लेकिन अभी काम बहुत सा बाकी ही है, और प्रतीक्षारत हैं राम

“मोरे राम के भीजे मुकुटवा
लछिमन के पटुकवा
मोरी सीता के भीजै सेनुरवा
त राम घर लौटहिं।”

(भावार्थ – मेरे राम का मुकुट भीग रहा होगा, मेरे लखन का पटुका (दुपट्‍टा) भीग रहा होगा, मेरी सीता की माँग का सिंदूर भीग रहा होगा, मेरे राम घर लौट आते।)

अपने एक लेख में विद्यानिवास मिश्र ये भजन/ लोकगीत लिखते हैं। (विद्यानिवास मिश्र का लेख यहाँ पढ़ सकते हैं – मेरे राम का मुकुट भीग रहा है)

लेख लिखते समय की स्थिति कुछ ऐसी थी कि उनके सुपुत्र अपनी कृष्णा नाम की अतिथि के साथ किसी संगीत के कार्यक्रम में गए थे। ये मोबाइल और इन्टरनेट का दौर नहीं था। लाइसेंस-परमिट राज में सबके पास कार-स्कूटर जैसे वाहन भी नहीं होते थे।

घर पर बेटे और उस अतिथि लड़की की प्रतीक्षा करते लेखक और उनकी पत्नी चिंतित हो रहे थे। बारह बजे तक लौट आने की कह गए दोनों लोग जब समय पर नहीं लौटे तो मिश्र अपनी पत्नी को ये कहकर सुला देते हैं कि संगीत में समय का अक्सर पता नहीं चलता।

वो खुद प्रतीक्षा में ऊपर की मंजिल पर बैठे होते हैं और हर आहट पर सोचते हैं कि शायद वही लोग आये। संगीत में मन भीगता होगा सोचते हुए वो ये भी सोचने लगते हैं कि लाखों-करोड़ों कौशल्याओं के राम घर नहीं आये।

बिहार की दस-बारह करोड़ की आबादी में करीब तीन करोड़ प्रवासी हैं, मेरे लिए ये अलंकार समझना मुश्किल नहीं था। किसी के घर जाने पर अक्सर तस्वीरों से परिचय करवाया जाता है। कोई बड़ा बेटा है जो बंगलौर की किसी बड़ी कम्पनी में है, कोई कतर गए दामाद जी के साथ गयी हुई बेटी-नाती की तस्वीर है। दीपावली-छठ के दौर में बिहार को आती कोई ट्रेन देख लीजिये, कई कौशल्याओं के राम घर नहीं लौटे।

गीत में राम के भीगने की बात भी नहीं, उनके मुकुट के भीगने की बात होती है। लक्ष्मण नहीं, उनका पटुका- दुपट्‍टा और सीता भी नहीं उनका सिन्दूर भीगता है। हमारे ख़याल से वन में राम मुकुट तो नहीं धारण करते होंगे।

फिर मुझे अंग्रेजी की ‘अनईज़ी लाइज़ द हेड देट वेअर्स अ क्राउन’ याद आता है। मुकुट जिम्मेदारियों के बोझ का भी प्रतीक है। तभी रामनवमी से पहले राम का मुकुट पूजा जाता है।

सुरक्षा-सुविधा के लिए नियुक्त लक्ष्मण का भी दुपट्टा भीगता है। विवाह से जुड़े कर्तव्यों का प्रतीक, सीता का सिन्दूर भी भीगता है। कौशल्या इसलिए चिंतित नहीं कि उसके राम भीगेंगे, वो कठिन परिस्थिति में कर्तव्य तो नहीं भूल गए, ये कौशल्या की चिंता है!

कहते हैं कि दीपावली शुरू ही इसलिए हुई क्योंकि इस दिन राम लौटकर अयोध्या आये थे। शबरी की प्रसिद्ध सी कहानी में बताते हैं कि कहीं बेर खट्टे न हों, इसलिए वो सारे बेर चखकर लायी थी।

कहते हैं कि सरस्वती कहलाने वाले ब्रह्मचारियों को अच्छी सुगंध तो मिलती है, दुर्गन्ध उनतक पहुँच ही नहीं पाती! अवतार को भला खट्टा क्या लगता? उनके छू देने से बेर मीठे नहीं हो जाते? भक्त का भाव था, अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।

बदले हुए नामों से कहीं लौटने में दिक्कत न हो इसलिए अयोध्या का नाम फिर से अयोध्या ही कर दिया है। अवतार को दिक्कत क्या होती? भक्त का कर्तव्यभाव ही था।

राज्याभिषेक के बदले जब राम चले जाते हैं, उसके लिए कहा गया है, ‘घर मसान परिजन जनु भूता, सुत हित मीत मनहुँ जमदूता। वागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं, सरित सरोवर देखि न जाहीं।’

यानि, घर मसान हो गया है, अपने ही लोग भूत-प्रेत बन गए हैं, पेड़ सूख गए हैं, लताएँ कुम्हला गई हैं। नदियों और सरोवरों को देखना भी दुस्सह हो गया है।

केवल इसलिए कि जिसका ऐश्वर्य से अभिषेक हो रहा था, वह निर्वासित हो गया। ऐसा कोई लौटता हो तो तैयारियां कैसी होंगी? भारत का हर घर दीपावली में वैसी ही तैयारियां करता है। वन्दनवार सज जाते हैं, रंग-रोगन और सफाई होती है, अल्पना-रंगोली बनती है।

अयोध्या की तरह तीन लाख दीपों का कीर्तिमान बने न बने, यथासंभव रौशनी भी कर दी जाती है। इतने सब के बाद भी लगता है, अभी कोई काम तो हुआ ही नहीं! आने का समय हो गया और सब अधूरा-बिखरा ही पड़ा है!

सरयू तट पर दीप जलाकर पीछे मुड़ते ही दिखता है कि मंदिर तो बना ही नहीं। कोई पूछता है कि जो आ गए तो ठहरेंगे कहाँ? हम ‘राम ह्रदय में बसते हैं’ कहकर फुसला लेते हैं।

दीपावली कि तिथि अमावस्या की अँधेरी रात की ही होती है। दीप जलते हैं तो कम से कम उतना अँधेरा नहीं होगा लेकिन अभी काम बहुत सा बाकी ही है और राम प्रतीक्षारत हैं।

हमें भी जानना था कि ‘किस ओर राम मुड़े होंगे, बारिश से बचने के लिए? किस ओर? किस ओर?’ मोरे राम के भीजे मुकुटवा, और यहाँ दीपावली की तैयारियां हैं जो पूरी ही नहीं हो रहीं!

दीपावली की शुभकामनाओं सहित!

शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे

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