सनातन धर्मियों का आत्मघाती विवेक

कभी एक अंग्रेज़ी चुटकुला सुना था कि किसी किशोर ने अपने माता पिता की हत्या करके कोर्ट में जज से अपील की, कि दंड निर्धारण करते समय उसके लिए दया का भाव रखा जाए क्योंकि वह नाबालिग है और अनाथ भी।

शायद सदाशयता के शिकार सनातनियों के लिए ये बताना ज़रूरी होगा कि जज, किशोर और उसके माता पिता कौन हैं, पर उनका मस्तिष्क अब तक उन्हें बता चुका होगा कि जज है सनातनियों का स्वविवेक, माता पिता हैं स्वयं सनातन धर्म और किशोर है…! रिक्त स्थान की पूर्ति करें।

पर उस किशोर का वकील कौन रहा होगा कभी सोचा है… बिलकुल सही… लॉक कर दें क्योंकि यह एक, पाँच या दस नहीं पूरे 33 करोड़ का सवाल है, 130 करोड़ का सवाल है, आर्यावर्त का सवाल है और अब तो लगता है पूरे 600 करोड़ का मामला है, इस विश्व का सवाल है।

यह वकील लहज़ा रखता है कबीर का, सिलेबस पढ़ता है मैकॉले का, सबूत दिखा रहा है मार्क्स की रचित पंक्तियों का, सपना दिखाता है समता मूलक समाज का, समर्थन करता है नक्सलियों का, टूटी हुई इमारतों पर सियापा करने वालों का, ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोधियों का, कश्मीर दार्जिलिंग नगालैंड मिज़ोरम के अलगाववादी समूहों का…

…और हमला करता है सनातन धर्म के प्रतिमानों पर, खिल्ली उड़ाता है परंपराओं और संस्कारों का, मिटाना चाहता है सनातन के आस्था केन्द्रों को, परंतु स्थापना करना चाहता है मस्जिदों की और चर्चों की।

इस वकील को घूँघट दकियानूसी दिखता है पर नकाब और बुरका प्रगतिशीलता का परचम, एडम्स ब्रिज सच लगता है पर राम सेतु सपना, अनदेखे गॉड की सत्यता पर कोई शक नहीं होता है पर राम की सच्चाई पर अदालती मुहर चाहिए…

कुछ हिन्दू समुदायों में बाल विवाह पर छाती कूट सियापा, पर वहीं अरब देशों से आए बुजुर्ग का कमसिन बच्ची से शादी उनकी धार्मिक आस्था का निजी मामला बन जाता है, #me_too की गगनभेदी गर्जना नन के आरोप सुनकर पप्पा के लिए मेमने की मेंss मेंss बन जाती है, बच्ची के साथ कथित रूप से मंदिर में किए गए जघन्य अपराध पर बरसती आँखें उसी तरह के अपराध बहुसंख्यक समाज की बच्चियों के साथ हों तो तोताचश्म बन जाती हैं।

कश्मीर से लुप्त हो रहे पंडित, पड़ोसी देशों में घटती हुई हिंदू आबादी, शार्ली एब्दो के एक विवादास्पद कार्टून पर दर्जनों अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकारों की सामूहिक हत्या, एक प्रान्तीय सरकार के आदेश पर निहत्थे जनसमूह पर सरकारी गोलीबारी, गोधरा में रेल के डिब्बे में झुलसते जलते निरीह यात्री गण, थ्येन आन मन चौक पर लाल सलामियों की आधिकारिक गोलियों से छलनी होती आज़ादी की आवाज़ें आदि इस वकील के लिए बेमानी हैं क्योंकि इस ब्लड ग्रुप का खून इनके जी को भाता नहीं है…

…पर जब कहीं कोई $कबर, कोई $फजल, कोई $$मान, कोई धर्मांतरणोत्प्रेरक पप्पा खतरे में दिखता है तो इनकी बाँछें खिल जाती हैं, इनके अंदर की रुदाली जाग उठती है, हैश टैग का तूफान ट्विटर फेसबुक को घेरने को निकल पड़ता है, सहिष्णुता छटपटाने लगती है, बालीवुड के सितारे जमीन पर उतरकर दंगल करने लगते हैं, अवार्ड वगैर धनराशि के संवाददाता सम्मेलन में वापस होने के लिए तड़पने लगते हैं…

… मोमबत्तियों की बिक्री बढ़ जाती है, पर किसी गरीब के घर उजाला करने के लिए नहीं, बल्कि इंडिया गेट को रौशन करने के लिए, जजों की प्रेस कांन्फ्रेंस होने लगती है (पर जैसे ही एक को $$$ चुना जाता है, वह तबका सहिष्णुता की ऑफिशियल वापसी मान लेता है)।

