नकारात्मक छवि गढ़कर, अपनी राजनीति चमकाने वाले समुदायों का पीतल उघड़ गया

सत्याग्रह नामक एक समाचार पत्र ने राजपूतों की राजनीति पर एक आर्टिकल लिखा है। बड़ी होशियारी से नरेटिव सेट किया है, कि वे खलनायक भी बने रहे और कांग्रेस का चारा भी।

जब उनके लिंक पर जवाब देने की कोशिश की तो लिंक खुला ही नहीं। मेरे इस जवाब को कोई उन तक पहुंचा दीजिये।

जब भी किसी को राजनीति चमकानी होती है तो वह सबसे पहले अपने सामने एक मजबूत ‘खलनायक’ खड़ा करता है और उस पर प्रहार करता रहता है।

अमूमन सभी वामपंथी, जातिवादी और सेक्यूलर्स आज भी इस ट्रिक का प्रयोग करके आरएसएस पर हमला करते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसे बड़े से टक्कर लेकर वे भी बड़े बन जाएंगे।

आज़ादी से पहले कथित स्वतंत्रता सेनानी, जो कि वस्तुतः अंग्रेज़ों के पिट्ठू थे और गांधी की ओट में भावी शासक बनना चाहते थे, उन्होंने राजस्थान में राजा महाराजाओं को खलनायक के तौर पर रखा।

इनमें अधिकांश शहरी पढ़े लिखे यूरोपियन मानसिकता के लोग थे। दिखावे के लिए तो ये लोग अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे जबकि हकीकत में ये अंग्रेज़ों से ही सहायता प्राप्त कर रहे थे।

स्वतंत्रता मिलने के बाद इन्होंने भारतीय नेताओं वाला आवरण धारण किया। देश के सभी प्रमुख पदों पर काबिज़ हुए, दोनों हाथों से लूटा और सात पुश्तों के लिए अकूत धन अर्जित किया।

बाद में कई कथित ‘समाज सेवकों’ ने अपनी अपनी जाति को संगठित करने के लिए एक बार पुनः आम राजपूत को सामंत कहकर ज़बरदस्त खलनायक के तौर पर प्रचारित किया।

सामंत को सामंत कहने में तो कोई दिक्कत नहीं, मगर दूर दराज़ झौपड़े बनाकर, मेहनत मजूरी कर जैसे तैसे पेट भरने वाले सिंह उपनाम धारी सारे लोग घृणा के पात्र हो गए!

उन बेचारों को तो यह भी पता नहीं कि जिस सफेदपोश के लिए वे दिन रात खून जलाकर प्राण तक होम कर रहे हैं वह उन्हीं के नाम का उपयोग रावण की तरह करके खुद राम बना जा रहा है।

राम बनते बनते देश में रोमन साम्राज्य घुस गया पर राजपूत नाम धारी व्यक्ति की हालत दिनों दिन बद से बदतर होती गई।

कांग्रेस के राज करने की तो थीम ही एंटी राजपूत रही।

चुन चुन कर, सामान्य राजपूतों को जलील किया, उन्हें रोज़गार तक से वंचित कर दिया गया। उनकी परम्पराओं की खिल्ली उड़ा कर पाठ्यक्रमों और फिल्मों में उन्हें मुगलों, अंग्रेज़ों से भी वीभत्स और अत्याचारी दर्शाया गया।

मज़े की बात हरएक नया वर्ग और नेता मन से राजपूत बनना चाहता, उन्हीं नामों प्रतीकों का प्रयोग करता जिसे धकेल कर वे सत्तासीन हुए थे!

राजे महाराजे तो हवेलियों में होटल खोल कर काम चलाते रहे, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब राजपूतों की स्थिति दिनों दिन दयनीय होती गई। युवा कुंठित और हताश होने लगे।

बन्ना कहकर उनपर चुटकुले बनाये गए।

सर्वाधिक आत्महत्या की घटनाएं राजपूतों में होती हैं।

सबसे ज्यादा लाग, भेंट, दान देने का दबाव आज भी राजपूतों पर है।

विनोबा भावे ने बची खुची ज़मीन भी फुसलाकर ले ली।

कानून और संविधान के नाम पर सर्वाधिक शोषण राजपूतों का हुआ।

उनकी छवि विलेन वाली बनाकर रखी गई।

जितने भी जातीय नेता हैं, जब तक राजपूतों को गाली न दें, मंच से उनका भाषण पूरा हुआ नहीं माना जाता।

बीजेपी ने कुछ संतुलित रुख अपनाया और उन्हें सम्मान दिया।

जब यह लगा कि बीजेपी की तरफ राजपूतों का झुकाव ज्यादा है, मीडिया और सेक्यूलर्स बिरादरी द्वारा भड़काकर कुछ नकली नेताओं द्वारा नकली आंदोलन खड़े किये, एक बार फिर राजपूतों को खूनी डाकू बताने का षडयंत्र रचा गया, ताकि शेष जातियों को पुनः कांग्रेस की तरफ मोड़ा जा सके।

मगर अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है।

आखिर इसी भावनात्मक, भोले राजपूत समाज को बहकाकर पुनः अपनी तरफ खींचने, किंवा बीजेपी से दूर करने हेतु कथित स्वाभिमान जैसे दांव पेंच चले जा रहे हैं।

जो उधर गये वे भी पछता रहे हैं।

नियति को कुछ और ही मंजूर है।

लुभावने लोकतंत्र के नाम से देश के एक महान समाज को राष्ट्रीय विचार से दूर कर, उसे अलग थलग करने का जो पाप होने जा रहा था, राजपूत कभी उस झांसे में नहीं आने वाला।

आधी रोटी खाकर, गार्ड और चपरासी की नौकरी करके भी वह अपने संस्कार और उदारता, त्याग जैसे उच्च गुणों को बचाये हुए हैं।

वहीँ नकारात्मक छवि गढ़कर, अपनी राजनीति चमकाने वाले समुदायों का पीतल उघड़ गया और इस पाप कर्म में लिप्त कांग्रेस को नियति ने सबसे बुरी स्थिति में पटक दिया है।

वोट आपकी मर्ज़ी हो उसे देना, दिलवाना, मगर सत्य जो है वह छिप नहीं सकता।

हे मी लॉर्ड! सहने और प्रतीक्षा की भी एक हद होती है!

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