‘हाथे न मेरिये, भाते मारो’

‘हाथे न मेरिये, भाते मारो’ यह बंगाल का मुहावरा है, और कम्युनिस्ट सत्ता काल के दरमियान खूब प्रचलित हुआ है।

अर्थ बहुत सरल है, शत्रु को हाथ से नहीं मारते, भात से मारते हैं। यहाँ भात से मारना का अर्थ है शत्रु का राशन बंद करना क्योंकि बंगाल में खाने का मुख्य हिस्सा भात ही है।

ज्योति बसु स्वयं मूल पूर्व बंगाल से थे हालांकि टेकनिकली बांगलादेशी शरणार्थी नहीं थे, कोलकातावासी ही थे। लेकिन 1971 के बाद आए बांग्लादेशियों का सब से अधिक उपयोग उन्होंने किया। बांग्लादेशियों को औकात दिखाते थे, लेकिन उन्हें पाला था हिंदुओं के दमन के लिए ही।

इसके साथ साथ पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट राज में पूर्व बंगाल के लोगों को सरकारी नौकरियों में भी प्रेफेरेंस मिलने की बातें सुनी हैं। ये बातें तो स्थानीय बंगाली अधिक जानते हैं।

फिर यह माहौल बना कि आप को किसी घर में मेड का भी काम करना होता था तो पार्टी का कार्ड आवश्यक था तभी काम मिलता था और काम देने दिया जाता था। मतलब अगर आप अपनी इच्छा से स्टाफ भी नहीं रख सकते थे, इनके दिये लोगों में से ही चुनना होता था।

मेड को लेकर बात यह भी है कि मेड अगर आप के घर में काम करेगी तो साफ सफाई के दौरान कोई ऐसी वैसी चीज़ पर उसकी नज़र पडे तो आप के लिए यह बात खतरनाक हो सकती थी। पार्टी कार्ड बनाने का अर्थ केवल नौकरी का मौका ही नहीं होता था, कुछ indoctrination भी होता था, औकात के हिसाब से।

उसमें जिस घर में काम कर रही हो उनकी जासूसी करना अनिवार्य बताया जाता था और कौन सी चीजों को पहचानना है, आदि सिखाया जाता था। बाकी पूरा घर उससे दुबका रहता था और मालिक पर बुरी नज़र होने का आरोप लगाने की धमकी देकर पैसे ऐंठना भी सामान्य बात थी।

वैसे आप का आत्मनिर्भर होना भी कम्युनिस्टों को गवारा नहीं था। अगर आप का घर / फ्लैट ठीक साइज़ का होता तो आप के माध्यम से उनके कितने लोगों को कैसी आय होनी चाहिए, यह वे तय करते थे।

आप कहें कि हम डिश वॉशर से बर्तन साफ करते हैं, वॉशिंग मशीन में कपड़े धोते हैं और वैक्यूम क्लीनर से घर साफ रखते हैं, हमें इसके लिए किसी की आवश्यकता नहीं तो यह उनके लिए बर्दाश्त नहीं था।

हाँ, आप को खराब काम होने पर साबित कर के कम्प्लेंट करने की सुविधा उपलब्ध थी जब वे आप को विकल्प उपलब्ध करा देते लेकिन वह भी उनका ही दिया हुआ। याने आप से वसूली और आप पर निगरानी भी, वह भी आप के ही पैसों से।

पार्टी का कार्ड ना रखने का मतलब आप का बेरोज़गार होना तय था अगर आप को नौकरी करनी थी। कोई भी स्थानीय स्थापन आप को नौकरी देने से रहा। बाकी पार्टी के लोकल बॉस के काम आ कर आप तरक्की भी कर सकते थे।

अब जिसे बंगाल छोड़ना नहीं है और वहीं रहकर नौकरी भी करनी है उसके लिए पार्टी से अलग सोच रखना असंभव बात थी। ‘हाथे न मेरिये, भाते मारो’ यह मुहावरा वहीं सार्थक होता था। कब तक आदमी भूखा टिक पाता? प्रोबाशी (प्रवासी) बंगाली इतने क्यों हैं और इतने होशियारों को वहाँ मौका क्यों नहीं मिलता यह इसी से समझ में आता है।

वैसे प्रोबाशियों से कभी इतनी संख्या में मित्रता नहीं हुई कि अंदाज़ लगा पाऊँ कि उनमें घोटी (पश्चिम बंगाल के) कितने हैं।

कहने को तो किस्से बहुत हैं, अब कम्युनिस्टों की जगह मुसलमानों ने ले ली है। वैसे बंगाल की संपन्नता को जलाकर राख़ करने वाले ज्योति के समय वे कम्युनिस्टों के गुर्गे हुआ करते थे। जैसे अन्यत्र बाहुबली स्वयं ही राजनीति में आ गए इसी तरह वे भी ममता की आड़ में आगे आ गए।

कम्युनिस्टों द्वारा तीस साल दबाकर कुचली आत्मा का शहरी बंगाली भद्रलोक, उनके लिए नर्म चारा था और है। अपनी अकड़ छोड़कर भद्रलोक ग्रामीण बंगाल से संवाद करेगा तो फिर से उत्थान के संयोग हैं। बाकी सब किस्से अब लिखने योग्य नहीं है।

वैसे कोई बंगाली कॉमरेड कम्युनिस्टों के गुण गाता मिले तो ‘हाथे मेरिये ना, भाते मारो’ का अर्थ पूछ लीजिये। हो सकता है वो रिएक्ट करेगा कि ऐसा कोई मुहावरा है ही नहीं। लेकिन फिर आप को टालता भी रहेगा और आपकी बुराई भी करता रहेगा। ‘भाते मारो’ में यही तो सब किया जाता है ना?

शक्ति का प्रदर्शन कहीं तो आवश्यक है ही ना?

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