विक्टिम कार्ड खेलने से परहेज़ करिए, रहता है अपने ही पक्ष को चोट पहुंचने का खतरा

विक्टिम कार्ड राजनैतिक प्रोपोगेन्डा का एक जाना पहचाना सा शब्द है। हाल में ही एक भूतपूर्व उपराष्ट्रपति इसका इस्तेमाल करते हुए दिखे थे और उन्होंने कहा था कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है।

इस बयान की चौतरफा “कड़ी निंदा” हुई लेकिन विक्टिम कार्ड चल चुका था। ये इतना जाना माना और पहचाना सा है कि इसे परिभाषित करने की भी जरूरत नहीं पड़ती।

नेहरु के ट्रिकल डाउन इफ़ेक्ट जैसा ही ये ऊँचे राजनैतिक पायदानों से खिसककर, अब अक्सर राजनीतिज्ञों से मिलने जुलने वाले आम लोगों में भी इस्तेमाल होता हुआ नजर आ जाता है।

हालिया राजनैतिक इतिहास में देखेंगे तो कांग्रेस इसका इस्तेमाल इंदिरा गाँधी के दौर में करती हुई दिख जाएगी। जनता सरकार के दौर में इंदिरा गांधी को राजनैतिक द्वेष की शिकार अकेली महिला (विक्टिम) के तौर पर पेश किया गया और अगले ही चुनाव में इंदिरा जीत गयीं।

इंदिरा गाँधी की मौत के वक्त भी फिर से विक्टिम कार्ड चला था। नतीजा ये हुआ था कि राजनीति से दूर रहने वाले राजीव गांधी की सरकार बन गयी।

पहले मामले में इंदिरा पर मुकदमा चलना उचित था क्योंकि उन्होंने देश पर इमरजेंसी थोपी थी। हत्या भी इसलिए हुई थी क्योंकि भिंडरावाले जैसे आतंकियों को उसने ही बढ़ावा दिया था।

पहले मामले में इमरजेंसी के अत्याचारों को छुपाने में और दूसरे मामले में सिक्ख अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा देने के मामले से इंदिरा गाँधी और कांग्रेस, विक्टिम कार्ड खेलकर साफ़ बरी हो गयी थी।

यही विक्टिम कार्ड एक बार फिर तब चला जब राजीव गाँधी की हत्या हो गयी थी। तमिल आतंकवाद का जो नतीजा राजीव गाँधी को झेलना पड़ा था उसमें उनके दौर की सरकार का भी दोष था, लेकिन विक्टिम कार्ड ने एक बार फिर से कांग्रेस की जीत पक्की कर दी थी।

हाल के दौर में दूसरे राजनैतिक दल भी इसी विक्टिम कार्ड का छोटे पैमाने पर इस्तेमाल सीखते दिखे होंगे।

हाल ही में एक नेत्री ने गलत तरीके से एक पासपोर्ट जारी करवाया और पासपोर्ट जारी करने से पहले उचित सवाल पूछने वाले अफसर को दण्डित भी किया था। जब सोशल मीडिया पर उनसे सवाल किये गए तो वीज़ा माता ने फ़ौरन विक्टिम कार्ड निकाला और कहने लगी कि ट्रोल मुझे महिला देखकर परेशान कर रहे हैं!

इससे पिछली बार इसी नेत्री ने तब सर मुंडवा लेने की बात की थी जब कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गाँधी के भारत का प्रधानमंत्री बन जाने की संभावना थी। विक्टिम कार्ड चल पाता इससे पहले ही सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री पद का दावा छोड़ दिया और खुद कुर्बानी देने वाली बलिदानी बन गयी। नयी खिलाड़ी का विक्टिम कार्ड पुराने अनुभवी कांग्रेसियों के सामने चल नहीं पाया।

हिन्दी फिल्मों में विशेष तौर पर गानों का (पोस्टर का भी) किसी विदेशी गाने से ‘प्रेरित’ होना कोई बड़ी बात नहीं। अनु मलिक जैसे ही नहीं, कई पुराने संगीतकार भी ऐसी ‘प्रेरणा’ लेते रहे हैं।

साहित्य में भी लोगों ने प्रेरणा ली है। जैसे हमें हाल में पता चला है कि प्रेमचंद ने जिस फ़्रांसिसी किताब ‘थाया’ पर आधारित ‘अहंकार’ लिखी थी, भगवतीचरण वर्मा की ‘चित्रलेखा’ भी उसी पर आधारित मानी जाती है।

किस्मत से ये हिन्दी का वो दौर था जब लेखक लिखते थे, चोरी नहीं करते थे। इस वजह से ये लोग अपनी प्रेरणा के स्रोत को सीधा-सीधा स्वीकारते रहे। प्रेरणा के बावजूद ये किताबें काफी अलग भी रहीं, सीधा अनुवाद नहीं थीं।

अभी हाल के दौर तक ‘जनसत्ता’ जैसे अख़बार किस पक्ष से छापते थे, ये सब जानते हैं। उस अख़बार का कोई हिन्दी पत्रकार जब अयोध्या जी के बारे में लिखेगा तो किस पक्ष से लिखेगा, ये अंदाज़ लगाना भी मुश्किल नहीं।

पत्रकारिता की विश्वसनीयता कम होते जाने पर भी यदा-कदा चर्चा होती रहती है। ऐसे में लोग जब कहते हैं कि “अंग्रेज़ी वाले हिन्दी वालों को दबा रहे हैं जी”, तो विक्टिम कार्ड भी साफ़ दिख जाता है। विक्टिम कार्ड खेलने से परहेज़ रखना चाहिए। वामी प्रोपोगेन्डा के विक्टिम कार्ड जैसे औज़ार चलाने में अपने ही पक्ष को चोट पहुंचा देने का खतरा रहता है।

सिरे से खारिज किये जाने लायक किताब ‘युद्ध में अयोध्या’

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