आपके मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हैं, आपकी सुरक्षा के लिए बने नियम

LSR (लेडी श्री राम) कॉलेज की लड़कियों के साथ हूँ, लेकिन परिस्थितियाँ बहुत खराब हैं। LSR की लड़कियों ने एक मुहिम चलाई है जिसमें वो हॉस्टल की टाइमिंग और बाकी बंदिशों को नकारना चाहती हैं।

ज़ाहिर सी बात है कि एक स्वतंत्र देश में, जहाँ समानता की बातें होती हों, लड़कियों को आगे बढ़ने को प्रेरित किया जाता हो, उनके लिए योजनाएँ चल रही हों, वहां हॉस्टल में टाइमिंग जैसी बंदिशें हास्यास्पद लगती हैं।

लेकिन क्या ये हास्यास्पद हैं? जब समाज साफ़ हो, लोग समझदार हों, और कानून व्यवस्था इतनी सही हो कि किसी भी तरह के असुरक्षित माहौल से लोग बचे रहें, तब इन बंदिशों को हटाना एक सही क़दम होगा।

कहने को आप मुझे नारीविरोधी, स्वतंत्रता के हनन के पक्षधर और कई विशेषणों से लाद सकते हैं, लेकिन उससे हमारा समाज रातोंरात सही नहीं हो जाएगा। ये कह देना कि सरकार या प्रशासन लड़कियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है तो कानून व्यवस्था सही करे, न कि लड़कियों को बाँधकर रखे, ये कुतर्क है।

कानून व्यवस्था चोरी और डकैती रोक सकती है, बलात्कार या मोलेस्टेशन नहीं। ये अपराध कम किए जा सकते हैं, वो भी एक लम्बे समय के दौरान। रातोंरात व्यवस्था नहीं सुधरती और खासकर सामाजिक अपराधों के मामले कम होने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

फ़्रीडम ज़रूरी है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को नकारना मूर्खता है। पुलिस या प्रशासन की ज़िम्मेदारी है आपको सुरक्षित रखना, और उसके लिए कुछ प्रावधान होंगे जो कि माहौल और अपराधों की गिनती को देखते हुए बनाए जाते हैं। जिस मोड़ पर बहुत सारी दुर्घटनाएँ होती हैं, वहां नई सड़क बनने तक ‘धीरे चलें’ का बोर्ड लगा दिया जाता है।

क्या इसे हम मौलिक अधिकारों का हनन कहेंगे या बचाव के लिए उठाया गया क़दम? इस मामले में नई सड़क बनने में काफी समय लगेगा। आज आंदोलन शुरु हुआ है, आने वाले समय में प्रशासन, माहौल सुधरने के बाद, बंदिशें हटा देगा। ये भी संभव है, इसलिए आंदोलन को मेरा समर्थन है। पुलिस बल ऐसे इलाकों में ज्यादा गश्त दे, कैमरे लगाए जाएँ और एहतियाती क़दम लिए जाएँ। लेकिन तब तक बचाव के रास्ते ही सही विकल्प हैं।

हर जगह ‘लड़के तो जाते हैं’ का तर्क नहीं चलेगा क्योंकि उनके ऊपर होने वाले अपराधों की संख्या बहुत कम है। आप ये भी नहीं कह सकतीं कि आप वयस्क हैं, तो आपको फ़्रीडम चाहिए। आपके साथ कुछ भी होता है तो कॉलेज प्रशासन की ही जिम्मेदारी होगी, आपकी नहीं। वयस्क हो जाने से आप ऑटोमेटिकली सुरक्षित नहीं हो जाती। समाज ऐसा है कि आपके ऊपर हमला होता रहेगा और लोग विडियो बनाते रहेंगे।

या, अपने पैरेंट्स से ये बाण्डपेपर साइन कराकर ले आइए कि कॉलेज प्रशासन आपकी सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार नहीं है, और आप स्वयं आने-जाने का समय तय कर सकती हैं। कॉलेज प्रशासन या पुलिस कॉलेज के आस-पास के इलाकों पर गश्त बढ़ा सकती है, हर जगह नहीं। वो संभव नहीं है।

ये स्वीकारना ज़रूरी है कि लड़कियों से संबंधित अपराध बहुत ज़्यादा हैं, और वो घट नहीं रहे। पुलिस अपना काम करती है, लेकिन हर सड़क पर, हर सोशल गैदरिंग में, हर नुक्कड़ पर, या हर उस जगह पर पुलिस बचाव करने नहीं आ पाएगी क्योंकि पुलिस हर जगह नहीं हो सकती।

पुलिस अंडरस्टाफ्ड है, ओवरवर्क्ड। फिर भी काम करती है। लेकिन हॉस्टलों या पीजी के नियमों को एक बचाव योजना की तरह देखना चाहिए, न कि किसी अत्याचार की तरह।

ये दुर्भाग्य है कि लड़कियों के साथ तमाम तरह की बातें हो सकती हैं और सबके माँ-बाप उन्हें लेकर ज़्यादा चिंतित रहते हैं। ये वास्तविकता है। जिनके बच्चे हॉस्टल में हैं, या बाहर अकेले हैं, बेटों से सात दिन में एक बार भी बात करने पर चलता है, पर बेटियों से दिन में दो बार बात करना होता है।

इसमें एलएसआर की छात्राओं का कोई दोष नहीं है। हम एक सड़े हुए समाज में रहते हैं। हमारी कानून व्यवस्था भी खराब है, और सामाजिक माहौल भी। मैं खूब चाहता हूँ कि लड़कियाँ हर वो काम करें जो वो करना चाहती हैं, लेकिन मैं एक भाई या दोस्त होने के नाते कभी भी नहीं चाहूँगा कि उस फ़्रीडम के कारण किसी दिन मेरी बहन या दोस्त का अहित हो जाए।

पहले लड़कियों को उकसाया, व्हाय शुड बॉय्ज़ हैव ऑल द फन?

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