चीन का बाज़ार बना भारत : व्यापारी, उत्पादक और जनता का भी है दोष

आज एक मुस्लिम ग्रुप में एक मोदी द्वेषी हरेजन ने विषवमन किया कि “मोदी सरकार भारत को चीन के माल की सबसे बड़ी मार्किट बना रही है अंड शंट भक्त चिल्ला रहे हैं चाइना का माल मत खरीदना। लेकिन बहुत लाइटिंग तो चाइना के माल से ही हुई है दीपावली पर।”

वैसे यह कहनेवाले ये भाईजान अकेले नहीं, यह एक लगभग कट पेस्ट टिप्पणी है। सच भी है कि लगभग हर प्रॉडक्ट चाइना से आ रहा है। लेकिन इसके वास्तव में कोई जाता भी है? आइये ज़रा देखें सच्चाई क्या है और कब से है।

अपना देश चाइना का मार्केट कब का बन चुका है जिसका दोष देना हो तो देश के व्यापारी, उत्पादक और जनता को भी देना होगा। वैसे बात केवल भारत की नहीं, जहां देखें यही बात लागू हो जाती है। अमेरिका भी इससे अछूता नहीं है।

वैसे इस रोग की शुरुआत अमेरिका से हुई, जिसका दोष वहाँ के लेफ़्टिस्टों को जाएगा। गरीबों के हक़, मजदूरों का शोषण आदि नामों से उन्होने वहाँ जो भी आंदोलन चलाये, वहाँ उत्पादन करना तो छोड़िए, ऐसे ऐसे नियम और कानून बनाए कि कोई भी धंधा करना ही महंगा हो गया। लेकिन इसके पीछे लेफ्ट और चाइना का गठबंधन लोग समझ नहीं पा रहे थे और लेफ्ट संचालित मीडिया तो बताने से रहा।

यहाँ लोग महंगे उत्पादन खर्चों से कलप रहे थे और वहाँ से चाइना वही प्रॉडक्ट को सस्ते में बनाने की ऑफर लेकर आ गया। बिलकुल वही का वही प्रॉडक्ट, दर्जे से कोई समझौता नहीं। और कीमत कल्पना से कम। बस अपना ही डिज़ाइन दे दो, अपने ही स्पेसिफिकेशन से बहुत सस्ते में बनवा लो और अपने लेबल लगाकर बहुत मुनाफा कमा कर बेचो।

फ़ैक्टरी, मज़दूर, यूनियन और दमघोंटू नियमों का टेंशन लेने की कोई जरूरत नहीं, चाइना में बनवाओ, बस एडवर्टाइज़िंग और मार्केटिंग पर खर्चा करो और पहले से ज़्यादह बेचो, पहले से ज्यादह कमाओ!

लॉन्ग टर्म में देश को अपने मुनाफा या नुकसान से क्या असर पड़ेगा, यह पता नहीं कितने बिज़नसमैन सोच पाते होंगे। कौआ सभी जगह काला ही होता है, अमेरिकन बिज़नसमैन हुआ तो क्या हुआ, बिज़नसमैन को अपने मुनाफे से लेनादेना है, वो तो यही तर्क देगा कि अगर मेरा धंधा डूबेगा तो देश या देश की सरकार मुझे कुछ नहीं देगी तो मैं क्या और कितना सोचूँ? टैक्स तो दे रहा हूँ ना? इससे अधिक सोचने को टैम नै अपुन के पास!

और किसी को यह भी सोचने की इच्छा नहीं थी कि अपने जैसा ही एडवांस्ड प्रॉडक्ट बनाने की क्षमता चाइना में कैसे और कब आई, और क्या अपने यहाँ प्रोडक्टस का महंगा हो जाना और चाइना उसी समय सस्ते प्रॉडक्ट ले आना – कहाँ तक संयोग है?

नहीं, ये सब कौन सोचे, फिलहाल तो यही देखना है कि चाइना का आदमी अपने कॉम्पटिटर के पास भी जानेवाला ही है तो सालों से बनाया और अब डांवाडोल मार्केट शेयर बनाए रखना है तो चाइना का माल लेकर अपने नाम से उतारना ही होगा।

धीरे धीरे अमेरिकन उद्योगों का आउटसोर्सिंग होने लगा और मजदूर बेरोज़गार हो कर बेरोज़गार भत्ता लेने लगे। अमेरिकन सरकार दे सकती थी इसलिए इतना टेंशन नहीं आ रहा था।

सॉफ्टवेयर के जॉब्स भारत या अन्य देशों में आने लगे। आईटी वाले का जॉब चला जाना इसके लिए भारत को ही दोषी माना जाने लगा और जॉब चले जाने के लिए मुहावरा ही आ गया – I have been Bengalored.

लोग चिल्लाये चिल्लाये और झल्लाए और चुप रह गए क्योंकि कोई ध्यान नहीं दे रहा था, फिर चिल्लाने वाले भी एडजस्ट होकर जीने लगे। फिर आ गया रिसेशन (मंदी) और उसने सब की बैंड बाजा दी क्योंकि इतने लोग बेरोजगार हो गए कि सरकार से संभाले नहीं संभल रहा था।

रिसेशन से हैरान अमेरिका को लुभावने वादों के साथ लुभाने आ गए ओबामा लेकिन वे भी अपनी वेल्फेयर नीतियों के कारण अमेरिका को मामा बनाकर ही निकल लिए। लैटिन अमेरिकन देशों से उन्होने जो अवैध इमिग्रंट्स को ले कर ढील दी थी उससे काफी नुकसान हुआ ही है। ऊपर से खुद को काम के लिए ईसाई घोषित कर के अमेरिका में जो मुस्लिम हित बढ़ाने का काम किया है उस सबका कचरा साफ करने का जिम्मा ट्रम्प पर आया है।

अपने यहाँ भी यही कहानी रही, और करेला नीम चढ़ा कहने के हिसाब से तो अपने यहां के बिज़नसमैन का मुनाफा प्रेम ही सर्वोपरि रहता है। “राष्ट्र सर्वोपरि” की भावना से अधिक उसका इंटरेस्ट उसके अलग अलग आकार के स्टिकर बनाकर बेचने में रहेगा।

नियम कानून में लेफ़्टिस्टों ने अपने यहाँ के बिज़नस की भी दुर्गति कर दी, उनके लिए तो चाइना बिलकुल भगवान का भेजा फरिश्ता लगा। ये उनको कभी खयाल भी न आया होगा कि समस्या का कारण भी वही चाइना था।

धड़ल्ले से चीनी समान आने लगा, और उत्पादन ठप्प होकर केवल व्यापार बढ़ने लगा। भारत के वामियों ने मुसलमानों के साथ मिलकर भारत की, खास कर हिंदुओं की आर्थिकी का जो नुकसान किया है जिसके लिए इतिहास उन्हें माफ करे न करें, हिंदुओं को तो उन्हें कतई माफ नहीं करना चाहिए, लेकिन आत्मभान भूले इस प्रजा का क्या कहना !

कोई स्वाभिमानी प्रजा होती, तो परिस्थिति कुछ और कर देती जैसे बुआजी को मूंछें होती तो उन्हें फूफाजी कहते।

जय हिन्द!

गैरों पे करम, अपनों पे सितम – चीनी चकाचौंध की सच्चाई!

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