कष्ट उठाकर भी अपनी परंपराओं को सुरक्षित रखिए

हम उत्सवधर्मी समाज हैं. हमारे सभी पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के जश्न हैं. जन-जन में जो सुंदर है, शुभ है, साहस है, संकल्प है उन्हें लोक-स्मृतियों में सँजोकर रखने के लिए ही अलग-अलग संस्कृतियों ने अपने-अपने ढंग से प्रयास किए हैं; भारतीय ऋषियों-मनीषियों ने भी इन गौरवशाली स्मृतियों को लोक-मानस में उतारने और उन्हें जीवंत बनाए रखने के लिए पर्व-त्योहारों का अनूठा विधान रचा है और उसे परंपराओं के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है.

सच मानिए तो ये परंपराएँ हैं तो हम हैं. परंपराओं के बिना पीढ़ियाँ अपनी संस्कृति और इतिहास से कट जाती हैं. हम यदि इतने प्राचीन काल से पर्व-त्योहारों, जीवन-मूल्यों, सामाजिक मान्यताओं रूपी धरोहरों को विरासत के रूप में सँभाले-सहेजे आ रहे हैं तो इनके पीछे ये परंपराएँ ही मुख्य आधार रही हैं.

इसलिए किसी के कहने मात्र से अपनी परंपराएँ न छोड़ें, किसी के आदेश से, निर्देश से, दिव्य ज्ञान से, प्रवचन से, हम अपनी परंपराओं से मुँह मोड़ लेंगे तो हम… हम न रहेंगें; भारत… भारत न रहेगा..!

आज तमाम शक्तियाँ रूप बदल-बदलकर हम पर हमलावर हैं; वे हमारी-आपकी पहचान और उसके मूल उत्स को नष्ट करना चाहती हैं; उन्हें समझिए, पहचानिए, चिह्नित कीजिए, पर उनके झाँसे में मत आइए.

सच्चाई तो यह है कि हमारी परंपराएँ गतिशील रही हैं, ठहरी हुई नहीं हैं, जड़ या मृत नहीं हैं; परंपराओं और रूढ़ियों में बुनियादी अंतर होता है; रूढ़ियाँ जड़ होती हैं, काल-विशेष में किन्हीं आपातकालीन परिस्थितियों के कारण पनपती हैं और संकट के बादल छँटते ही समाज अपनी सामूहिक अंतर्चेतना के बल पर स्वतः ही रूढ़ियों के उन केंचुलों को उतार फेंकता है; पर परंपराओं पर यह बात लागू नहीं होती, वे छनकर-छनकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं, उसमें प्रक्षालन की स्वाभाविक क्षमता होती है.

जिस संस्कृति में स्पेस और स्मृतियाँ अंतर्गुंफित रहती हैं, उसकी जड़ें कभी नहीं सूखतीं. भारत की संस्कृति में, परंपराओं में यह तत्व समाया हुआ है. यहाँ किसी जंगल से गुज़रते हुए, किसी पहाड़ पर चढ़ते हुए आपके समक्ष तमाम ऐतिहासिक-पौराणिक चरित्र उभरने लगते हैं; फिर आप ‘मैं’ नहीं रहते, ‘हम’ बन जाते हैं, और जब तक ”मैं” से ”हम” तक की यह यात्रा ज़ारी हैं, हमारी सामूहिकता सुरक्षित है, उत्सवधर्मिता सुरक्षित है, हमारी अस्मिता और अस्तित्व सुरक्षित है.

इसीलिए कष्ट उठाकर भी अपनी परंपराओं को सुरक्षित रखिए, आगे बढ़ाइए, याद रखिए ये परंपराएँ हमारे सामूहिक जीवन के लिए प्राणवायु की तरह हैं….

पुनश्च,आपको और आपके समस्त परिजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ………

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