अभिजात्य का अहंकार और पत्रकारिता की गिरती विश्वसनीयता

अभी हाल के दौर तक ‘जनसत्ता’ जैसे अख़बार किस पक्ष से छापते थे, ये सब जानते हैं। उस अख़बार का कोई हिन्दी पत्रकार जब अयोध्या जी के बारे में लिखेगा तो किस पक्ष से लिखेगा, ये अंदाज़ लगाना भी मुश्किल नहीं।

ऐसे में तथाकथित बड़े लेखक जब कहते हैं कि “अंग्रेज़ी वाले हिन्दी वालों को दबा रहे हैं जी”, तो विक्टिम कार्ड भी साफ़ दिख जाता है।

बात यहीं ख़त्म हो जाती तो और बात थी। उनका लेख व्यक्तिगत आक्षेपों का पुलिंदा है जिसे देखकर अनायास ही नाज़ी गोएब्बेल्स का सिद्धांत याद आ जाता है, जो कहता है – विरोधी को सिरे से ख़ारिज करो, उसके तर्कों को तर्क मानो ही मत!

अभिजात्य का अहंकार

शुरूआती हिस्से में लेखक महोदय बताते हैं, “किसी पत्रकार या लेखक की आलोचना का सहारा लेती, जो उनकी गंभीरता समझ में भी आती, लेकिन सोशल मीडिया के एक ऐसे व्यक्ति के कंधे का उन्होंने सहारा लिया, जो न तो कोई साहित्यकार है और न ही पत्रकार, बस एक आम रिव्यूअर है, जिसने अमेजन पर किताब की समीक्षा से ज्यादा हेमंत शर्मा पर हमला किया है, जो दर्शाता है कि उसकी रूचि किताब की आलोचना में कम हेमंत की निंदा में ज्यादा है।”

यहाँ अभिजात्य का अहंकार साफ़ नजर आता है। पत्रकारिता की गिरती विश्वसनीयता का एक कारण ये भी है कि जनतंत्र के चार खम्भों में से एक, जनता को अपने से नीचा मानता है।

ये आश्चर्य का ही विषय है कि अपने काम के लिए, अपनी किताब के प्रचार के लिए, अपनी बात लोगों के सामने लाने के लिए रोज सोशल मीडिया का सहारा लेने वालों को भी सोशल मीडिया पर लिखने वाले अपने से ओछे लगते हैं।

यहाँ भी वो रिव्यु में उठाये गए सवालों का जवाब नहीं देते। उनकी रूचि गोएबल्स रीति से आरोप मढ़ने में ज्यादा है, रिव्यु में उठाये गए सवालों का जवाब देना उनके लिए मुमकिन भी नहीं था। अगर अयोध्या पर लिखने वाला कोई हैंस बेक्कर की किताब से सन्दर्भ क्यों नहीं ले रहा और डेनिअल ऐक की किताब जो बनारस पर लिखी गयी है, उससे पढ़कर अयोध्या पर क्या लिख रहा है ये कोई बताएगा भी कैसे?

निजी खुन्नस या परिचय?

जब लेखक महोदय कहते हैं कि अदना से रिव्युअर की शायद किताब के लेखक से कोई निजी खुन्नस होगी तो अनायास ही ध्यान उनके निजी वेबसाइट पर प्रकाशित लेख के अंतिम हिस्से पर जाता है। यहाँ वो बताते हैं, “पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने दोनों पक्षों में बातचीत के लिए कई सारी कमेटियां बनाई थीं, उनमें से एक कमेटी में प्रभाष जोशी और रामबहादुर राय जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी थे। हेमंत, प्रभाष जोशी के कारण उन कमेटियों की बैठकों के इनसाइडर गवाह रहे हैं।”