ये तो था आँखो देखा हाल, पर अब आते हैं इस मुद्दे पर कि शीर्षक का संबंध क्या है इन गोल गोल घूमते कमेंटरी सिस्टम से… तो हाज़िर है जवाब।

ये वकील है… (ठीक कह रहे हैं आप) Secularism और इसका साम्यवादी हिंदी अनुवाद है धर्मनिरपेक्षता नहीं, सनातनेतर-धर्म-सापेक्षता या अहिन्दू-पापफल-निष्क्रियकरण-व्यवस्था। अंग्रेजी के शब्द सेक्यूलरिज़्म का भारतीय वाम विचारकों ने ऐसा शीलभंग किया है कि ऑक्सफोर्ड और चैम्बर की डिक्शनरी शरमा जाए और फादर कामिल बुल्के की आत्मा भी राँची विश्वविद्यालय छोड़ कर यूरोप लौट जाए।

तो इसका कारण क्या है, सनातन धर्मियों का स्वविवेक जो अनादि काल से हिंदू जनमानस के मन के अंतस्तल में प्रयाग की अंतःसलिला सरस्वती की भाँति सदैव प्रवाहित होता रहता है। और यही कारण है कि सनातन धर्म की रूढ़ियों का उपहास उड़ाने वालों में कबीर से लेकर कामरेडों तक हिंदू ही हिंदू हैं।

फेसबुकिया लाइक्स को छोड़ दिया जाए तो मुसलमान भाइयों का दिल आज भी मुस्लिम लीग के लिए धड़कता है और ओवैसी बंधुओं की तकरीरों पर तालियाँ बजाने को मचलता है, साथ ही उन पार्टियों को अपना मत देता है जो कम से कम हिंदू समाज की बुराई करें न करें पर उनके धार्मिक ज़रूरतों की या तो भर्त्सना करें या अनदेखी।

और ऐसे सारे दलों के पुरोधा हिंदू है जो अपने मर्यादित विवेक के कारण अपनों के हितों के ऊपर अन्य के हितों का पोषण करते हैं। वे भी मजबूर हैं, कभी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण, तो कभी सर्वधर्म समभाव के निहित पारिवारिक मूल्यों के कारण और अंततः अपने आत्मघाती विवेक के कारण।

दिनकर की पंक्तियाँ उन्हें याद नहीं रहतीं कि –

क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विपरीत सरल हो।।

यही आत्मघाती विवेक संविधान में भी झलकता है जिस पर किसी $$ ठाकुर या कर्नल को यकीन हो या न हो, पर कसाब और $$$ को ज़रूर होता है जिसमें एक भारत के टुकड़े कर रहा होता है तो दूसरा टुकड़े होने के नारे लगने का अनऑफिशियल साक्षी बनता है।

कृष्ण ने कहा है –

त्यजेदेकम् कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुल॔ त्यजेत्
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथ्वीम् त्यजेत्।।

अर्थात् अगर परिवार को बचाने के लिए एक व्यक्ति का त्याग किया जा सकता है, पूरे गाँव को बचाने के लिए एक कुल का त्याग उचित है और अगर एक ग्राम जनपद की प्रगति और रक्षा हेतु बाधक बने तो ग्राम का त्याग नीतिसंगत है और आत्मज्ञान में रुकावट हो तो इस धरा का त्याग भी श्रेयस्कर है।

विवेक की इस परिभाषा को भूलकर निजी पक्ष के प्रबलीकरण हेतु स्वविवेक का सहारा लेकर एक कुल को बचाते हुए जनपद का नाश करना आत्मघाती कदम नहीं तो और क्या है।

‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ राम का यह कथन राष्ट्रवाद का मूल है जो राष्ट्र रक्षा के लिए स्वविवेक के मनोनुकूल व्याख्या को एक सिरे नकारता है।

इस लिए हे आर्य, आपकी सदाशयता कायरता की मिसाल बन चुकी है। मित्र आपकी दया के पश्चात् प्रभाव से भयभीत हो चुके हैं और शत्रु दया से उत्पन्न सुविधाओं के मुरीद। पाकिस्तानी और अमरीकी जेलों की भयावहता की कथा ही अपराधी को सच्चरित्र बनाने के लिए काफी है, जबकि हमारी जेलों में सुविधाओं के चलते बेसहारा को भी सहारा मिल रहा है, जबकि माल्या और नीरव भारतीय जेल में पर्याप्त सुविधा न होने की वजह से विदेशी कोर्ट में भारत की प्रत्यर्पण याचिका ठुकरा चुके हैं।

अब आप खुद सोचें आपका यह विवेक आत्मघाती नहीं तो और क्या है?

उत्तिष्ठ भारत।

हिंदू कायरता के साइड इफेक्ट

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY