पनिया के जहाज से सांस्कृतिक पुनर्स्थापना

लोक की कलाओं, संगीत आदि में जो कुछ भी कहा, गाया, उकेरा, बुना जाता है वह स्वाभाविक और अनिवार्य रूप से उस कालखंड का आंखों देखा दस्तावेज़ होता है।

कजरी लोकगायन जैसी विधा जब खुद को भारत की आज़ादी की लड़ाई से जोड़ती है तब वह गाते हुए मिल जाती है :

‘हथवा में होत जो मोरे कटरिया… बहाइ देतीं गोरवन के खून हो, कचौड़ी गली सून कइल बलमू। मिर्जापुर कइल गुलजार हो…’

यही लोक जब यातायात के साधनों को अपने भाव से जोड़ते हुए कालखंड के दस्तावेज़ीकरण का काम करता है तो कहता है :

“पनिया के जहाज से पलटनिया बनि अइह पिया, ले ले अइह हो… पिया सिंदूर बंगाल के। ले ले अइह हो… पिया झुमका पंजाब के। ले ले अइह हो… पिया चोलिया मुल्तान से।”

पहले लोकगीत कजरी में प्रेमिका उन गोरों को खत्म करने की जंग में यूं शामिल होती है, जब पानी के जहाज़ से उसके प्रेमी को गिरमिटिया मज़दूर बना कर भेज दिया जाता है, तो…. दूसरे लोकगीत में नायिका अपने नायक से पल्टन (फौज) में भर्ती होने के बाद घर लौटते हुए एक बार फिर पानी के जहाज़ से अलग-अलग जगहों से वहां की मशहूर अपने पसंद की वस्तुएं लाने की फरमाइश करती है।

बीते दिन एक खबर आम हुई कि कलकत्ते के हल्दिया बंदरगाह से पेप्सिको कंपनी गंगा नदी के रास्ते जलपोत एमवी आरएन टैगोर द्वारा 16 पेप्सी ब्रांड के शीतलपेय भरे कंटेनरों को गंगा के रास्ते अगले 12 तारीख को बनारस बंदरगाह पहुंचा रही है, तो इस उपलब्धि में देखने के लिए बहुत कुछ था।

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद किए गए वादों में एक वादा था वाराणसी से हल्दिया तक गंगा में कमर्शियल यातायात सेवा की शुरुआत, जिसे ‘सागर माला राष्ट्रीय जलमार्ग परियोजना’ के तहत किया जाना था।

हालांकि इस वादे को कई विशेषज्ञों ने असंभव करार दिया था, लेकिन शिपिंग और जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने इस असंभव को संभव कर दिखाया। उन्होंने ट्वीट करके जानकारी दी कि आज़ादी के बाद पहली बार अंतर्देशीय जलमार्ग के रास्ते पेप्सी कंपनी के 16 कंटेनर गंगा नदी के रास्ते कोलकाता से वाराणसी आ रहे हैं।

खबर यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 नवंबर को वाराणसी में इन कंटेनरों को रिसीव करेंगे। इसके लिए सरकार ने वाराणसी में एक मल्टीमॉडल टर्मिनल विकसित किया है। जिसे इसी दिन प्रधानमंत्री मोदी देश को समर्पित भी करेंगे। बताया जाता है कि इस टर्मिलन को रिकार्ड समय में पूरा किया गया है।

तो यह था वह ‘बहुत कुछ’ जो इस उपलब्धि में देखा जा सकता है। लेकिन इस ‘बहुत कुछ’ की सीमा केवल भौतिक अवस्थापना तक ही तय करना उचित नहीं। इस सीमा को यदि देश के परिवहन संस्कृति तक विस्तार दिया जाय तो… यह उसके पुनर्स्थापन तक की यात्रा कराता है।

और तब देश में किफायती, प्रदूषणमुक्त माल ढुलाई जैसी साधारण भौतिक सुविधा… जो बंदरगाहों के निर्माण, रोज़गार के नवसृजन आदि के जरिये हमारे वर्तमान को मज़बूत करते दिखती है, तो वहीं भाव और कर्म दोनों के स्तर पर पुरातन संस्कृति को नए कलेवर में स्थापित करने की अनुभूति भी देती है।

और तभी भाव सहज ही यह लोक पैरोडी गुनगुना उठता है :

‘पनिया के जहाज से पलटनिया बनि अइह पिया, ले ले अइह हो… हमके पेप्सी बंगाल से।’

केवल बालिगों के लिए – बच्चों का खेल नहीं

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