यहाँ जिस रामबहादुर राय का जिक्र है वो लेखक महोदय की किताब की प्रस्तावना लिखते हुए भी दिख जाते हैं। निजी परिचय किसका और किसके जरिये रहा है, ये अब इस स्वीकारोक्ति के बाद कोई छुपी हुई बात नहीं रह जाती।

सन्दर्भों से परे हटाई गयी बात

गौरतलब है कि अदना से रिव्युअर (जिसकी अमेज़न पर रैंकिंग टॉप #100 में आती है), ने अपने पूरे रिव्यु (सिरे से ख़ारिज किए जाने लायक किताब ‘युद्ध में अयोध्या’) में सिर्फ सन्दर्भों (रेफरेंस) की बात की है। इनके बारे में एक भी शब्द कहने से लेखक महोदय का बचना भी ये दर्शाता है कि उनके पास चोरी के आरोपों से अपने परिचित अभिजात्य को बचाने के लिए कोई तर्क थे ही नहीं।

जिस किताब को वो पत्रकारिता और प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक लिखा गया बताते हैं उसमें एलेग्जेंडर कन्निन्ग्हम की ‘एनशिएंट जियोग्राफी ऑफ़ इंडिया’, या विलियम फोस्टर की ‘अर्ली ट्रेवल्स इन इंडिया 1583-1619’ से कौन से सन्दर्भ लिए गए हैं, इसपर लेखक महोदय टिप्पणी करने में नाकाम रह जाते हैं।

इसके अलावा लेखक की अभिजात्य बिरादरी के परिचित (?) शार्की वास्तुकला पर लिखी गयी ए. फ्यूहरर की किताब का सन्दर्भ देते हैं। जैसा कि अमेज़न रिव्यु में ‘अदना से फेसबुकिया’ ने बताया भी है ‘युद्ध में अयोध्या’ के लेखक ने मंदिरों की वास्तुकला पर भी पूरी किताब में कोई बात नहीं की है।

शायद उनके अभिजात्य लेखन जगत के धुरंधर इस बात पर भी प्रकाश डाल पायें कि पत्रकारिता के दृष्टिकोण से लिखी गयी किताब में बी. आर. मणि की ‘द जोनर ऑफ़ सर्कुलर टेम्पल्स इन नॉर्थ इंडिया’ से क्या लिया गया है। अगर किताब पत्रकारिता के ही सिद्धांतों पर आधारित थी तो लेखक ये नहीं बताते कि घटना के समय वो निजी तौर पर क्या सोच रहे थे। लेखक साधारण बातें भी भूल बैठे हैं।

मौलिकता का प्रश्न

अनातोले फ्रांस की ‘थाया’ से अभिप्रेरित ‘अहंकार’ जैसे उपन्यास खुद मुंशी प्रेमचंद ने भी लिखे हैं। एक विदेशी भाषा से लेकर किसी दूसरी भारतीय भाषा में किताब लिख देने पर साहित्यिक चोरी को पकड़ना इसलिए मुश्किल होता है क्योंकि दो-तीन भाषाओँ में कम ही लोग पढ़ते हैं। ऐसे में प्रेमचंद तो चुप्पी साध सकते थे, लेकिन उनकी नैतिकता कि उन्होंने ऐसा करने की बात सोची भी नहीं।

कथेतर में ऐसा करने पर ‘मौलिकता’ किताब के अंत के सन्दर्भों से साफ़ पकड़ी जाती है। सन्दर्भों को या अनुवाद को स्पष्ट स्वीकार करने के बदले आम जनता के रिव्यु के लिए गिरोहों को उतारना ‘मौलिकता’ ही नहीं ‘विश्वसनीयता’ और ‘नैतिकता’ पर भी कई सवाल खड़े कर देता है। हिन्दी पत्रकारिता के गिरते स्तर को एक पायदान और नीचे ले जाने की लेखक महोदय को बधाई दी जानी चाहिए।

विक्टिम कार्ड खेलने से परहेज़ करिए, रहता है अपने ही पक्ष को चोट पहुंचने का खतरा

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