिए त्योहार और महत्वपूर्ण हो जाते हैं। व्यस्त या खाली, लेकिन उनके एकरस जीवन में विविधता ये त्योहार ही लाते हैं। त्योहारों के महत्व को शहर उतना नहीं समझ पाते।

शहर वालों के लिए तो त्योहार बस फुर्सत और छुट्टियों की तरह है। यहां परिवारों में त्योहारों पर वो केमिस्ट्री नहीं दिखती। त्योहार खुशियां बांटने को बने हैं। ऐसे कि ये बढ़ी हुई खुशियाँ अगले त्योहार तक हमारे ऊर्जा में ईंधन का कार्य करें।

जो पटाखों पर ज़िद लेकर अड़े रहते हैं, उन्हें ये समझना होगा कि दीवाली पटाखों भर नहीं है, ना ही हमारे पटाखे न उड़ाने से हिन्दू धर्म पर कोई आंच आ जाएगी। यहाँ आपको गाँवो से सीखनी चाहिए, दीवाली खुशियां बाँटने और जीवन को प्रकाशित करने का पर्व है। बाजार से संचालित होने का नही।

एक-एक पटाखे से कितना धुआँ निकलता है! कल रात ही दिल्ली के सड़कों पर सांस लेना मुश्किल था। आप रायचंदों और ज्ञानचंदों को कोस सकते हैं लेकिन ध्यान रखिएगा कि प्रदूषित धुंआ आपके नाक में आने से पहले आपका पंथ नहीं पूछेगा!

कल चलते-चलते अपने एक प्रोफेसर से बात करते हुए मैंने पूछ लिया, ‘सर! घर नहीं जा रहें क्या आप?’

‘नही।’

‘छठ में भी नहीं जाएंगे क्या?’

बाकी बातों के बाद उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही, ‘एक बार जब घर से निकल गए, तो यहीं घर है, यहीं रहना है, यहीं काम करना है, तो यहीं छठ है, यहीं सबकुछ है।’

मैंने कहा, ‘ठीक ही कह रहे हैं सर… इसी कारण तो लोग रिटायरमेंट के बाद भी नहीं लौट पाते।’

व्यस्तताओं के मध्य ये वो वक़्त होता है जब आप त्योहारों के लिए भी वक़्त नहीं निकाल पातें। बदली हुई प्राथमिकताएं हमें ऐसा नहीं करने देती हैं। फिर हम एचपी के एड जैसे वीडियो देखकर ही खुश हो लेते हैं।

ठीक भी है। जब हम झालर लगाते हैं, तो वो खूबसूरत तो लगते हैं। मगर हमारे घर-जीवन की खूबसूरती और चमक को अपने चकाचौंध से ढक लेते हैं। दीये की खूबसूरती अलग होती है, वो आपकी चमक को उभारकर रोशन करती है। इस बुनियादी अंतर को आज रात देखने की कोशिश करिएगा… फिर आप दीये से किसी की दीवाली बनाएंगे वो अलग!

मगर खुशियां बटोरने-बाँटने में भी अगर आप हिसाब-किताब लगाने लगे तब तो हो गया त्योहार। फिर वही सच है जो मैं सर से नहीं कह पाया… हम तो रिटायरमेंट तक इंतज़ार करने से रहें… जैसे ही मौका मिलेगा निकल लेंगे यहाँ से… साफ हवाओं में, दीपों और पकवानों, पकौड़ियों के बीच अपनी दीवाली ढूंढने… जीवन जीने…

आपको दीपावली की शुभकामनाएं!

कष्ट उठाकर भी अपनी परंपराओं को सुरक्षित रखिए

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